Dara Shikoh: विद्वान और उदार बादशाह होते दारा शिकोह, क्रूरता से मार दिया था औरंगजेब ने

शाहजहां और मुमताज महल के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह का जन्म 20 मार्च 1615 को अजमेर में हुआ था। औरंगजेब सहित शाह शुजा और मुराद बख्श उनके भाई थे।

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Dara Shikoh: साल 1642 में मुगल बादशाह शाहजहां ने दारा शिकोह को 'शहजादा-ए-बुलंद इकबाल' की उपाधि से नवाजा। दारा शिकोह इलाहाबाद, गुजरात, मुल्तान, काबुल और बिहार के गवर्नर रह चुके थे। वे अपने पिता बादशाह शाहजहां के सबसे चहेते बेटे थे इसलिये दारा शिकोह को मुगल सल्तनत के उत्तराधिकारी के तौर कर देखा जाता था। मगर दारा शिकोह के भाई औरंगजेब की नजर भी गद्दी पर थी। इस तरह मुगल सल्तनत को लेकर दारा शिकोह और औरंगजेब के बीच एक जंग छिड़ गयी।

जब पकड़ा गया दारा शिकोह

उत्तराधिकार को लेकर औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच कई युद्ध हुए। मगर 29 मई 1658 में आगरा के समीप सामूगढ़ में दारा शिकोह और औरंगजेब के बीच का युद्ध निर्णायक साबित हुआ। इस लड़ाई में दारा के 10 हजार सैनिक मारे गए। बाकी बचे सैनिकों ने दारा का साथ छोड़ दिया। इस युद्ध में अंततः दारा की हार हुई और उन्हें मैदान छोड़कर भागना पड़ा।

इसके बाद, औरंगजेब ने आगरा के किले पर कब्जा कर लिया और अपने पिता शाहजहां को किले में ही बंदी बना लिया। दारा शिकोह भागते हुए पहले दिल्ली पहुंचे और फिर अफगानिस्तान चले गये। वहां पर एक अफगान सरदार मलिक का संरक्षण प्राप्त किया। इस अफगान सरदार की दारा शिकोह ने एक बार जान बचाई थी। मगर उस अफगान ने दारा को धोखा दे दिया और उन्हें औरंगजेब के सैनिकों के हवाले कर दिया।

दिल्ली की सड़कों पर दारा का अपमान

मशहूर इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार अपनी पुस्तक 'ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब' में लिखते है, "दारा को 29 अगस्त 1659 को एक मैली और ठिगनी हथिनी की पीठ पर खुले हौदे में बैठाया गया। बगल में एक और हाथी चल रहा था जिसपर दारा का 14 वर्षीय बेटा सिपिहर शिकोह सवार था। दोनों के पीछे तलवार लेकर औरंगजेब का एक गुलाम नजर बेग चल रहा था। संसार के सबसे समृद्ध साम्राज्य का उत्तराधिकारी दारा शिकोह फटे हुए मैले-कुचैले कपड़ों में था। उसके सिर पर एक गंदी काली पगड़ी बंधी हुई थी।"

जदुनाथ सरकार आगे लिखते हैं, "दारा के गले में न तो कोई आभूषण था और न ही उसके शरीर पर कोई जवाहरात थे। उनके पैर बेड़ियों से बंधे हुए थे। लेकिन, हाथ खुले थे। चिलचिलाती धूप में उन्हें दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया। इस अपमान की पीड़ा में दारा ने एक पल के लिए भी अपनी नजरें नहीं उठाईं। उसकी यह हालत देखकर दोनों तरफ खड़े लोगों की आंखें भर आईं।"

दारा की दर्दनाक हत्या

मुगल सल्तनत के उत्तराधिकार की इस लड़ाई में सार्वजनिक अपमान के बाद औरंगजेब ने तय किया कि दारा शिकोह को मौत के घाट उतार दिया जाए। अतः 30 अगस्त 1659 को दारा के सिर को धड़ से अलग कर उनकी हत्या कर दी गई।

औरंगजेब इसके बाद भी शांत नहीं हुआ। उसने दारा शिकोह के सिर को एक तश्तरी में बंद करके एक पत्र के साथ आगरा के किले में कैद अपने पिता शाहजहां के पास भिजवा दिया। इस पत्र में औरंगजेब ने लिखा, "आपका बेटा औरंगजेब! आपकी खिदमत में इस तश्तरी को पेश कर रहा है, जिसे देखकर आप उसे कभी नहीं भूल पाएंगे।"

इस पत्र को देखकर शाहजहां ने कहा भला हो खुदा का कि मेरा बेटा अभी तक मुझे याद करता है। उसी वक्त शाहजहां के सामने ढक्कन से ढकी तश्तरी पेश की गई। उस तश्तरी को खोलते ही शाहजहां की चीखें निकल गईं। क्योंकि, उस तस्तरी में शाहजहां के सबसे बड़े और प्रिय बेटे दारा का सिर रखा हुआ था। शाहजहां को यह दृश्य देखकर बहुत बड़ा सदमा लगा।

बर्बरता की हदें की पार

औरंगजेब के आदेश पर दारा के सिर को ताजमहल के प्रांगण में गाड़ दिया गया। औरंगजेब का मानना था कि जब भी शाहजहां अपनी पत्नी के मकबरे की तरफ देखेगा, तो उसे याद आएगा कि उसके सबसे बड़े बेटे का सिर भी वहां सड़ रहा है। जबकि दारा शिकोह के बिना सिर के धड़ को एक बार फिर से हाथी पर रखकर दिल्ली की सड़कों पर घुमाने का आदेश दिया गया। बाद में, दारा शिकोह के धड़ को हुमायूं के मकबरे के परिसर में दफनाया गया।

उपनिषदों का अनुवाद

दारा शिकोह एक उदारवादी प्रशासक थे। उनकी इस्लाम के साथ-साथ हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में भी रुचि थी। दरअसल, उनके जीवन पर हिंदू और सूफी संतों के दर्शन का गहरा प्रभाव था। हिंदू संत बाबा लाल दास बैरागी और पंडित जगन्नाथ मिश्रा से वे बेहद प्रभावित थे।

दारा शिकोह ने श्रीमद्भागवतगीता और अथर्ववेद का फारसी में अनुवाद किया। इसके साथ ही, उन्होंने 52 उपनिषदों का अनुवाद संस्कृत से फारसी में किया। जिसे 'सिर्र-ए-अकबर' का नाम दिया गया। इस काम में उन्होंने बनारस के पंडितों का सहयोग लिया। जब उन्हें इन धार्मिक ग्रंथों के अनुवाद और उसके अर्थ की शुद्धता पर शक होता था, तो वह धार्मिक विद्वानों से शास्त्रार्थ करते थे। शाही दरबार से जो रकम दारा को मिलती थी, उसे भी वे धर्म तथा दर्शन से जुड़े ग्रंथों के अनुवाद पर खर्च करते थे।

भारतीय इतिहास में अमर

दारा शिकोह ने हिंदू धर्म के सिद्धांतों को मुसलमानों के सामने प्रस्तुत किया। इसका उद्देश्य दो परस्पर विरोधी संस्कृतियों और धर्मों के बीच सामंजस्य स्थापित करना था। दारा शिकोह स्वयं भी संस्कृत और भारतीय दर्शन का जानकार थे। इसलिए उन्हें 'मुस्लिम पंडित' भी कहा जाता था। उनका मानना था कि हिंदू भी इस्लाम की तरह ही तौहीद यानी एकेश्वरवाद को मानते है। वह मानते थे कि सभी ज्ञात शास्त्रों का एक समान स्रोत होना चाहिए।

कट्टर इस्लामिक सिद्धातों को न मानने और दूसरे धर्मों के प्रति रुचि रखने के कारण दारा शिकोह को उनका कट्टरपंथी भाई औरंगजेब पसंद नहीं करता था। औरंगजेब की नजर में दारा शिकोह एक काफिर और बुतपरस्त थे। इन आपसी मतभेदों और सत्ता की लड़ाई में चाहे औरंगजेब जीत गया हो लेकिन दारा शिकोह का भारतीय इतिहास में एक विशेष स्थान आज भी बना हुआ है।

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