Gita Press: हिंदू धर्म और मानवता की सेवा के 100 वर्ष, गीता प्रेस ने अब तक 92 करोड़ किताबें छापी
हिंदू पंचांग के मुताबिक गत वर्ष 14 मई को गीता प्रेस के शताब्दी वर्ष का शुभारंभ हुआ था। अगर हिंदू धर्म में किसी को कोई धार्मिक पुस्तक चाहिए तो सबसे पहले उसके दिमाग में गीता प्रेस का ही नाम आता है। 100 सालों से यह नाम एक ब

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर का नाम जेहन में आते ही दो स्थान ध्यान में आते हैं। पहला, नाथ संप्रदाय की गुरु पीठ गोरखनाथ मंदिर और दूसरा, गीता प्रेस। ऐसा कहते हैं कि गीता प्रेस की स्थापना ईश्वरीय प्रेरणा से हुई। यही वजह रही कि धर्म, संस्कृति और परंपरा को समेटे हुए गीता प्रेस ने 100 बंसत देखे, पतझड़ कभी नहीं देखा। आज यहां 15 भाषाओं में 1848 प्रकार की रोजाना 70 हजार किताबें प्रकाशित होती हैं।
गीता प्रेस कैसे शुरू हुई?
गीता प्रेस की स्थापना करने वाले चूरू राजस्थान के निवासी जयदयाल गोयन्दका (सेठजी) गीता-पाठ, प्रवचन में रुचि लेते थे। व्यापार के सिलसिले में उनका कोलकाता आना-जाना होता रहता था। वहां वह दुकान में भी सत्संग किया करते थे। धीरे-धीरे सत्संगियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि जगह की समस्या खड़ी होने लगी। इस पर उन्होंने कोलकाता में बिड़ला परिवार के एक गोदाम को किराए पर लिया और उसका नाम रखा गोविंद भवन।
स्वाध्याय के दौरान जयदयाल को प्रेरणा मिली कि गीता सभी के लिए सर्वसुलभ होनी चाहिए। सेठजी ने गोविंद भवन सोसाइटी की तरफ से कोलकाता के ही वणिक प्रेस से गीता की प्रतियां छपवाईं। लेकिन, मुद्रण में कईं त्रुटियां थी। उन्होंने इसे कई बार दुरुस्त करने के लिए कहा तो प्रेस संचालक ने बार-बार संशोधन को मुमकिन नहीं बताते हुए कहा कि "आप इतनी शुद्ध पुस्तक चाहते हैं तो अपनी निजी प्रेस लगवाकर छपवाएं।"
संचालक की टिप्पणी को जयदयाल गोयंदका ने ईश्वर का संदेश माना और गीता प्रेस की गोरखपुर में नींव पड़ी। सेठ जयदयाल की मदद की गोरखपुर के साहबगंज निवासी सेठ घनश्यामदास और महावीर प्रसाद पोद्दार ने। 23 अप्रैल 1923 को गोरखपुर के हिंदी बाजार में 10 रुपये किराए पर मकान लिया और प्रेस की स्थापना कर नाम रखा 'गीताप्रेस'। जरूरत के साथ 1926 में वर्तमान गीताप्रेस की जमीन खरीदी गई, जो दो लाख वर्ग फिट में है।
दुनिया के हर कोने में पहुंचाई गीता और रामायण
समय के साथ प्रेस का विस्तार होता चला गया। करीब 5 महीनों बाद 600 रुपये में हैंडप्रेस प्रिंटिंग मशीन खरीदी गई। धीरे-धीरे किराए का मकान भी छोटा पड़ने लगा तब शेषपुर में 12 जुलाई 1926 को 10 हजार रुपये में वर्तमान के गीताप्रेस के पूर्वी हिस्से को खरीदा गया, बाद में इसका भी विस्तार हुआ। गीता प्रेस सनातन-धर्म की अब तक 92 करोड़ किताबें छाप चुका है, जोकि एक रिकॉर्ड है। अकेले इस साल 2 करोड़ 42 लाख किताबें छापी हैं। प्रेस की आय में भी इजाफा हुआ है। आज दुनिया के हर कोने में रामायण, गीता, वेद, पुराण और उपनिषद से लेकर प्राचीन भारत के ऋषियों - मुनियों की कथाओं को पहुंचाने का श्रेय सनातन के साहित्य को प्राणवायु देने वाली गीता प्रेस को जाता है।
विज्ञापन व अनुदान नहीं लेती है गीता प्रेस
गीता प्रेस से छपने वाली सबसे लोकप्रिय मासिक पत्रिका कल्याण समेत किसी भी पुस्तक में विज्ञापन नहीं छपता। अब तक कल्याण की 16.77 करोड़ प्रतियां प्रकाशित हो चुकी है। 1926 में मुंबई से कल्याण का प्रकाशन हुआ। बाद में 1927 से गोरखपुर गीता प्रेस में ही कल्याण का प्रकाशन शुरू हो गया। पहले अंक में गांधीजी का भी लेख छपा था। गांधीजी ने कल्याण की प्रशंसा करने के साथ आग्रह भी किया था कि कल्याण या गीता प्रेस से प्रकाशित होने वाली किसी भी पुस्तक में बाहरी विज्ञापन न प्रकाशित किया जाए। गीता प्रेस कोई अनुदान नहीं लेता।
अपने आप में एक संपूर्ण तीर्थ स्थल है गीता प्रेस, दीवार पर लिखी है संपूर्ण गीता
गीता प्रेस का लीला चित्र मंदिर अपने आप में अनोखा है। ऐसा मंदिर पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। यहां श्रीमद्भागवतगीता के 18 अध्याय दीवारों पर लिखे गए हैं। साथ ही सैकड़ों की संख्या में देवी-देवताओं के चित्र एक ही छत के नीचे मौजूद हैं। इसका उद्घाटन 29 अप्रैल 1955 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था।
मंदिर में पूर्व की तरफ भगवान श्रीकृष्ण और पश्चिम की तरफ श्रीराम के लीला-चित्र हैं। दक्षिण की तरफ दशावतार व इससे जुड़े चित्र हैं, तो उत्तर की ओर नवदुर्गा समेत अनेक देवियों के चित्र हैं। यहां कई चित्र ऐसे हैं जो 200 सालों से भी ज्यादा पुराने हैं। इसके साथ ही इस मंदिर में महात्मा गांधी का पत्र, पहली छपाई मशीन, कॉम्पैक्ट डिस्क पर लिखी गई संपूर्ण गीता आकर्षण का केंद्र है।
प्रवेश द्वार पर होते हैं 17 तीर्थों के दर्शन
गीता प्रेस के प्रवेश द्वार पर ही 17 तीर्थस्थानों के दर्शन हो जाते है। दुनिया में ऐसा कोई दूसरा द्वार नहीं है जिसमें एक साथ इतने तीर्थों के दर्शन हो सके। चारों दिशाओं से यह द्वार अनूठा दिखता है। मुख्य द्वार पर हिंदू के साथ बौद्ध, जैन एवं सिख धर्मों के पूजा स्थलों का समावेश हैं। इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग गोरखपुर आते है। इसका भी उद्घाटन पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था। छपाई में लगे कर्मचारी किताब की फाइनल बाइंडिंग के वक्त जूता-चप्पल उतारकर काम करते हैं, ताकि पाठकों की श्रद्धा और विश्वास से धोखा न हो।












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