Monsoon and Economy: क्या है मानसून और खेती का कनेक्शन, जानें अर्थव्यवस्था में मानसून का महत्व
Monsoon and Economy: इस साल के मानसून ने भारत के तटीय इलाकों में दस्तक दे दी है। अगर यह अनुकूल मानूसन हुआ तो उत्पादकता बढ़ेगी और खुशहाली आयेगी। जबकि प्रतिकूल मानसून से सूखा व बाढ़ जैसी आपदाओं का खतरा बना रहता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक एम. महापात्रा का कहना है कि इस साल सामान्य अथवा सामान्य से ज्यादा बारिश होने की 67 प्रतिशत संभावना है। जबकि गैर-सरकारी संस्था 'स्काइमेट' ने सामान्य से कम मानसूनी वर्षा का अनुमान जताया है। दरअसल, केरल के कुछ इलाकों में फिलहाल मानसूनी बारिश हो रही है। हालांकि यह मानसून अपने तय समय से करीब एक सप्ताह देरी से पहुंचा है, जिसका असर देश के अन्य हिस्सों पर भी पड़ेगा।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मानसून भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जरुरी है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पिछले साल यानी 2022 में मानसूनी वर्षा सामान्य से थोड़ा ज्यादा हुई थी। जिसके फलस्वरूप खाद्यान्न उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी थी।

खेती पर मानसून का प्रभाव
भारत की लगभग 58 प्रतिशत जनसंख्या खेती पर निर्भर है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में खेती एवं उससे संबंधित कार्यां का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 20.2 प्रतिशत योगदान था। यही नहीं, 60 प्रतिशत खेती योग्य जमीन मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। इसलिए अगर मानसून में देरी अथवा कमी होती है तो भारतीय खेती प्रभावित होती है। नतीजतन उत्पादकता में कमी दर्ज की जायेगी। जिससे डिमांड और सप्लाई का चक्र बिगड़ जायेगा और देश में महंगाई बढ़ेगी। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
खेती भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। उत्पादकता कम होने पर इससे जुड़े उद्योग भी प्रभावित होंगे। इसमें पशु पालन, बागवानी, दुग्ध, फल-सब्जियां, और खाद्यान्न प्रोसेसिंग इत्यादि शामिल हैं। मानसून के प्रतिकूल होने पर इन उद्योगों की भी आपूर्ति पर बुरा असर पड़ेगा और आयात की संभावना बढ़ जायेगी। जिससे बैकों में जमा विदेशी मुद्रा कम होगी और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
पिछले 5 वर्षों में मानसून और खेती उत्पादकता
आईएमडी ने सामान्य मानसूनी बारिश को 96 प्रतिशत और 104 प्रतिशत के बीच परिभाषित किया है। इसका मतलब है कि अगर बारिश का प्रतिशत 96-104 के बीच रहता है तो वह सामान्य मानी जायेगी और खेती उत्पादन के लिये लाभदायक होगी। अगर इससे कम या ज्यादा होती है तो सूखा या बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अगर पिछले 5 सालों में मानसूनी बारिश का अध्ययन करें तो देश में मानसूनी वर्षा सामान्य और उसके आसपास ही रही है। इसका नतीजा देश में अच्छी खेती के तौर पर सामने आया है। दरअसल इन बीते सालों में देश में खाद्यान्न उत्पादकता में भारी बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है।
2017 में 95 प्रतिशत मानसूनी बारिश हुई थी। वहीं कृषि उत्पादकता 284.83 मिलियन टन रही। यह वित्तीय वर्ष 2016-17 से 9.72 मिलियन टन ज्यादा थी। साल 2018 में मानसूनी बारिश का प्रतिशत 91 रहा, तो कृषि उत्पादकता 285.17 मिलियन टन के आसपास थी। अगले साल मानसूनी वर्षा का एलपीए 110 प्रतिशत था और कृषि उत्पादकता भी 6.74 मिलियन टन बढ़कर 291.95 मिलियन टन हो गयी।
ऐसे ही 2020 में भी मानसून का एलपीए 109 प्रतिशत रहा और उत्पादकता 305.44 मिलियन टन हो गयी। 2021 में मानसूनी बारिश 99 प्रतिशत रही और कृषि उत्पादकता बढ़कर 315.72 मिलियन टन दर्ज की गयी। कृषि उत्पादकता में वृद्धि 2022 में भी जारी रही। पिछले साल यह 323.55 मिलियन टन थी जबकि मानसूनी बारिश का एलपीए 96 प्रतिशत था।
मानसून बढ़ा सकता है महंगाई?
आपको बता दें कि मानसून के कारण महंगाई बढ़ सकती है, क्योंकि मानसून के कम या ज्यादा होने की स्थिति में उत्पादकता प्रभावित होती है। कम मानसून की स्थित में उत्पादकता कम होगी और ज्यादा मानसून की स्थिति में उत्पादकता यानी खेती खराब हो जाती है। जिसके परिणामस्वरूप मांग ज्यादा और उत्पादकता कम होने के कारण मंहगाई बढ़ सकती है। खराब मानसून के कारण उत्पादकता कम होती है। जिससे उपभोक्ता की मांग पूरी नहीं हो पाती और आवश्यक खाद्य वस्तुओं का विदेशी मुद्रा में आयात करना पड़ेगा। भारी मानसूनी बारिश से भी काफी नुकसान होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में भारी बारिश के चलते फसलें नष्ट हो जाती हैं।
इन दोनों ही स्थितियों में कृषि ऋण छूट या सहायता राशि जैसे अनुदानों से सरकार पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ता है। राष्ट्रीय आय में गिरावट के चलते देश के राजस्व में भी गिरावट आती है। जिसके चलते अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान होता है। इसलिए कहा जाता है कि देश की खुशहाली मानसून पर बहुत निर्भर करती है।












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