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Sant Tukaram: संत तुकाराम के जीवन पर बनी जरूरी फिल्म, सुबोध भावे और आदित्य ओम ने दिखाई भक्तिमय यात्रा

हिन्दी सिनेमा जगत में पिछले कुछ समय से बायोपिक फ़िल्मों का चलन है। उसी सिलसिले में महाराष्ट्र के महान संत तुकाराम पर ऐतिहासिक फ़िल्म 'संत तुकाराम' इसी सप्ताह सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। इसे अवॉर्ड विनर डायरेक्टर आदित्य ओम बनाया है। इस फिल्म में मराठी संत का किरदार मराठी फ़िल्मों के सुपरस्टार एवं बायोपिक किंग सुबोध भावे ने निभाया है।

एक साधारण व्यक्ति सरल जीवन गुजरकर कैसे संत कैसे बना, फिल्म इसी यात्रा को दर्शाती है। सच्ची घटनाओं से प्रेरित फिल्म संत तुकाराम एक देखने लायक सिनेमा है। उन्होने जीवन के दर्शन को बड़े ही आसान शब्दों में बयान किया है और यह बात फिल्म के कई सीन में उभर कर सामने आती है। अपने व्यवहार और बातचीत के नम्र तरीके से तुकाराम लोगों को बेहतर जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते रहे। उनके बेमिसाल आदर्श, उनके सिद्धांत और उनके उपदेश मानव-जाति का हमेशा मार्गदर्शन करते रहेंगे।

Sant Tukaram Review

संत तुकाराम 17वीं सदी के मराठी संत 'संत तुकाराम' महाराज की जीवनी पर आधारित है। कहानी महान भक्त विशम्भर से शुरू होती है, जो संत तुकाराम के पूर्वज थे। वह भगवान विठोबा का मंदिर बनवाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सही मूर्ति नहीं मिल पाती। चमत्कारिक रूप से एक रात वह सपने से जागते हैं और अपने बगीचे में एक मूर्ति देखते हैं। महान विट्ठल भक्तों के उसी परिवार में, बोल्होबा नामक एक साहूकार के घर तुकाराम का जन्म हुआ। हालाँकि बोल्होबा साहूकारी थे, फिर भी वे एक हाशिए पर पड़े समुदाय से थे और उनका पद एक निश्चित पद पर था। समाज में व्याप्त रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों से युवा तुकाराम अछूते नहीं रहे और उन्होंने समाज में व्याप्त भेदभाव से लड़ने की शपथ ली।

तुकाराम का विवाह कम उम्र में ही हो गया था और उन्होंने पारिवारिक व्यवसाय संभाला क्योंकि उनके बड़े भाई सामान्य जीवन में रुचि नहीं रखते थे। तुकाराम की पहली पत्नी अक्सर बीमार रहती थीं और उन्होंने दूसरा विवाह किया। उनकी दूसरी पत्नी अवली एक व्यावहारिक महिला थीं। तुकाराम के जीवन में जल्दी ही त्रासदी आ गई और उन्होंने अपने बेटे, पहली पत्नी और माता-पिता को अकाल और बीमारी में खो दिया। इन त्रासदियों ने उन्हें झकझोर दिया और वे भक्ति और अध्यात्म की ओर मुड़ गए। इस बीच, तुकाराम अपने आराध्य भगवान विट्ठल के साथ अपने गहन संबंध की खोज में थे। भगवान विट्ठल उनसे विभिन्न रूपों में वेश बदलकर मिलते थे। तुकाराम को संतों और महापुरुषों के दर्शन भी मिलते थे, कभी साक्षात् तो कभी सपने में, जो उन्हें जीवन के लक्ष्य की ओर मार्गदर्शन करते थे।

निर्देशक आदित्य ओम के लिए आज के समय में संत तुकाराम पर फिल्म बनाना बड़ी चुनौती थी। मगर उन्होंने बखूबी इसे बनाया है। इतने महान संत पर आजतक बॉलीवुड में कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं बनी थी। आदित्य ओम के लिए इस फिल्म को बड़े पर्दे के अनुकूल बनाना एक बड़ा काम था। सुबोध भावे ने मुख्य पात्र 'तुकाराम' का किरदार निभाया है। सुबोध भावे ने मुख्य भूमिका में बेहतरीन अभिनय किया है। उनकी संवाद अदायगी हो या शारीरिक भाषा उन्होंने प्रभाव छोड़ा है। अन्य कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाएं बखूबी निभाई हैं, विशेषकर शिव सूर्यवंशी मांबा जी की भूमिका में बहुत गम्भीर नजर आए हैं। इसके अलावा फिल्म में अरुण गोविल और संजय मिश्रा भी हैं। जिन्होंने अपने छोटे से किरदार में जान डाल दी है।

फिल्म का संगीत भी प्लस पॉइन्ट है। निखिल कामत, रवि त्रिपाठी और वीरल-लवण के गाने काफ़ी सुरीले हैं। मौली-मौली गीत सबसे अच्छा है। इस फिल्म को आपको खोज कर देखना चाहिए।

फिल्म: संत तुकाराम
कलाकार: सुबोध भावे, अरुण गोविल, ट्विंकल कपूर, शीना चौहान, संजय मिश्रा
निर्देशक:आदित्य ओम
रेटिंग : 3 स्टार्स

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