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Himachal Assembly Elections का इतिहास, 70 सालों में कब और किसकी बनी सरकार, जानें पूरा लेखा-जोखा

हिमाचल प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां के मतदाता ‘वोट रिवाज’ यानि सरकार बदलने के लिए वोट करते हैं।

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Himachal Assembly Elections आजादी के बाद 1948 के अप्रैल महीने में हिमाचल प्रदेश चीफ कमिश्नर शासित प्रांत के रूप में अस्तित्व में आया। वहीं जब 26 जनवरी 1950 को देश गणतंत्र बना, तब हिमाचल प्रदेश को C श्रेणी के राज्य का दर्जा दिया गया। तब साल 1952 में राज्य में पहली बार विधानसभा का चुनाव हुआ। तब हिमाचल प्रदेश में 36 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं।

परमार बने पहले मुख्यमंत्री

आजादी के बाद से कांग्रेस का पूरे देश पर जलवा कायम था। इसलिए यहां भी उसका असर दिखा और 36 में से 24 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के यशवंत सिंह परमार को हिमाचल प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया। 1952 से 1956 तक, लगभग 237 दिनों तक परमार ने सूबे की कमान संभाली। इसके बाद विधानसभा को भंग कर दिया गया और हिमाचल को केंद्र शासित राज्य घोषित किया गया। साल 1956 से साल 1963 तक यहां राष्ट्रपति शासन रहा, लगभग 6 साल 243 दिन तक।

इसके बाद साल 1963 में फिर से आज की 'दिल्ली की तर्ज' पर हिमाचल प्रदेश को केंद्र शासित राज्य का दर्जा दिया गया। इसके बाद फिर से चुनाव हुआ जिसमें कांग्रेस जीती और यशवंत सिंह परमार को ही दूसरी बार मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने एक जुलाई 1963 से चार मार्च 1967 तक केंद्र शासित राज्य के मुख्यमंत्री का दायित्व निभाया।

साल 1967 में फिर से विधानसभा के चुनाव होने थे, तब विधानसभा सीटों का ग्राफ बदल गया था। हिमाचल प्रदेश में 60 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए और कांग्रेस ने फिर बाजी मारते हुए 34 सीटों पर कब्जा किया। तब पहली बार भारतीय जनसंघ ने सूबे में अपनी धाक दिखाई और पहले चुनाव में ही 7 सीटों पर जीत हासिल की। यशवंत सिंह परमार को तीसरी बार राज्य का मुख्यमंत्री चुना गया। यशवंत सिंह परमार साल 1977 तक इस पद पर रहे। यशवंत सिंह परमार हिमाचल प्रदेश की सत्ता में मुख्यमंत्री के पद पर लगभग 18 साल तक रहे।

कब हिमाचल बना पूर्ण राज्य

संसद द्वारा 18 दिसंबर 1970 को हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम पास किया गया। इसके बाद 25 जनवरी 1971 को नया राज्य हिमाचल प्रदेश अस्तित्व में आया। इस तरह यह पहाड़ी 'रिज मैदान' जिसका नाम हिमाचल प्रदेश था वह भारतीय गणराज्य का 18वां राज्य बना। तब से लेकर आज तक हिमाचल प्रदेश ने एक लम्बी यात्रा तय की है। इस प्रदेश ने अनेकों सरकारें देखी हैं।

पूर्ण राज्य बनने के बाद साल 1972 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए और इस बार भी कांग्रेस को ही जीत मिली। दरअसल राज्य के गठन के बाद परिसीमन के आधार अब 68 सीटें हो गई थी। 68 सीटों में कांग्रेस को 53 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं विपक्ष में भारतीय जनसंघ के 5, लोकराज पार्टी हिमाचल प्रदेश के 2, सीपीआई (एम) को 1 और 7 निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी जीत हासिल की थी। वहीं कुछ मीडिया रिपोट्स में ये कहा गया कि उस वक्त के दो और कांग्रेसी नेता ठाकुर कर्म सिंह और पंडित सुख राम भी मुख्यमंत्री पद की लालसा में थे लेकिन एक दूसरे की टांग खिंचाई करते थे। इसलिए कांग्रेस ने उन्हें आगे ना बढ़ाकर यशवंत सिंह परमार को ही मुख्यमंत्री बना दिया।

गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो कर दिया खेल

साल 1977 में जब चुनाव हुआ तो जनता पार्टी की जबरदस्त लहर में कांग्रेस केवल 9 सीटों पर सिमट गई और 53 सीटों के साथ जनता दल ने सरकार बनाई। ऐसा पहली बार था जब हिमाचल प्रदेश में इतना बड़ा बदलाव हुआ और कांग्रेस जमीन से उखड़ गई। तब कांगड़ा से शांता कुमार मुख्यमंत्री बने। फिर यहां शुरू हुई कांग्रेस की जोड़-तोड़ की राजनीति और साल 1980 में शांता कुमार को पद छोड़ना पड़ा और ठाकुर राम लाल कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री बन गए। बता दें कि यहां कोई चुनाव नहीं हुआ बल्कि दलबदल के सहारे ही कांग्रेस ने सरकार बनाई।

जब भाजपा ने दिखाया दम, सीएम बने वीरभद्र

साल 1982 में पहली बार भाजपा हिमाचल प्रदेश के चुनाव में उतरी और कांग्रेस को जबरदस्त टक्कर देते हुए 29 सीटें जीत लीं। यह जीत इसलिए मायने रखती थी क्योंकि 2 साल पहले बनी पार्टी पहली बार मैदान में आते ही विपक्ष में बैठी, वो भी इतनी ज्यादा सीट के साथ। हालांकि मुख्यमंत्री ठाकुर राम लाल ही बने लेकिन उन्हें कांग्रेस नेताओं के दवाब के कारण 7 अप्रैल 1983 को पद छोड़ना पड़ा और तब कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह को मुख्यमंत्री घोषित किया। वीरभद्र सिंह ने 8 अप्रैल को पद संभाला और कार्यकाल को पूरा किया। साथ ही 1985 में फिर से कांग्रेस जीतकर आई और वीरभद्र भी 1985-90 तक मुख्यमंत्री रहे।

हिमाचल प्रदेश का बदला 'रिवाज'

साल 1990 के चुनाव के बाद बदल गया हिमाचल प्रदेश का रिवाज। जी हां! रिवाज इसलिए क्योंकि 1990 के बाद हर पांच साल में यहां की जनता सरकार को बदल देती है। तब से लेकर अभी तक यही रिवाज हिमाचल प्रदेश में चलता आ रहा है। साल 1990 में भाजपा को जोश चरम था क्योंकि राममंदिर के मुद्दे पर भाजपा मुखर थी, जिसका असर यहां भी दिखा और सरकार भाजपा की बनी। भाजपा ने तब 46 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस केवल 9 सीटें ही जीत पाई थी। इसके बाद जितनी बार विधानसभा का चुनाव हुआ, तब-तब सरकार बदली है। साल 1993, 1998, 2003, 2007, 2012, 2017 हर बार सरकार का चेहरा बदला है।

जब चुनाव हो गया था टाई, बीजेपी ने मारी बाजी

यह किस्सा हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक इतिहास का सबसे रोचक हिस्सा है। साल 1998 में विधानसभा चुनाव हुआ, तब 68 सीटों वाली प्रदेश में चुनाव की गिनती के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच टाई की स्थिति हो गई। दोनों पार्टियों को 31-31 सीटें मिली, मतलब दोनों को ही बहुमत हासिल नहीं हो पाया था। वहीं बहुमत के लिए किसी भी पार्टी को कम से कम 35 सीटें चाहिए। तब भाजपा ने हिमाचल विकास कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अपनी सरकार बना ली।

अब तक केवल 6 मुख्यमंत्री बने

हिमाचल के इतिहास में अब तक केवल 6 मुख्यमंत्री ही बने हैं। यहां पार्टिंयां ज्यादातर मुख्यमंत्रियों का चेहरा नहीं बदलती है। इन मुख्यमंत्रियों में हैं- यशवंत सिंह परमार, ठाकुर राम लाल, वीरभद्र सिंह ये तीन कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री रह चुके हैं। जबकि भाजपा की ओर से शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल और जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बने हैं।

ये सबसे ज्यादा दिनों तक रहें मुख्यमंत्री

वहीं हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री पद पर बैठने वाले वीरभद्र सिंह हैं। जिन्होंने 21 साल 12 तक इस पद पर कार्य किया। इसके बाद 18 साल 83 दिन यशवंत सिंह परमार मुख्यमंत्री रहे। वहीं प्रेम कुमार धूमल 9 साल 342 दिन (तकरीबन 10 साल) तक इस पद पर रहे।

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