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Capt. Vikram Batra: कैप्टन विक्रम बत्रा ने कहा था, ‘या तो तिरंगा फहरा कर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर..’

Capt. Vikram Batra: साल 2021 में एक फिल्म आई थी। फिल्म का नाम शेरशाह था। यह फिल्म कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन पर आधारित थी। जिन्होंने कारगिल युद्ध में अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। जब बत्रा ने 5140 चोटी पर फतह कर अपना विजय उद्घोष 'यह दिल मांगे मोर' कहा था तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया था। आज उस वीर सेना अधिकारी की पुण्यतिथि है।

जीवनी एवं आर्मी में एंट्री

कैप्‍टन विक्रम बत्रा का जन्‍म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर जिले के घुग्‍गर में हुआ था। उनके पिता का नाम जी.एम. बत्रा और मां का नाम कमलकांता बत्रा है। इनकी शिक्षा पहले डीएवी स्कूल और फिर सेंट्रल स्कूल पालमपुर में हुई। अपने कॉलेज के दिनों में विक्रम बत्रा एनसीसी की एयर विंग में शामिल हो गये थे। साल 1994 में उन्होंने एनसीसी कैडेट के रूप में गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया था। इसके बाद विज्ञान विषय में स्नातक करने के बाद विक्रम का चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया। जुलाई 1996 में उन्होंने भारतीय सेना अकादमी देहरादून में प्रवेश लिया। 6 दिसंबर 1997 को 13 जेके राइफल्स में उनकी पहली पोस्टिंग सोपोर में बतौर लेफ्टिनेंट के पद पर हुई। उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी प्राप्त किए थे। इसके बाद 1 जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया।

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'या तो तिरंगा फहरा कर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर...'

कारगिल युद्ध से पहले जब वह घर गए हुए थे तो उन्होंने अपने मित्रों से कहा था कि मैं या तो तिरंगा लहरा कर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरुर। पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया तो हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद सेना द्वारा लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को कैप्टन रैंक से नवाजा गया।

इसके बाद 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को सेना द्वारा दिया गया। इसके बाद जब देश सो रहा था तब बत्रा ने अपने साथियों के साथ मिलकर 20 जून 1999 को सुबह तड़के तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया था। अगले दिन चोटी 5140 पर भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो पूरे देश में वायरल हो गया। कैप्टन बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष 'यह दिल मांगे मोर' कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया। इसी दौरान विक्रम के कोड नाम शेरशाह के साथ ही उन्हें 'कारगिल का शेर' कहा गया।

जीवन के अंतिम युद्ध में भी पाक को चटाई धूल

5140 चोटी को फतह करने के बाद कैप्टन बत्रा ने आराम नहीं किया। वह एक और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ गये। सेना ने चोटी 4875 को भी कब्जे में लेने का अभियान शुरू कर दिया। इसकी बागडोर भी विक्रम को सौंपी गयी। 7 जुलाई को प्वाइंट 4875 चोटी फतह करने का अभियान शुरू हुआ। यह एक ऐसी जगह थी जहां दोनों और खड़ी ढलान थी और उसके एकमात्र रास्ते पर दुश्‍मनों ने नाकाबंदी कर रखी थी। अपने साथी लेफ्टिनेंट अनुज नैयर व सैनिकों के साथ उन्होंने कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

परमवीर चक्र विजेताओं पर किताब लिखने वाली लेखिका रचना बिष्ट रावत ने 'द ब्रेव' में लिखा कि विक्रम बत्रा कारगिल की लड़ाई का सबसे जाना पहचाना चेहरा बन गये थे। उन्होंने जान की परवाह भी नहीं की और इस अभियान को दुश्मनों की भारी गोलीबारी में भी पूरा किया। लड़ाई के दौरान एक विस्फोट में उनके साथी लेफ्टीनेंट नवीन के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गये। जब कैप्टन बत्रा उन्हें बचाने के लिए पीछे घसीट रहे थे तब उनकी छाती में गोली लग गयी। इस तरह देश का जवान अपनी मातृभूमि की रक्षा करते करते वीरगति को प्राप्त हो गया।

परिवार की यादों में बत्रा

विक्रम के जुड़वाँ भाई विशाल बत्रा ने एक बार किसी इंटरव्यू में बताया था कि वह लंदन में किसी होटल के रजिस्टर में अपना नाम लिख रहे थे तो पास खड़े एक भारतीय ने नाम पढ़ कर मुझसे पूछा कि क्या आप विक्रम बत्रा को जानते हैं? मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी कि सात समुंदर पार लंदन में भी लोग मेरे भाई को पहचानते थे। उनके पिता ने जिक्र करते हुए बताया कि साल 1999 की होली की छुट्टियों में विक्रम आखिरी बार पालमपुर आया था। घर दोस्तों से भरा रहता था। छुट्टियां खत्म होने पर जब हम सब उसे बस स्टैंड पर छोड़ने गये तो जैसे ही बस की खिड़की से उसने अपना हाथ हिलाया तो मेरी आंखें नम हो गई थी। मुझे क्या पता था कि हम अपने प्यारे विक्रम को आखिरी बार देख रहे हैं।

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