1857 Revolution: नानाजी पेशवा ने 1855 में ही बना ली थी क्रांति की योजना
ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 का महासंग्राम संगठित करने का सबसे पहला इरादा नाना साहब के मन में पैदा हुआ था।

1857 Revolution: सन 1857 में आज ही के दिन अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने के दृढ़ संकल्प के साथ प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत हुई थी। इस संग्राम की शुरुआत औपचारिक रूप से 10 मई 1857 को मेरठ से हुई थी। जो फिर कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों सहित देशभर में फैल गई। मगर बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि इसकी नींव तो नानाजी पेशवा और उनके साथी पहले ही रख चुके थे। आइये आज तथ्य से जुड़ी अन्य बातों को विस्तार से जानते हैं।
पेंशन न देना बना पहला कारण
1857 से पहले, कानपुर के पास बिठूर नाम का शहर मराठा पेशवा, नानाजी का गढ़ बना हुआ था। इसी शहर में उनकी मुलाकात अजीमुल्लाह खान नाम के एक व्यक्ति से हुई। इस मुलाकात में युवा अजीमुल्लाह ने अपनी बुद्धिमानी और समझदारी की छाप पेशवा पर छोड़ दी थी। अतः जल्दी ही वह नानाजी पेशवा के करीबी सलाहकार बन गये।
वैसे इस मुलाकात का तार्किक कारण यह था कि नानाजी के पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध संघर्ष में समर्पण कर दिया था। बदले में उन्हें और उनके परिवार को कंपनी से आठ लाख रुपये की सालाना पेंशन दी जाती थी। 1 जून 1818 को संधि की शर्तों के अनुसार पेशवा को पूना छोड़कर बिठूर में रहने के लिए एक जागीर दी गयी। 28 जनवरी 1851 को पेशवा बाजीराव ने अपने निधन से पहले ही नाना साहब को अपना ज्येष्ठ पुत्र मानते हुए उत्तराधिकारी एवं प्रतिनिधि घोषित कर दिया था। हालांकि, कंपनी के तत्कालीन गवर्नर-जनरल डलहौजी ने पेशवा बाजीराव को मिलने वाली पेंशन को उनके दत्तक पुत्र नानाजी को देने से इंकार कर दिया।
असल में तो कंपनी की नजर पेशवाई की जागीर को हड़पने पर थी। पेंशन न देने के लिए बहाने बनाए जाने लगे जैसे कि "पेशवा ने पहले ही बहुत सी धन-संपत्ति अर्जित की हुई है।" बावजूद इसके, नाना ने पेंशन फिर से जारी करवाने के लिए कई असफल प्रयास किये। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक मेमोरियल भी भेजा, जिसका अंग्रेजों द्वारा जवाब इस प्रकार था, "स्मृतिकर्ता को सूचित करें कि उसके दत्तक पिता की पेंशन वंशानुगत नहीं थी, अतः उसके पास इसका दावा करने का अधिकार नहीं है और उनका आवेदन पूरी तरह से अस्वीकार्य है।" इसके बाद साल 1852 में उन्होंने रानी विक्टोरिया के लन्दन स्थित कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स में भी अपील की लेकिन फैसला नानाजी के पक्ष में नहीं आया।
लंदन में भारत को आजाद करवाने का आया विचार
चूंकि, अजीमुल्लाह की अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ थी, तो नानाजी पेशवा ने अपनी ओर से उन्हें लन्दन उनकी पैरवी करने भेजा। उनके साथ मोहम्मद अली खान नाम का एक सहायक भी था। जब 1854 में अजीमुल्लाह कलकत्ता से लन्दन पहुंचे, तो उनकी मुलाकात रंगो बापूजी से हुई। रंगो बापूजी गुप्ते का भी सम्बन्ध मराठाओं से था। दरअसल वह सतारा के छत्रपति के यहां काम करते थे। वह भी लन्दन में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के समक्ष अपने छत्रपति का पक्ष रखने के सिलसिले में 1840 से वहां मौजूद थे। हालांकि, इन मुलाकातों से यह तो स्पष्ट है कि दोनों ने भारत लौटने से पहले भारत को ईस्ट इंडिया कंपनी से स्वतंत्र कराने का निश्चय कर लिया था।
वहीं अजीमुल्लाह खान भी रंगो बापूजी गुप्ते की तरह एक ही उद्देश्य के लिए लन्दन आये थे, और उन्हें भी असफलता मिली। वे दो साल लन्दन में रहे लेकिन कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने नाना पेशवा की पेशन बहाल न करने का मन बना लिया था।
ऐसे तैयार हुई 1857 की पृष्ठभूमि
ठीक इसी समय यूरोप में क्रीमिया युद्ध शुरू हो गया। अंग्रेजी और फ्रांसीसी सेनाओं ने रूसी सैनिकों से टक्कर ली। अतंतः रूस की विजय हो गई। इससे अजीमुल्लाह खान को आभास हुआ कि अगर रूस, ब्रिटेन को हरा सकता है तो ऐसा ही कुछ भारत में ही किया जा सकता है।
इसलिए उन्होंने रूस की तैयारियों का जायजा लेने का मन बना लिया। वह उन 'रुसी रुस्तमों' को देखना चाहते थे, जिन्होंने अंग्रेजों को परास्त कर दिया था। इस विदेश यात्रा द्वारा अजीमुल्ला को अंग्रेजों की वास्तविक ढीली हालत का आभास मिल गया। 1855-56 में भारत आते ही उन्होंने रूस द्वारा ब्रिटेन को हराने का सारा किस्सा नानाजी पेशवा को सुनाया।
इसके बाद नाना साहब ने कंपनी को कलकत्ता से भागने के लिए रूस से भी संपर्क किया। उस समय रूस से उन्हें जवाब भी मिला कि जब तक वह स्वयं के प्रयासों से दिल्ली हासिल नहीं कर लेते तब तक उन्हें कोई सहायता नहीं मिल सकती। अगर वह दिल्ली जीत लेते हैं तो रूस उन्हें अंग्रेजों को कलकत्ता से भगाने में पूरी सहायता करेगा। यहीं से 1857 के पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि तैयार हो गयी थी।
रियासतों को एकजुट करने का प्रयास
इसके बाद नाना साहब ने सभी भारतीय राजाओं और नवाबों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने के लिए पत्र लिखे। यह सभी पत्र उन्होंने अपने विश्वस्त प्रतिनिधियों के माध्यम से भेजे। इसमें ग्वालियर की सिंधिया राजमाता बैजाबाई, होलकर, जयपुर, जोधपुर, झालावार, रीवां, बड़ोदा, हैदराबाद, कोल्हापुर, सतारा, इंदौर के राजघराने शामिल थे। इनकी इस मुहिम में सबसे पहले जवाब जम्मू और कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह का आया।
इसके बाद नाना साहब ने जयपुर के महाराजा मानसिंह की सहायता से दिल्ली में बहादुरशाह जफर से संपर्क किया और नाना साहब को उनका भी समर्थन मिल गया। उसके बाद अवध के नवाब ने भी सहायता की पेशकश कर दी। हैदराबाद की तरफ से महासंग्राम में न जुड़ने का जवाब आया कि वह पैसा देने में असमर्थ है और कुछ 'बंदोबस्त' अपने यहां करेंगे। साथ ही वे उनकी सहायता के लिए वहां आने में भी असमर्थ है।
इस बारे में वीर सावरकर ने अपनी किताब The Indian War of Independence of 1857 में लिखा कि नाना साहेब और अजीमुल्ला चाहते थे कि हिन्दुओं और मुसलमानों को एक होकर अपने देश की स्वतंत्रता के लिए कंधे से कंधा मिलाकर लड़ना चाहिए। और जब स्वतंत्रता प्राप्त होगी तो भारतीय शासकों और राजकुमारों के अधीन संयुक्त राज्य भारत का गठन किया जाना चाहिए।
सही समय का इंतजार कर रहे थे नाना - अजीमुल्ला
साल 1856 में 'पायम-ए-आज़ादी' नाम से अजीमुल्ला ने एक पत्रिका शुरू की थी। जिसमें क्रान्तिकारी गतिविधियों से सम्बंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज एवं तथ्य उपलब्ध रहते थे। मार्च 1857 में नाना साहब और अजीमुल्ला ने मिलकर कई धार्मिक स्थानों के गुप्त दौरे किए। अप्रैल के अंत तक, नाना साहब और अजीमुल्ला स्वतंत्रता संग्राम में जरूरी एकजुटता लाने के लिए उत्तरी भारत के सभी प्रमुख शहरों की यात्रा कर चुके थे। अब वह सही समय का इंतजार कर रहे थे। तभी अचानक मेरठ में सिपाहियों द्वारा दिल्ली कूच कर दिया गया। और वहीं नाना साहब और अजीमुल्ला दोनों ने स्वतंत्रता संग्राम को सफलता दिलाने के उद्देश्य से हरसंभव प्रयास करने शुरू कर दिए।
कानपुर में मिली जीत
कानपुर में एक युद्ध के दौरान नानाजी पेशवा और अजीमुल्ला के नेतृत्व में लड़ी सेना के सामने अंग्रेज कंपनी को हार स्वीकार करनी पड़ी थी। कंपनी के सैनिक बुरी तरह से घिर गए और उन्होंने संधि का प्रस्ताव भेजा। मराठाओं ने कई अंग्रेजों को जेलों में कैद कर लिया था। संधि के लिए नाना ने जेल में कैद एक महिला अंग्रेज के हाथ जनरल व्हीलर के पास 'क्विन विक्टोरिया की जनता' को संबोधित करते हुए एक सन्देश भेजा। इसमें लिखा गया था कि "जिनका डलहौजी की नीतियों से सम्बन्ध नहीं है और जो हथियार समर्पण करना चाहते हैं, उन्हें सुरक्षित इलाहबाद पहुंचा दिया जाएगा।"
यह सन्देश अजीमुल्ला द्वारा ही लिखा गया था। इस सन्देश के बाद, व्हीलर ने कैप्टन मुर और व्हिटिंग को विचार करने के लिए कहा। दोनों अधिकारियों ने आत्मसमर्पण करने का निश्चय किया। अगले दिन नाना पेशवा की तरफ से ज्वाला प्रसाद और अजीमुल्ला खान तो वहीं कंपनी की तरफ से मूर, व्हिटिंग और रोचे मिले। कंपनी ने अपनी सभी तोपें और हथियार नाना को सौंप दिए और नाना पेशवा ने उन्हें भोजन उपलब्ध कराकर इलाहाबाद भेज दिया।
रंगो बापूजी का योगदान
रंगोजी भी नाना साहब के लगातार संपर्क में थे। 1855-56 में कानपुर में उनकी मुलाकात तात्या टोपे से हुई और दोनों ने नाना साहब पेशवा के साथ बिठूर में एक सम्मेलन में भी हिस्सा लिया। सतारा वापस लौटकर उन्होंने ब्रिटिश विरोधी तत्वों को संगठित करने की कोशिश शुरू कर दी। कुछ दस्तावेजों के अनुसार लगभग 2000 लोगों की एक छोटी सेना भी तैयार हो चुकी थी। भारी मात्रा में हथियार जमा होने शुरू हो गए थे। तभी उनके एक सहयोगी कृष्ण राव सदाशिव सिंदकर ने विश्वासघात कर इन सभी तैयारियों की जानकारी कंपनी को दे दी। परिणामस्वरूप जुलाई 1857 में कई लोगों को गिरफ्तार कर ग्वालियर में कैद कर दिया गया। साथ ही सतारा षड़यंत्र का आरोप लगाकर 17 लोगों को 8 सितंबर 1857 को फांसी पर लटका दिया गया था, जिसमें रंगो बापूजी का बेटा सीताराम और साला केशव नीलकंठ चित्रे शामिल थे। हालांकि रंगो बापूजी स्वयं कंपनी की जेल से भागने में सफल हो गए थे।
1857 का संग्राम एक साल से ज्यादा समय तक चला। इस दौरान अमर सिंह, कुंवर सिंह और रानी लक्ष्मीबाई सहित सैकड़ों वीर सेनानियों ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना बलिदान दे दिया। आखिरकार, चौदह महीनों के बाद 8 जुलाई 1858 को तत्कालीन गवर्नर-जनरल कैनिंग ने घोषणा कर कहा कि विद्रोह (अंग्रेजी ने इसे सिपाही विद्रोह की संज्ञा दी) को पूरी तरह दबा दिया गया है। इसके बाद 1858 में ही ब्रिटिश संसद ने एक कानून पारित कर ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को समाप्त कर दिया और उसके बाद भारत पर शासन का पूरा अधिकार महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया।
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