चन्दे से खरीदे तिरपाल के नीचे देश का भविष्य, कवर्धा में शिक्षा व्यवस्था को मुंह चिढ़ाती देखिए ये तस्वीर...
कवर्धा जिले के शासकीय प्राथमिक शाला सारंगपुर खुर्द में 51 बच्चे अध्ययनरत हैं। 15 साल पुराना भवन इतना जर्जर हो चुका है कि बच्चों के ऊपर छत का प्लास्टर और बारिश की पानी गिरने लगा था।
कवर्धा, 15 जुलाई। प्रदेश में राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त बनाने करोड़ों रुपए खर्च करने का दावा कर रही है। बच्चों की शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजी माध्यम के रूप में बदलने आत्मानंद स्कूल अंग्रेजी माध्यम खोले जा रहे हैं । लेकिन कवर्धा जिले के सारंगपुर गांव में ग्रामीणों ने शासन प्रशासन के इन तमाम दावों की पोल खोल कर रख दी है। जिले के सारंगपुर गांव के प्राथमिक स्कूल में यह नजारा देखने को मिलेगा हमने कभी नहीं सोचा था। लेकिन आज के इस आधुनिक युग में बच्चों को पढ़ने के लिए स्मार्ट क्लास की सिर्फ ढकने के लिए प्लास्टिक का तिरपाल और बैठने के लिए गांव का मंच नसीब हो रहा है।

स्मार्ट क्लास की जगह बच्चे तिरपाल के नीचे बैठने क्यों हैं मजबूर ?
अब हम आपको इस हेडलाइन की पूरी कहानी बताते हैं, दरअसल कवर्धा जिले के शासकीय प्राथमिक शाला सारंगपुर खुर्द में 51 बच्चे अध्ययनरत हैं। 15 साल पुराना भवन इतना जर्जर हो चुका है कि बच्चों के ऊपर छत का प्लास्टर और बारिश की पानी गिरने लगा था। फिर भी पढ़ाई के प्रति बच्चों की ललक कम नही हुई. हालांकि बच्चों में किसी अनहोनी का खतरा था। ऐसे में बच्चो ने अपने पालकों को अवगत कराया और ग्रामीणों ने बच्चों के पढ़ाई-लिखाई निरन्तर बनाए रखने इसके लिए गांव के सांस्कृतिक मंच को स्कूल के रुप तैयार किया है. बारिश से बचने के लिए सांस्कृतिक मंच में तिरपाल भी लगाया है. इसके नीचे ही प्राथमिक स्कूल के कक्षा पहली से पांचवीं तक के 51 छात्र-छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. हालांकि यहां अन्य स्कूलों की तरह पंखे और टेबल कुर्सी तो नही है । लेकिन यह तिरपाल से ढका मंच ही इन बच्चों का स्कूल बन गया है।
कलेक्टर और एसडीएम ने की अनदेखी तब ग्रामीणों ने उठाया कदम
सारंगपुर के ग्रामीणों ने ऐसा नही है कि शासन प्रशासन को इस जर्जर स्कूल भवन की जानकारी नही दी। बल्कि शिक्षक और ग्रामीणों ने मंत्री से लेकर अफसरों तक वस्तुस्थिति से हर साल अवगत कराया और हालात को सुधारने के लिए आवेदन दिया. लेकिन आज तक किसी ने संधारण के लिए कोई उचित कदम नही उठाया। इस वर्ष भवन की हालात बद से बदत्तर हो गई है। तो ग्रामीणों ने आपस में ही चंदा इकट्ठा कर तिरपाल खरीद लिया और वहीं कक्षायें शुरू कर दी. यहां दूसरे स्कूलों की तरह पंखे या कुर्सियां तो नहीं है लेकिन गर्मी और बारिश में बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों ने स्कूल में ताला जड़ने की दी चेतावनी
इस तरह जिला प्रशासन के द्वारा शिक्षा व्यवस्था की अनदेखी से ग्रामीण आक्रोशित हैं । ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा कर तिरपाल के रूप में वैकल्पिक व्यवस्था तो कर दी लेकिन आने वाले दिनों में यह व्यवस्था ज्यादा दिन तक नहीं चल सकेगी । ग्रामीणों का कहना है कि जब तक तिरपाल के नीचे कक्षाएं चल रही है तब तक चलेगी.अगर जल्द ही स्कूल भवन का संधारण नहीं हुआ तो स्कूल में ताला लगा दिया जाएगा।
जिला शिक्षा अधिकारी का गैर जिम्मेदाराना बयान
वहीं जिला शिक्षा अधिकारी राकेश पांडे का कहना है कि नए भवन और पुराने जर्जर भवन की मरम्मत सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से होती है. मांग पत्र शासन को भेजा गया है या नही इसकी कोई जानकारी नही हैं। इस तरह जिला शिक्षा अधिकारी के बयान से पता चलता है कि अधिकारी अपने विभागों के ले कितने जिम्मेदार हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि देश का भविष्य कब तक तिरपाल के नीचे बैठकर पढ़ाई करते हैं। फिर शासन प्रशासन की ओर से कोई विकल्प निकाला जाता है.












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