Delhi Chunav 2025: दिल्ली में सत्ता की हैट्रिक AAP के लिए नहीं आसान,दलित-मुस्लिम सीटों पर कांग्रेस बनी सिरदर्द
Delhi Chunav 2025: दिल्ली में विधानसभा चुनाव के लिए सभी 70 सीटों पर वोटिंग का काउंटडाउन शुरू होने वाला है। 5 फरवरी को सभी 70 सीटों पर मतदान होगा। एक तरफ जहां सत्तारूढ़ दल आम आदमी पार्टी सत्ता की हैट्रिक लगाने की तैयारी में है तो दूसरी तरफ बीजेपी के अलावा कांग्रेस ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
हालांकि चुनाव के नतीजों से पहले खुद आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दावा किया है कि उनकी पार्टी 55 सीटें जीत रही है। हालांकि यह आंकड़ा पिछले चुनाव में जीती 62 सीटों से कम है। ऐसे में जानिए आखिर आप को दिल्ली में कहां नुकसान हो सकता है।

बीजेपी के अलावा दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। खासकर दलित और मुस्लिम बहुल सीटों पर दोनों पार्टियों के बीच कड़ा संघर्ष हो रहा है। कांग्रेस, जो पिछले दो चुनावों में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी, इस बार पूरी ताकत झोंक रही है।
इस बार आम आदमी पार्टी को लगभग 12 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की तरफ से कड़ी टक्कर मिलती दिखाई दे रही है। ये सभी वे सीटें हैं, जहां दलित और मुस्लिम समुदायों की बड़ी आबादी है।
कांग्रेस का मुस्लिम और दलित बहुल सीटों पर फोकस
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने इस बार अपने चुनाव प्रचार में रणनीतिक बदलाव किया है। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य मुस्लिम और दलित बहुल सीटों पर सेंध लगाना है, जहां पहले AAP का दबदबा था। कांग्रेस ने विशेष रूप से उन सीटों पर ध्यान केंद्रित किया है, जहां मुस्लिम और दलित समुदाय की आबादी अधिक है।
इनमें सीलमपुर, मटियामहल, बल्लीमारान, ओखला, चांदनी चौक जैसी सीटें शामिल हैं। राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान 2020 दिल्ली दंगों से प्रभावित इलाकों का दौरा कर कांग्रेस को फिर से मजबूत करने का प्रयास किया। कांग्रेस के रणनीतिक बदलाव के चलते AAP को इन सीटों पर जबरदस्त चुनौती मिल रही है।
कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक वापस लाने की कोशिश
2013 में AAP के उभरने के बाद से कांग्रेस का वोट शेयर लगातार गिरता गया है। 2013 में कांग्रेस को 25% वोट मिले थे, जो 2015 में घटकर 9.7% और 2020 में मात्र 4.3% रह गया।
इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि भ्रष्टाचार और सत्ता विरोधी लहर के कारण AAP के खिलाफ माहौल बनेगा। इसी वजह से कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने केजरीवाल सरकार पर तीखे हमले किए हैं। कांग्रेस को विश्वास है कि अगर AAP को कमजोर किया जाए, तो दिल्ली में अपनी पुरानी स्थिति वापस हासिल की जा सकती है।
जानिए कहां-कहां दलित-मुस्लिमों का दबदबा
उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सीलमपुर सीट पर 57% मतदाता मुस्लिम समुदाय से आते हैं। इसी तरह मुस्लिम बहुल सीटों और जहां मुस्लिम आबादी अच्छी खासी संख्या में है, उसमें मटियामहल (60 फीसदी), बल्लीमारान (50 फीसदी), ओखला (52 फीसदी) और चांदनी चौक (30 फीसदी) शामिल हैं।
इसके अलावा दलित समुदाय की बात करें तो सीमापुरी और सुल्तानपुर माजरा सीटों पर भी कांग्रेस को बड़ी उम्मीद है। ऐसे ही दिल्ली की बाहरी सीटें बवाना, सुल्तानपुर माजरा, बाबरपुर और मुस्तफाबाद में भी कांग्रेस कड़ी टक्कर देने की कंडीशन में है, यहां प्रवासी मजदूरों, मुसलमानों और दलितों का बड़ा वोटबैंक है।
क्या केजरीवाल ने मुस्लिम बहुल सीटों पर हार मान ली है?
दिल्ली में करीब 13% मुस्लिम मतदाता हैं और 8 विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुल मानी जाती हैं। आम आदमी पार्टी ने इस बार 5 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। बावजूद इसके अरविंद केजरीवाल खुद इन सीटों पर प्रचार करने नहीं पहुंचे हैं।
क्या यह उनकी सोची-समझी रणनीति है या फिर कांग्रेस और AIMIM के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए उन्होंने पहले ही हार मान ली है? मुस्लिम बहुल इलाकों में AAP की ओर से राज्यसभा सांसद संजय सिंह प्रचार कर रहे हैं। इसके अलावा यूपी से आए कुछ सपा नेताओं को भी प्रचार में लगाया गया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये रणनीति काम करेगी?
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AAP के 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की रणनीति बनी परेशानी?
2020 के चुनावों में AAP ने शाहीन बाग आंदोलन से दूरी बनाए रखी थी, इसके बावजूद मुस्लिम बहुल सीटें जीतने में कामयाब रही थी। लेकिन इस बार हालात बदल चुके हैं। केजरीवाल ने चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम बहुल इलाकों में जाने से परहेज किया है, जिससे यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या वह कांग्रेस को इन सीटों पर बढ़त लेने देना चाहते हैं?
दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने भी इन इलाकों में चुनावी मोर्चा खोल दिया है और दिल्ली दंगों तथा तब्लीगी जमात के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है। इससे मुस्लिम वोटों में विभाजन हो सकता है, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिलने की संभावना है।
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क्या फंस गए हैं केजरीवाल?
AAP को इस बार दिल्ली चुनाव में कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिल रही है। कांग्रेस ने रणनीतिक रूप से उन सीटों पर ध्यान केंद्रित किया है, जहां उसका पारंपरिक वोट बैंक मौजूद है।
यदि कांग्रेस दलित और मुस्लिम बहुल सीटों पर अच्छी बढ़त बनाने में कामयाब होती है, तो यह AAP के लिए बड़ा झटका होगा। दूसरी ओर कांग्रेस को उम्मीद है कि यदि वह AAP को कमजोर करने में सफल रही, तो दिल्ली में अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकती है। अब देखना यह होगा कि क्या AAP अपनी स्थिति को संभाल पाती है या कांग्रेस की आक्रामक रणनीति के आगे बेबस हो जाती है।












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