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विदेश में आईटी की नौकरी के नाम पर फांसे जा रहे हैं युवा

लोगों को विदेशों में बढ़िया नौकरी का झांसा दिया जाता है

भारतीय इंजीनियर स्टीफन वेजली को जब ग्राफिक डिजाइनर की नौकरी के लिए हो रहे इंटरव्यू में टाइपिंग टेस्ट देने को कहा गया तो उन्हें अजीब तो लगा था. लेकिन नौकरी थाईलैंड में थी और उन्हें मिल भी गई तो उन्होंने इस बारे में ज्यादा नहीं सोचा.

जुलाई महीने में वह नौकरी जॉइन करने बैंकॉक पहुंच गए. वहां से उन्हें और उनके साथ ही जॉइन करने आए सात और साथियों को सड़क मार्ग से म्यांमार ले जाया गया. वहां उनके पासपोर्ट और अन्य दस्तावेज ले लिए गए और उन्हें ऑनलाइन क्रिप्टोकरंसी ठगी के काम में लगा दिया गया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स से फोन पर बातचीत में 29 साल के वीजली ने बताया, "मैं दिन के 18 घंटे काम करता था. मेरा काम था रिसर्च करना, लोगों से सोशल मीडिया पर चैटिंग करना, उनका भरोसा जीतना और उन्हें क्रिप्टोकरंसी में निवेश के लिए तैयार करना."

वीजली की जो कहानी है, वह हजारों लोगों की है. तकनीकी रूप से कुशल ये लोग सोशल मीडिया पर विज्ञापनों के जरिए लुभाए जा रहे हैं. उन्हें बढ़िया विदेशी नौकरी का लालच दिया जाता है. पर आखिर में उन्हें इंटरनेट के जरिए अनजान लोगों को ठगने के धंधे में धकेल दिया जाता है.

वीजली ने म्यांमार के दक्षिणपूर्वी शहर म्यावाडी में 45 दिन बिताए. उन्हें 3,500 लोगों के नामों की सूची दी गई थी, जिनसे उन्हें फेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी डेटिंग ऐप के जरिए संपर्क करना था. वह बताते हैं, "हमें इश्क लड़ाने, लोगों के शौक से जुड़ीं बातें करने और उनकी पसंद-नापसंद के बारे में बतियाने को प्रशिक्षित किया गया. 15 दिन में हम ग्राहक का भरोसा जीत लेते थे. उसके बाद वे क्रिप्टो में निवेश के लिए हमारी सलाह लेने को तैयार हो जाते थे."

पूरे एशिया में जाल

साइबर अपराधों का यह गिरोह सबसे पहले कंबोडिया में नजर आया. उसके बाद ऐसे गिरोह अलग-अलग देशों में पनप चुके हैं और भारत व मलयेशिया समेत एशियाई देशों के तकनीकी रूप से कुशल युवाओं को निशाना बना रहे हैं.

इन देशों के लोग व संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी कहते हैं कि ये गिरोह चीनी अपराधियों द्वारा चलाए जा रहे हैं जिनका पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में जुए के धंधे पर नियंत्रण है. वे लोग ठगी के इन गिरोहों के जरिए कोविड-19 महामारी के दौरान हुए नुकसान की भरपाई कर रहे हैं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि जिन लोगों को धोखाधड़ी के जरिए विदेश ले जाया जाता है उन्हें कंबोडिया, म्यांमार और लाओस के जुआघरों के बड़े-बड़े अहातों में रखा जाता है. एशिया ह्यूमन राइट्स वॉच के उप निदेशक फिल रॉबर्टसन कहते हैं, "गिरोहों ने कुशल तकनीक पसंद लोगों को निशाना बनाया है जिनकी नौकरियां महामारी के दौरान चली गई थीं. ये लोग नई नौकरी पाने को बेकरार थे और ऐसे झांसों में आ गए."

साइबर धोखाधड़ी की वजह से बैंकों से उठ रहा है भरोसा

रॉबर्टसन कहते हैं कि अधिकारी इन गिराहों को लेकर तीव्र कार्रवाई नहीं कर रहे हैं. वह बताते हैं, "अधिकारियों की प्रतिक्रिया धीमी रही है और बहुत से मामलों में तो पीड़ितों को मानव तस्करी का पीड़ित भी नहीं माना जाता बल्कि ठगी के धंधे में लगे अपराधी कहा जाता है."

साइबर क्राइम

दुनियाभर में साइबर अपराध अलग-अलग रूपों में पनप रहा है. जिस धंधे में वीजली और उनके साथियों को झोंका गया उसे 'पिग बुचरिंग' कहा जाता है. इस धंधे में स्कैमर सोशल मीडिया के जरिए ग्राहक का विश्वास जीतता है और फिर उन्हें फर्जी क्रिप्टो करंसी या अन्य ट्रेडिंग स्कीमों में निवेश को तैयार करता है. इसे 'पिग बुचरिंग' नाम अमेरिकी एजेंसी एफबीआई के अधिकारियों ने दिया था. उनके मुताबिक पहले ग्राहकों को प्यार और अमीर बनने के सपने दिखाए जाते हैं और फिर उनका धन लेकर उन्हें छोड़ दिया जाता है.

एफबीआई ने 2019 में ऐसे कुछ मामलों की जांच की तो उनकी जड़ें चीन तक पहुंची मिली थीं. भारत में अवांजो साइबर सिक्यॉरिटी सॉल्यूशंस के निदेशक धन्या मेनन कहती हैं, "लोगों को अहसास नहीं होता लेकिन वे सोशल मीडिया पर बहुत सारी सूचनाएं साझा करते हैं. अगर आप 15 दिन तक किसी की सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर रखें तो उसके बारे में बहुत कुछ जान जाएंगे." मेनन कहती हैं कि क्रिप्टो करंसी की ठगी के मामले बहुत ज्यादा बढ़ रहे हैं क्योंकि इस तकनीक के बारे में लोगों के पास बहुत कम जानकारी है.

अमेरिकी शोधकर्ताओं ने नए चीनी हैकिंग टूल की खोज की

भारतीय विदेश मंत्रालय ने सितंबर में एक अडवाइजरी जारी कर युवाओं को थाईलैंड से फर्जी नौकरियों के मौकों को लेकर आगाह किया था. मंत्रालय ने कहा था कि कॉल सेंटर और क्रिप्टो स्कैम में लगीं संदिग्ध आईटी कंपनियां तकनीकी रूप से कुशल लोगों को फांस रही हैं. पिछले महीने ही भारत सरकार ने लाओस, कंबोडिया और म्यांमार से 130 लोगों को बचाया था, जिनमें स्टीफन वीजली भी शामिल थे.

वीके/एए (रॉयटर्स)

Source: DW

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