Bismillah Khan: काशी को जन्नत मानते थे बिस्मिल्लाह खान, हनुमान मंदिर में करते थे रियाज
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की आज 107वीं जयंती है। खुद पर बनी एक डॉक्युमेंट्री में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने कहा था कि गंगा जी सामने है, यहां नहाइये, मस्जिद है, नमाज पढ़िए और बालाजी मंदिर में जा कर रियाज करिए।

Bismillah Khan: शहनाई का नाम सुनते ही एक चेहरा हमारे ध्यान में आ जाता है। बचपन में कमरुद्दीन के नाम से पहचाने जाने वाला एक बालक बड़ा होकर देश का सबसे बड़ा शहनाई वादक बनता है और उनको हम सभी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के नाम से जानते है। दरअसल, कमरुद्दीन को बिस्मिल्लाह खान नाम अपने दादा से मिला था। कहा जाता है कि एक दिन जैसे ही कमरुद्दीन को उनके दादा ने गोद में उठाया था तो उनके मुंह से निकला था 'बिस्मिल्लाह'। बस उसी दिन से कमरुद्दीन बिस्मिल्लाह खान हो गए।
शहनाई वादन की शुरुआत
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के बक्सर जिले में हुआ था। उनके पिता बिहार की डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद के दरबार में शहनाई बजाया करते थे। छह साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खां अपने पिता के साथ बनारस आ गए। यहां उन्होंने अपने चाचा अली बख्श विलायती से शहनाई वादन करना सीखा। उनके उस्ताद अली बख्श श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई वादन किया करते थे। बिस्मिल्लाह खान साहब अपने चाचा के साथ बनारस के घाट पर जाते और वहां बैठकर शहनाई बजाना सीखते। इसके बाद उनके चाचा ने उन्हें काशी विश्वनाथ मंदिर में अपने साथ शहनाई बजाने का मौका दिया। दोनों मिलकर मंदिरों और हिंदू शादियों में शहनाई बजाने लगे।
काशी को जन्नत मानते थे खान साहब
काशी विश्वनाथ के प्रति उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की अपार श्रद्धा थी। वह जब काशी से बाहर रहते थे तब काशी स्थित बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुंह करके बैठते थे। काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा रही है। यह आयोजन संकटमोचन मंदिर में होता है। यहां 5 दिनों तक हनुमान जयंती के अवसर पर शास्त्रीय एवं उप शास्त्रीय गायन और वादन किया जाता है। इस कार्यक्रम में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भी शिरकत करते थे।
'नौबतखाने में इबादत' लिखने वाले यतींद्र मिश्र ने लिखा है कि एक बार उन्होंने कहा था कि क्या करें मियां, इ काशी छोड़कर कहां जाएं। गंगा मैया यहां, बाबा विश्वनाथ यहां, बालाजी का मंदिर यहां, यहां हमारे खानदान की कई पुश्तों ने शहनाई बजाई है। हमारे नाना तो बालाजी मंदिर में बड़े प्रतिष्ठित शहनाई वादक रह चुके है। अब हम क्या करें, मरते दम तक न तो यह शहनाई छूटेगी, न काशी। जिस जमीन ने हमें तालीम दी, जहां से अदब पाई, वह और कहां मिलेगी। शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं है इस धरती पर हमारे लिए।
मां सरस्वती की पूजा
बिस्मिल्लाह खान जन्म से मुस्लिम थे और पांच वक्त के नमाजी भी। मगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, मां सरस्वती की पूजा भी करते थे। यही कारण रहा कि मां सरस्वती की कृपा बिस्मिल्लाह पर बरसी और उनका हुनर बढ़ता गया। उन्हें ऑल इंडिया म्यूजिक कांफ्रेंस कलकत्ता में संगीत के महारथियों के सामने शहनाई बजाने का मौका मिला। कलकत्ता से बिस्मिल्लाह खान ने इतना नाम कमाया कि वह जैसे ही वापस काशी लौटे तो ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ ने उन्हें नौकरी पर रख लिया।
आजादी के दिन बजायी शहनाई
देश की आजादी के समय 1947 में उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के कहने पर लाल किले पर शहनाई बजाई थी। इसके बाद 1950 में उन्होंने भारत के पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल किले से अपनी शहनाई से राग कैफी छेड़ा था। वह राग इतना बुलंद था कि आज तक उसका इस्तेमाल गणतंत्र दिवस के मौके पर किया जाता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दूरदर्शन और आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून में भी बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की आवाज है।
यह बिस्मिल्लाह खान की मेहनत का फल ही है कि लोगों ने शहनाई को इतनी तवज्जो दी है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब को भारत रत्न, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और पद्म श्री जैसे सभी भारतीय सर्वोच्च पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। हालांकि, उनका एक सपना इंडिया गेट पर शहनाई वादन करने का था लेकिन वह कभी पूरा नहीं हो सका। 21 अगस्त 2006 को इस महान शख्सियत ने इस दुनिया से अंतिम विदा ली।
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