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Sun Temples: भारत के वे अद्भुत मंदिर जिनका डिजाइन है सूर्य किरणों आधारित

कोणार्क के सूर्य मंदिर से लेकर कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर तक ऐसे कई मंदिर हैं जहां सूर्य की किरणें मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचती है। सैकड़ों साल पहले बने ये मंदिर भारतीय वास्तुकला के बेजोड़ उदाहरण हैं।

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Sun Temples: भारत के मंदिर केवल पूजा के स्थान ही नहीं बल्कि बहुत ही अद्भुत वास्तुकला का एक उदाहरण भी हैं। ये वास्तुकलाएं भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की गवाही देती हैं। भारत में ऐसे कई मंदिर है जिनके गर्भगृह में सूरज की रोशनी प्रवेश करती है, क्योंकि उन मंदिरों को उस तरह से डिजाइन किया गया है। आइए जानते हैं भारत के ऐसे ही कुछ मंदिरों के बारे में!

अरसावल्ली सूर्य मंदिर

अरसावल्ली सूर्य मंदिर भगवान सूर्य का मंदिर है, जो आंध्र प्रदेश के अरसावल्ली गांव में स्थित है। मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी में कलिंग के पूर्वी गंगा राजवंश के एक महान शासक राजा देवेंद्र वर्मा ने करवाया था। यह मंदिर ओडिशा के पुरी जगन्नाथ मंदिर की तरह कलिंग वास्तुकला की रेखा देउला शैली में बनाया गया था। मंदिर को भारत के सबसे पुराने सूर्य मंदिरों में से एक माना जाता है। सुबह के समय सूर्य की किरणें साल में दो बार देवता के चरणों पर पड़ती हैं। मंदिर में मुख्य देवता काले पत्थर से बने है और उन्हें श्री सूर्यनारायण स्वामी के रूप में पूजा जाता है।

महालक्ष्मी मंदिर

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित महालक्ष्मी मंदिर किरणोत्सव महोत्सव के लिए प्रसिद्ध है। जिस दिन सूर्योदय के समय सूर्य की किरणें सीधे महालक्ष्मी की मूर्ति पर पड़ती है तब किरणोत्सव मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य भगवान इस समय के दौरान महालक्ष्मी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। त्यौहार देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा करके मनाया जाता है। मंदिर 7वीं शताब्दी में चालुक्य राजवंश के राजा करमदेव द्वारा बनाया गया था।

मार्तंड सूर्य मंदिर

मार्तंड सूर्य मंदिर एक प्राचीन हिंदू मंदिर है जो जम्मू और कश्मीर के अनंतनाग शहर के पास स्थित है। यह कर्कोटा राजवंश के ललितादित्य मुक्तपीड़ द्वारा आठवीं शताब्दी ईस्वी के दौरान बनाया गया था। यह मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इस मंदिर को राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया है। मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए जाना जाता है, जिसे इस तरह से डिजाइन किया गया था कि सूरज की रोशनी पूरे दिन सूर्य भगवान की मूर्ति पर पड़ती रहे। यह मंदिर कोणार्क और मोढेरा के सूर्य मंदिरों से भी बहुत पुराना है।

कोणार्क सूर्य मंदिर

कोणार्क सूर्य मंदिर ओडिशा में स्थित है। इसे साल 1250 में पूर्वी गंगा वंश के राजा नरसिम्हदेव प्रथम द्वारा सूर्य भगवान की पूजा करने के लिए बनवाया गया था। यह मंदिर वास्तुकला का एक बहुत ही जबरदस्त उदाहरण है। मंदिर की वास्तुकला इस प्रकार है कि सूर्य की पहली किरणें मंदिर के मुख्य द्वार पर पड़ती हैं। फिर सूर्य का प्रकाश इसके विभिन्न द्वारों के माध्यम से मंदिर में प्रवेश कर गर्भगृह को रोशन करता है। कोणार्क सूर्य मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सूची में भी शामिल है।

मोढ़ेरा सूर्य मंदिर

मोढ़ेरा सूर्य मंदिर, मेहसाणा, गुजरात में स्थित है। यह भी सूर्य देवता को समर्पित है। मंदिर का निर्माण 1026-27 में चालुक्य वंश के भीम प्रथम के शासनकाल में हुआ था। मंदिर वास्तुकला को मारू-गुर्जर शैली में बनाया गया था और पूरी तरह से बलुआ पत्थर से बना है। मंदिर को इस तरह से डिजाइन किया गया था कि 21 मार्च और 21 सितंबर को सूर्य की पहली किरणें गर्भगृह में सूर्य की मूर्ति पर पड़ती हैं। मंदिर के गुडामंडप और सभामंडप में जटिल नक्काशीदार स्तंभ हैं जो सूर्य के प्रकाश को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति देते है। मंदिर की सीढ़ीदार पानी की टंकी, जिसे सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है, को भी सूर्य के प्रकाश को मंदिर में प्रवेश करने के लिए बनाया गया था।

सूर्य नारायण मंदिर

सूर्य नारायण मंदिर जो राजस्थान के रणकपुर में स्थित है। यह 13वीं शताब्दी में निर्मित एक प्राचीन मंदिर है जिसका 15वीं शताब्दी में पुनर्निर्माण किया गया। मंदिर सफेद चूना पत्थर से नागर शैली में बनाया गया है। मंदिर की वास्तुकला सूर्य के प्रकाश को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति देती है, जो मंदिर के अंदर के हिस्से को रोशन करती है। मंदिर इस तरह से बनाया गया है कि दिन के समय सूर्य की किरणें सूर्य भगवान की मूर्ति पर पड़ती हैं।

गवी गंगाधरेश्वर मंदिर

बैंगलोर का गवी गंगाधरेश्वर मंदिर एक ऐतिहासिक गुफा मंदिर है जो मकर संक्रांति के दिन होने वाले एक चमत्कार के लिए जाना जाता है। हर साल 14 जनवरी के दिन सूर्य की रोशनी की एक किरण दक्षिणमुखी गुफा मंदिर की दो खिड़कियों से गुजरती है और नंदी के सींगों के माध्यम से गर्भगृह में शिवलिंग को छूती हुई नीचे आती है। यह पूरी गतिविधि दो मिनट और 46 सेकंड तक चलती है। इस दुर्लभ घटना को देखने के लिए इस दिन हजारों श्रद्धालु मंदिर आते हैं। गवी गंगाधरेश्वर मंदिर की घटना को वैज्ञानिकों द्वारा सत्यापित किया गया है।

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