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Australia Referendum: क्यों हो रहा है ऑस्ट्रेलिया में जनमत संग्रह?

Australia Referendum: ऑस्ट्रेलिया में एक नया जनमत संग्रह हो रहा है। यह जनमत संग्रह तय करेगा कि देश के मूल निवासियों को 'वॉयस टू पार्लियामेंट' का अधिकार दिया जायेगा कि नहीं। यानि संसद में एक स्थायी समिति, जो उनसे (आदिवासियों) जुड़े हर फैसले पर अपनी राय दे सके।

ऑस्ट्रेलिया में यह जनमत संग्रह 14 अक्टूबर को होगा। मतदान से ही यह तय होगा कि मूल आदिवासी और टोरेस स्ट्रेट द्वीप के लोगों को मान्यता देने के लिए संविधान में बदलाव लाया जाएगा कि नहीं। यह देश के मूल निवासियों के संघर्ष का निर्णायक दिन होगा।

Australia Referendum: Why is referendum happening in Australia?

आस्ट्रेलिया में एक करोड़ 70 लाख से अधिक पंजीकृत मतदाता हैं जो जनमत संग्रह में हिस्सा होंगे। 'वॉयस टू पार्लियामेंट' नामक इस ऐतिहासिक जनमत संग्रह का परिणाम यदि संविधान में आदिवासी और टोरेस स्ट्रेट में रहने वाले लोगों को मान्यता देने के पक्ष में आता है तो यह उनके लिए एक नया सवेरा होगा। वैसे ऑस्ट्रेलिया इस मुद्दे पर काफी हद तक बंटा हुआ है। सरकार वॉयस टू पार्लियामेंट' की स्थापना के समर्थन में अभियान चला रही है, लेकिन एक बहुत बड़ा समुदाय उसका विरोध भी कर रहा है।

क्या है जनमत संग्रह?

मार्च, 2023 में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीजी ने मूल निवासियों को संसद में स्थायी स्थान देने के लिए जनमत संग्रह करने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि बहुत से लोगों को इस पल का लंबे समय से इंतजार था फिर भी उन्होंने पूरी प्रक्रिया के दौरान धैर्य से काम लिया।

ऑस्ट्रेलिया में अब इस बात की कोशिश की जा रही है कि हजारों सालों से इस जमीन पर रह रहे मूल निवासियों को संवैधानिक रूप से ज्यादा मान्यता और अधिकार मिलें, जबकि 122 साल पुराने संविधान में उनका जिक्र तक नहीं है। उल्लेखनीय है कि ऑस्ट्रेलिया में किसी भी संवैधानिक परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय जनमत संग्रह की आवश्यकता होती है।

ऑस्ट्रेलिया की कुल 2.6 करोड़ आबादी में मूल निवासी मात्र 3.2 प्रतिशत हैं। सामाजिक-आर्थिक मानकों पर उनका जीवन स्तर अन्य लोगों से कहीं ज्यादा नीचे है। अंग्रेजों द्वारा ऑस्ट्रेलिया की धरती पर कब्जा करने के बाद से वे लगातार पीड़ित और दमित वर्ग बने रहे। 1960 के दशक तक तो उन्हें मतदान का भी अधिकार नहीं था।

ऑस्ट्रेलिया में जनमत संग्रह का इतिहास

साल 1901 में ऑस्ट्रेलिया का संविधान अस्तित्व में आया था, तब से देश में अब तक 44 बार इसमें संशोधन का प्रस्ताव लाया गया, जिनमें से 19 के लिए जनमत संग्रह कराए गए और सिर्फ आठ पास हुए। ऑस्ट्रेलिया में जनमत संग्रह को सफल होने के लिए देश भर में 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं का समर्थन प्राप्त होना चाहिए और छह राज्यों में से कम से कम चार में अधिकांश मतदाताओं का समर्थन मिलना चाहिए।

वैसे जनमत संग्रह में मतदान करना मतदाता सूची में शामिल लोगों के लिए उसी तरह अनिवार्य किया गया है, जिस तरह आम चुनाव में मतदान करना अनिवार्य है। अंतिम बार ऑस्ट्रेलिया में साल 1999 में जनमत संग्रह हुआ था। जब ऑस्ट्रेलिया के लोगों से देश को ब्रिटिश साम्राज्य से अलग करके गणतंत्र बनाकर राष्ट्रपति को राष्ट्राध्यक्ष बनाने के बारे में पूछा गया था। तब लोगों ने इसके खिलाफ मतदान किया था।

भारत पर क्या होगा जनमत संग्रह का असर?

ऑस्ट्रेलिया में होने वाले इस जनमत संग्रह पर दुनियाभर के देशों की नजर है। इसके नतीजों पर ऑस्ट्रेलिया के सहयोगियों में भारत की भी खासी दिलचस्पी हो सकती है। क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में 3.1 प्रतिशत भारतीय निवास करते हैं। वहीं अगर इस जनमत संग्रह के दौरान कुछ विवाद होता है तो उसका असर भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों पर भी पड़ सकता है।

दरअसल 2022 में भारत ऑस्ट्रेलिया का छठा सबसे बड़ा दो-तरफा सामान और सेवा व्यापार भागीदार और चौथा सबसे बड़ा सामान और सेवा निर्यात बाजार था। 2022 में भारत के साथ दो-तरफा वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार 48.4 बिलियन डॉलर था। भारत में ऑस्ट्रेलिया का निर्यात 2022 में कुल 34.8 बिलियन डॉलर और भारत से आयात 13.5 बिलियन डॉलर था।

अब अगर ऑस्ट्रेलिया में जनमत संग्रह के दौरान कुछ विवाद हुए तो भारत के साथ व्यापार पर भारी नुकसान हो सकता है। जिसका जिक्र ऑस्ट्रेलियाई कॉलमनिस्ट और विश्लेषक डीजे टॉम वॉइस भी करते हैं। डीडब्ल्यू वेबसाइट के मुताबिक डीजे टॉम, ऑस्ट्रेलिया में होने वाले जनमत संग्रह की तुलना भारत में संविधान द्वारा लाए गए आरक्षण से करते हैं।

टॉम कहते हैं कि इस जनमत का मकसद ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों द्वारा झेले जा रहे भेदभाव को दूर करना है। जैसे आरक्षण के जरिए भारत में दलितों के हालात बेहतर बनाने की कोशिश की गयी थी। भारत में भी जब पिछड़ों को आरक्षण दिया गया तब उसका जमकर विरोध हुआ, हड़तालें हुईं और लोगों ने खुद को आग तक लगा ली थी। बहुत से लोग उस कदम को 'उलटा भेदभाव' कहते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी आलोचकों का यही तर्क है और वे कहते हैं कि वॉयस लोगों को साथ लाने की जगह बंटवारे की वजह बन सकती है।

कई भारतीय कर रहे हैं इस जनमत का समर्थन

जर्मन वेबसाइट डीडब्ल्यू के एक लेख के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में तेजी से बढ़ता भारतीय समुदाय भी इस जनमत संग्रह को लेकर काफी उत्सुक है। क्योंकि, एशियाई मूल के लोगों का एक संगठन मूल निवासियों के समर्थन में है। 'देसीज फॉर यस' नाम से यह संगठन 'वॉइस टू पार्लियामेंट' के समर्थन में दक्षिण एशियाई मूल के ऑस्ट्रेलियाई लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहा है।

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