Maithili Sharan Gupt: वह कवि जिनकी कविताओं से हिल जाती थी अंग्रेजी हुकूमत
Maithili Sharan Gupt: नर हो, न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो, जग में रह कर कुछ नाम करो; चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में - जैसी कविताएं लिखने वाले राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त का आज जन्मदिवस है। मैथली शरण की लिखी 'भारत भारती' एक ऐसी रचना थी, जिसे अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था।
झांसी के निकट चिरगांव में 3 अगस्त 1886 को एक वैश्य परिवार में जन्में मैथिलीशरण गुप्त का नाम परिवार ने मिथिलाधिप नंदनशरण रखा था। पर स्कूल के रजिस्टर की एक पंक्ति में इतना बड़ा नाम समा नहीं रहा था तो इसे छोटा कर मैथिलीशरण कर दिया गया। इस तरह मिथिलाधिप नंदनशरण से वह मैथिलीशरण गुप्त हो गये। इन्होंने बचपन में स्वर्णलता नाम से छप्पय लिखे। फिर किशोरावस्था में रसिकेश, रसिकेंदु आदि नाम का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया। इसके साथ ही अनुवाद का कार्य मैथिलीशरण ने मधुप नाम से किया। इसके अलावा भारतीय और नित्यानंद नामों से अंग्रेज सरकार के खिलाफ कविताएं लिखी।

खड़ी बोली के कवि बनने की कहानी
उन दिनों महावीर प्रसाद द्विवेदी झांसी में सरस्वती पत्रिका का संपादन करते थे। सरस्वती उस दौर की हिंदी की सबसे अच्छी पत्रिका थी। सरस्वती में रचनाएं छपना किसी भी लेखक के लिए सम्मान की बात हुआ करती थी। एक दिन युवा मैथिलीशरण हिम्मत करके आचार्य द्विवेदी से मिलने गये और कहा कि मैं चाहता हूं कि मेरी कविता भी सरस्वती में प्रकाशित हो। इस पर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि बहुत से लोग चाहते हैं कि उनकी रचनाएं सरस्वती में छपे। और आप तो ब्रज भाषा में लिखते हैं। सरस्वती खड़ी बोली की पत्रिका है। मैं भला कैसे छाप सकता हूं?
इस पर मैथिलीशरण ने कहा कि यदि उन्हें मौका दें तो वह खड़ी बोली में भी कविताएं लिख सकते हैं। तब द्विवेदी जी ने कहा कि यदि वह रचना प्रकाशित करने लायक होगी तो ही उसे छापा जाएगा। इसके बाद मैथिलीशरण ने खड़ी बोली में कविता लिखकर भेजी। इसके बाद 1905 से लेकर 1921 तक सरस्वती में लगातार मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएं छपती रहीं।
अंग्रेजों ने लगाया प्रतिबंध
आजादी के आंदोलन के समय कलम एक बहुत बड़े हथियार का काम करती थी। अन्य रचनाकारों के साथ इसमें मैथिलीशरण भी शामिल थे। वह भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों में जोश भरने का काम करते थे। उनकी एक रचना भारत भारती की लोकप्रियता का आलम यह था कि सारी प्रतियां देखते ही देखते समाप्त हो गयी और 2 महीनों के भीतर दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा था।
भारत भारती साहित्य जगत में आज भी ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसमें मैथिलीशरण गुप्त ने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों की बात कही है। यह एक ऐसी रचना थी जिसने अंग्रेजी हुकमरानों की नींद गायब कर दी थी। लोग इस रचना से इतने प्रभावित हो रहे थे कि इसने ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया था। अंत में अंग्रेजी सरकार को इस पर प्रतिबंध लगाना पड़ गया था।
प्रमुख रचनाएं और सम्मान
जयद्रथवध, साकेत, पंचवटी, सैरन्ध्री, बक संहार, यशोधरा, द्वापर, नहुष, जयभारत, हिडिम्बा, विष्णुप्रिया एवं रत्नावली आदि इनकी प्रमुख रचनाएं हैं। 1952 में वह राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए और 1954 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1987-88 से उनके सम्मान में मैथिलीशरण गुप्त सम्मान प्रारम्भ किया गया था। इसके साथ ही उन्हें डीलिट उपाधि, हिन्दुस्तान अकादमी पुरस्कार, साहित्य वाचस्पति आदि पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया।












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