Dara Singh : दारा सिंह के सामने कांप जाते थे दुनिया के बड़े-बड़े पहलवान
Dara Singh: गांवों में होने वाले कुश्ती दंगलों में कभी जोर आजमाइश करने वाले दीदार सिंह रंधावा को यह मालूम नहीं था कि एक दिन वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पहलवानों में गिने जाएंगे। जी हां, दीदार सिंह रंधावा को ही हम दारा सिंह के नाम से जानते है। वही दारा सिंह जिन्होंने रामानंद सागर के निदेशन में बने धारावाहिक 'रामायण' में भगवान हनुमान का किरदार निभाया था। उनके इस किरदार को दर्शकों द्वारा खूब पसंद किया गया था। आज इस महान शख्सियत की पुण्यतिथि है। इस मौके पर हम आपको उनसे जुड़ी कुछ बातों के बारे में बताएंगे।
कुश्ती की शुरुआत
19 नवंबर 1928 को अमृतसर के धरमूचक में जन्में दारा सिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक पहलवान के तौर पर जाने जाते थे। बचपन में दारा सिंह अपने छोटे भाई के साथ मिलकर आसपास के जिलों में कुश्ती समारोहों में जाया करते थे। ऐसे ही उन्होंने कुश्ती की दुनिया में अपना पहला कदम रखा। पर उन्हें पहचान तब मिली जब वह एक बार सिंगापुर गए हुए थे। खुद दारा सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया कि वह कुछ काम के सिलसिले में सिंगापुर गये थे।

वहां फ्री स्टाइल कुश्तियां देखकर वहां रह रहे भारतीयों व पंजाबियों ने उनसे कहा कि तुम तो बने बनाये पहलवान हो, तुम यहां फ्री स्टाइल कुश्ती लड़ो। इसके बाद तीन साल लगातार वहां कुश्तियां लड़ी और फिर धीरे-धीरे दूसरे देशों में भी जाने लगे। सिंगापुर उस समय मलेशिया का हिस्सा हुआ करता था। वहां तारलोक सिंह नाम के पहलवान का दबदबा था।
एक बार दारा सिंह और तारलोक सिंह के बीच में कुश्ती का मुकाबला हो गया। दारा सिंह ने उसे ऐसी पटकनी दी कि उसके बाद वह ऐसे किसी भी मुकाबले में नहीं जाता था, जहां दारा सिंह हुआ करते थे। इसके बाद कुआलालम्पुर में कुश्ती का आयोजन हुआ। जब आयोजक दारा सिंह से मिले तो दारा सिंह ने उनको बोला कि यह बात गुप्त रखी जाएगी कि मैं वहां आ रहा हूं।
अब तारलोक सिंह को पता नहीं चला तो वह भी पहुंच गया। पर जैसे ही उसे पता चला कि दारा सिंह आए हुए हैं। उसने चिट्ठी के माध्यम से दारा सिंह के पास संदेश भेजा कि लड़ने से पहले ही मुकाबला बराबर का मान लेते हैं। मगर दारा सिंह नहीं माने और उस कुश्ती में उन्होंने तारलोक को धूल चटाई और मलेशिया के कुश्ती चैंपियन बन गये।
किंग कॉन्ग को दी थी पटकनी
दारा सिंह का नाम बल और शक्ति का पर्यायवाची बन चुका था। आज भी जब कोई ज्यादा अपने बल का प्रदर्शन करता है तो लोग उसे कहते हैं कि खुद को दारा सिंह समझ रहा है क्या? दारा सिंह ने विश्व चैंपियन किंग कॉन्ग को भी धूल चला दी थी। तारीख थी 12 दिसंबर 1956। ऑस्ट्रेलिया में हुए इस मुकाबले का रोमांच आज भी खेल प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय रहता है। इस दौरान लगभग 130 किलो के दारा सिंह ने 200 किलोग्राम के 'किंग कॉन्ग' को उठाकर रिंग के बाहर फेंक दिया था। 1959 में वह 'कॉमनवेल्थ चैंपियन' बने। इसके बाद उन्होंने फिरपो जबिस्जको, बिल वर्ना, जॉन दा सिल्वा, डैनी लिंच, रिकिडोजन और 'स्की हाय ली' जैसे नामी पहलवानों को पटकनी दी थी।
संजय गांधी और दारा सिंह
पहलवानी के बाद अभिनय की दुनिया में काम कर रहे दारा सिंह ने एक बार पंजाबी फिल्म का निर्माण किया। फिल्म का नाम था 'राज करेगा खालसा'। फिल्म जब रिलीज होनी थी तब देश में इमरजेंसी लग गई। इसके बाद सेंसर से अनुमति मिलने में पूरा एक साल लग गया। उस दौरान तय हुआ कि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह को भी फिल्म दिखाई जाएगी। उनको फिल्म पसंद तो आई लेकिन फिल्म देखने के बाद उन्होंने उसमें फेरबदल की मांग कर डाली। वहीं उसी दौरान पंजाब में निहंग सिखों के एक गुट बुड्ढा दल के जत्थेदार बाबा संता सिंह ने फिल्म के खिलाफ मुहिम छेड़ दी।
इसके बाद फिल्म का नाम बदल कर सवा लाख से एक लड़ाऊं रख दिया गया। पर फिर भी निहंग दल के जत्थेदार ने ये फिल्म नहीं चलने दी। दारा सिंह को अच्छा खासा नुकसान हो गया। उनके सिर पर क़र्जा चढ़ गया। पर ये किस्सा यूं खत्म नहीं होता है। इस घटना के कुछ साल बाद जब दारा सिंह की मुलाकात संजय गांधी से हुई तो दारा सिंह ने संजय को बताया कि कैसे सरकार ने उनकी फिल्म रिलीज़ नहीं होने दी। इसके बाद संजय ने ज्ञानी जैल सिंह से बात की और अगले ही दिन फिल्म को पूरे पंजाब में रिलीज करने की इजाजत मिल गई।
अभिनय की दुनिया में कदम
सिकंदर-ए-आजम और डाकू मंगल सिंह जैसी फिल्मों से अभिनय शुरू करने वाले दारा सिंह ने कई पंजाबी और हिंदी फिल्मों में काम किया था। 1962 में उन्होंने फिल्म 'किंग-कांग' में किंग कांग का किरदार निभाया था। वहीं अभिनेत्री मुमताज के साथ उन्होंने 16 फिल्मों में काम किया था। रामानंद सागर की 'रामायण' में उन्होंने भगवान हनुमान की जो भूमिका निभाई थी उसे लोग आज भी याद करते हैं। 2007 में रिलीज फिल्म जब वी मेट उनकी आखिरी फिल्म थी। इस फिल्म में उन्होंने करीना कपूर के दादा का रोल किया था। दारा सिंह को 1954 में रुस्तम-ए-हिंद और 1966 में रुस्तम-ए-पंजाब के टाइटल से नवाजा गया। 2003 से 2009 तक दारा सिंह राज्य सभा के सांसद भी रहे। 7 जुलाई 2012 को कभी नहीं हारने वाले दारा सिंह आखिर अपना बलिष्ठ शरीर छोड़ गए।
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