Child Marriage: आज भी हर पांचवी लड़की बनती है बालिका वधु
Child Marriage: दुनिया में 65 करोड़ ऐसी महिलाएं हैं , जिनकी शादी बचपन में ही कर दी गई थी। हर साल, कम से कम डेढ़ करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले ही कर दी जाती है। हर मिनट लगभग 28 नाबालिग लड़कियां ब्याह दी जा रही हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार गरीब देशों में यह संख्या दोगुनी हो जाती है। यहां 40 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो जाती है, और 12 प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 साल की उम्र से भी पहले हो जाती है। हर पांच लड़कियों में से एक की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो जाती है।
बांग्लादेश का रिकॉर्ड बहुत खराब
दुनिया में बाल विवाह के लिए एशिया महाद्वीप सबसे ज्यादा बदनाम है। एशिया में सबसे अधिक बाल विवाह बांग्लादेश में होते हैं। यहां हर तीन में से दो लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हो जाती है। दूसरे नंबर पर भारत आता है। नेपाल और अफगानिस्तान क्रमश तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। अगर विश्व स्तर पर देखा जाए तो दुनिया में करीब 65 करोड़ लड़कियां या महिलाएं ऐसी हैं, जिनका विवाह बचपन में हुआ है। इनमें से आधे से ज्यादा केवल बांग्लादेश, ब्राज़ील, इथियोपिया, भारत और नाइज़ीरिया में है।

भारत में 23 करोड़ से ज्यादा बालिका वधू
भारत समेत दुनिया भर में बाल विवाह की प्रथा को लेकर बहुत बार चिंता और चिंतन का दौर चल चुका है। कानून बने और सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने की कोशिशें हुईं, लेकिन तमाम जागरूकता और जरूरत की समझ विकसित होने के बावजूद आज आलम यह है कि यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ भारत में ही 23 करोड़ से ज्यादा बालिका वधू हैं। हर साल करीब साढ़े पंद्रह लाख बाल विवाह हो रहे हैं। इसमें से देश के पांच राज्यों में सर्वाधिक बाल विवाह होते हैं। इन पांच में भी सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में है, जहां 3.6 करोड़ बालिका वधू हैं।
तीन सौ साल में भी नहीं बदली दशा
सवाल यह है कि बाल-विवाह जैसी कुप्रथा के विरुद्ध समाज सुधारकों के प्रयासों के तीन सौ साल बाद भी हम अभी तक इससे मुक्त नहीं हो पाये हैं तो इसकी वजह क्या है। क्या समाज को जागरूक करने में इतने साल से हम नाकाम रहे या अपनी रूढ़िवादिता के प्रति हम श्रापग्रस्त हैं या फिर बदलते वैश्विक माहौल में समाज का एक वर्ग कदमताल करने में खुद को असमर्थ पाता है। वजह को लेकर तमाम बातें कही जा सकती हैं, लेकिन भारत जैसे विशाल आबादी वाला देश ही इससे परेशान नहीं है, हमारे पड़ोसी बांलादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल से लेकर अमेरिका, कनाडा, कई अफ्रीकन देशों तक में बाल विवाह जारी है।
नैतिक अनुशासन न होने से कानून का खौफ नाकाम
यह मसला कानूनी से ज्यादा सदियों पुरानी परंपरा, मानवीय भावना, शारीरिक जरूरत, नैतिकता और अनैतिकता तथा गरीबी-अमीरी से भी जुड़ा रहा है। ऐसे में सिर्फ कानून बनाकर इसका सीमांकन नहीं किया जा सकता है। असल में किसी चीज को मानने या न मानने के पीछे अनुशासन का नैतिक बल भी होना चाहिए। कानून का पालन डर दिखाकर नहीं होगा, उसके साथ नैतिकता का आग्रह भी बहुत जरूरी है, पर दुर्भाग्य से इस पर चर्चा मात्र से ही हम दकियानूसी विचारधारा वाले मान लिये जाते हैं। यही वजह है कि कानून का पालन करने के बजाए हम कानून से बचने का जुगाड़ खोजने को ज्यादा तवज्जो देते हैं।
प्रेम का बंधन भी बिगाड़ रहा खेल
कई बार विवाह का कारण प्रेम होता है, और प्रेम किसी तरह की सीमा या बंधन को स्वीकार नहीं करता है, लिहाजा जब कच्ची उम्र के बालक का हमउम्र की किसी बालिका से प्रेम हो जाता है तो वह उसे लेकर घर से भाग जाने या विद्रोह करके अलग हो जाने जैसा कदम उठाने से भी नहीं चूकता है। वह अलग मुद्दा है कि ऐसे प्रेम में अक्सर स्थायित्व नहीं होता है और कुछ दिन बाद जब चुनौतियों से सामना होता है तब उन्हें अक्ल आती है।
असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने छेड़ी जंग
भारत में ही असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने इस कुप्रथा के खिलाफ सक्रिय जंग छेड़ दी है। वहां राज्य सरकार 14 साल से कम उम्र की बालिका से शादी करने पर पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज कर कार्रवाई कर रही है। इसके अलावा 14 से 18 साल के बीच की बालिका से शादी करने पर बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के तहत रिपोर्ट दर्ज एक्शन ले रही है। इसके चलते अब तक वहां पर लगभग 3000 लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है। इसमें महिला और पुरुष दोनों शामिल हैं।
2030 तक भारत को बाल-विवाह मुक्त देश बनाने की पहल
नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का चिल्ड्रेन्स फ़ाउंडेशन 2030 तक भारत को बाल-विवाह मुक्त देश बनाने की दिशा में काम कर रहा है। फाउंडेशन का मानना है कि ऐसा करने में वह सफल होंगे। इसी तरह बचपन बचाओ आंदोलन, सेव द चिल्ड्रन, 'चाइल्ड राइट्स एंड यू' (क्राई) जैसे संगठन भी इसके लिए काम कर रहे हैं। बहरहाल इस कुप्रथा के पीछे शिक्षा की कमी, गरीबी की बेबसी, लैंगिक भेदभाव, जागरूकता का अभाव और सामाजिक दबाव जैसी प्रमुख वजह भी है।
भारत में बाल विवाह को रोकने के लिए बने कानून
इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए भारत में 28 सितंबर 1929 को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ऑफ इंडिया में 'बाल विवाह प्रतिबन्ध अधिनियम, 1929 पारित हुआ। इसके तहत शादी के लिए न्यूनतम आयु लड़कियों की 14 वर्ष और लड़कों की 18 वर्ष तय की गई थी। यह कानून पूरी तरह से 1 अप्रैल 1930 से लागू हुआ था। हालांकि 1978 में एक संशोधन के तहत इसे लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 वर्ष कर दिया गया। इस कानून को लाने के पीछे हरविलास शारदा के प्रयास थे। उनके नाम पर इसे 'शारदा अधिनियम' कहा जाने लगा था। 2006 में बाल विवाह प्रतिषेध कानून बनाया गया। इसमें बाल विवाह को संज्ञेय और गैरजमानती अपराध घोषित किया गया।
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