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खूंखार डकैत ददुआ को दिया था खदेड़, जानिए 66 साल की दबंग 'पाठा की शेरनी' की कहानी

बीहड़ के घरों में बंद महिलाओं से अलग हटकर आखिर रामलली को क्यों हथियार उठाना पड़ा? कैसे एक बच्चे को बचाने के लिए रामलली खूंखार डकैत के सामने मौत बनकर कड़ी हो गई? ऐसे कई सवालों का जवाब आपको आगे मिलेगा।

The dreaded dacoit Dadua was chased away by ramlali the story of 66-year-old Patha ki Sherni

चैत्र नवरात्रों में 9 दिनों तक देवी के शक्ति स्वरूप की पूजा की जाती है। 22 मार्च से सम्पूर्ण भारत में नवरात्रों की पूजा शुरू हो गई है। आज हम आपको एक ऐसी महिला के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में रहने वाले लाखों लोगों के दिल में अपने साहस से शक्ति की देवी का स्थान प्राप्त किया है। ये वही रामलली हैं, जिन्होंने बुंदेलखंड के सबसे खूंखार डकैत ददुआ और उसके 12 डाकुंओं को अकेले ही खदेड़ दिया था।
हथियारों से लैस डकैतों से लोहा लेने वाली रामलली को उत्तर प्रदेश सरकार ने "पाठा की शेरनी" की उपाधि भी दी है। उन्हें सम्मान के तौर पर एक राइफल भी दी गई है। महिलाओं के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने के लिए रामलली आज भी बंदूक उठाकर निकल पड़ती है। वह 66 साल की हो चुकी हैं, लेकिन बदन में आज भी वही फुर्ती बरकरार है।

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डकैत ददुआ का आतंक
दरअसल, बात तब की है जब चित्रकूट के पाठा में डकैत ददुआ का आतंक हुआ करता था। किसी फ़िल्मी विलन से भी ज्यादा लोगों के दिलों में ददुआ डाइट का खौफ था। ददुआ की मुखबिरी का मतलब मौत होता था। ददुआ सबसे ये कहा करता था, 'जिस दिन मेरी मुखबिरी करने का ख्याल भी दिल में आए समझ लेना कि तुम्हारी मौत हो चुकी है।'
कटा हुआ सिर बांस में बांधकर कई गांवों में घुमाया
वहीं 20 जून 1986 को ददुआ की निर्दयता का एक ऐसा ही मामला सामने आया था। ददुआ ने अपनी 72 लोगों की गैंग के साथ पुलिस के इन्फॉर्मर बन चुके शम्भू सिंह के गांव में घुसकर उसकी बीच सड़क पर गला काट कर हत्या कर दी। यही नहीं, उसके बाद ददुआ ने उसका कटा हुआ सिर बांस में बांधकर कई गांवों में घुमाया। शम्भू सिंह के अलावा ददुआ ने उसके साथ 9 और लोगों की हत्या भी कर दी।
सुंदर लड़कियों को ददुआ के आदमी उठा ले जाते थे
इसके एलावा ददुआ के होते उन दिनों लड़कियों का सुंदर होना उनकी जान का दुश्मन होने जैसा था। सुंदर लड़कियों को ददुआ के आदमी उठा ले जाते थे। आए दिन हो रही ऐसी घटनाओं के कारण महिलाएं त्रस्त हो चुकी थीं।

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बैंक मैनेजर के बेटे को किडनैप कर लिया
साल 2000 तक यूपी और एमपी की पुलिस चौकियों में ददुआ गैंग के खिलाफ लूट, हत्या, डकैती, किडनैपिंग और फिरौती के 500 से ज्यादा मामले दर्ज हुए। 17 मई साल 2001 को ददुआ के आदमियों ने सतना के बैंक मैनेजर जगन्नाथ तिवारी के बेटे मनीष को किडनैप कर लिया। डाकू जब लड़के को हरिजनपुर गांव के रास्ते पहाड़ी पर ले जा रहे थे। उस दौरान लड़का डकैतों के चंगुल से भाग निकला। उसे भागता देख डकैत उसका पीछा करने लगे। वह अपनी जान बचाने के लिए भागकर हरिजनपुर गांव की एक टूटी हुई झोपड़ी में घुस गया। वो झोपड़ी रामलली की थी।
'मम्मी मुझे बचा लो' की चीख ने रामलली को बनाया 'पाठा की शेरनी'
उस वक्त रामलली खाना बना रही थीं। लड़का घबराया हुआ रामलली से लिपटकर रोने लगा। रामलली बोली- अरे क्या हुआ? रो क्यूं रहा है। लड़का बोला- मम्मी मुझे बचा लो। इतना कहकर वह जोर-जोर से रोने लगा। रामलली ने उसे पीने के लिए पानी दिया। लड़के ने चुप होकर पूरी कहानी कह डाली। इसके बाद रामलली कहती हैं, "लड़के ने रोते हुए जब मम्मी कहा तो मुझे दया आ गई। उसकी हालत देख मैंने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए मैं उसे डाकुओं को नहीं सौंपूंगी।"

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12 से 15 डाकुओं ने पूरे गांव को घेर लिया
रामलली ने आगे की कहानी बताते हुए कहा कि इसके कुछ देर बाद 12 से 15 डाकुओं ने पूरे गांव को घेर लिया। डकैतों ने एक-एक घर की तलाशी शुरू की। वह लोगों को धमका रहे थे कि अगर लड़के को लौटाया नहीं तो वो पूरे गांव में आग लगा देंगे। इस बीच मैंने लड़के को रसोई में छिपाकर आस-पास की महिलाओं को घर में इकट्ठा कर लिया। हम सबके हाथों में एक-एक हसिया थी। तभी डाकुओं ने मेरे घर पर धावा बोल दिया। मेरे सामने ददुआ के आदमी बदूंक ताने खड़े थे।"
डकैत घर में घुसने लगे रामलली और महिलाएं हसिया उठाकर चिल्लाने लगीं। डकैत थोड़ा पीछे हटें तो महिलाओं ने पत्थर चलाना शुरू कर दिया। औरतों के इस जमघट को देख ददुआ गैंग वापस बीहड़ की ओर भाग गई।

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गुस्साए डकैतों ने रामलली के पति को दिन-दहाड़े उठा लिया
उन्होंने बताया कि इस पूरे प्रकरण के बाद लड़का की जान तो बच गई और डकैतों को खाली हाथ लौटना पड़ा। लेकिन इस बात से ददुआ आगबबूला हो गया था। वहीं इसी बीच रामलली ने पति राम सुमेर और गांववालों की मदद से पूरी घटना की खबर मानिकपुर थाने को दी। इसके साथ-साथ लापता लड़के को भी पुलिस को सौंप दिया। ये बात सुनकर ददुआ और ज्यादा भड़क गया। पारा इनता बढ़ गया कि ददुआ ने दिन-दहाड़े रामलली के पति का अपहरण कर लिया।
रामलली का पति राम सुमेर अब ददुआ के कब्जे में था। ये बात जानते हुए भी रामलली घबराई नहीं। उसे ददुआ के ठिकाना का पता मालूम था। रामलली ने पुलिस तक इस बात की खबर पहुंचा दी। इसके बाद पुलिस ने पहाड़ियों पर कांबिग करते हुए रामलली के पति को छुड़वा लिया।

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5 किलोमीटर में बसे गांवों में लोग डाकुओं के नाम से डरते नहीं
रामलली के पति उनकी बहादुरी पर कहते हैं, "उस रात को आज भी याद करते हैं, तो शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस दिन रामलली को देखकर मेरी भी हिम्मत बढ़ गई थी। उस जमाने में ददुआ के सामने किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती थी। हम ने तो उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। रामलली की वजह से आज हरिजनपुर के 5 किलोमीटर क्षेत्र में बसे गांवों में लोग डाकुओं के नाम से डरते नहीं हैं। लड़कियां बेखौफ स्कूल जाती हैं।"
सम्मान में राजभवन में बजी तालियां, मिली लाइसेंसी बंदूक
इन 2 घटनाओं की वजह से रामलली की चर्चा पूरे यूपी में होने लगी। उस वक्त अखबारों के पहले पन्ने पर उनका नाम फोटो सहित छापा गया। 6 सितंबर 2001 को चित्रकूट के डीएम रहे जगन्नाथ ने रामलली को 1 लाइसेंसी बंदूक देकर सम्मानित किया। जिला प्रशासन ने रामलली के साथ हंसिया उठाने वाली गांव की 8 और महिलाओं को भी बंदूकें दी। इन्हीं असलहों के दम पर रामलली ने कई बार ददुआ गैंग का सामना किया।

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    "पाठा की शेरनी"
    रामलली की बहादुरी के लिए उस वक्त के राज्यपाल विष्णुकान्त शास्त्री ने 8 मार्च 2002 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर उन्हें राजभवन बुलाया। उन्होंने रामलली को सम्मानित करते हुए "पाठा की शेरनी" के नाम से बुलाया, तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा राजभवन गूंज उठा।
    100 से ज्यादा महिलाओं को बंदूक चलाना सिखाया
    कंधे पर गोलियों से लैस बंदूक लिए रामलली आज 20 साल बाद भी आपको पाठा के जंगलों में घूमती दिख जाएंगी। सरकार से ईनाम के तौर पर जो बंदूकें उन्हें मिलीं। आज रामलली उसे चलाने की ट्रेनिंग क्षेत्र की लड़कियों को दे रही हैं। रामलली कहती हैं, "2001 में मानिकपुर की CO रहीं लक्ष्मी सिंह मैडम ने हमें बंदूक चलानी सिखाई थी। फिर जिस दिन से मैंने बंदूक उठाई, उस दिन के बाद से कभी साड़ी नहीं पहनी। गांव की महिलाओं को किसी के सामने झुकना न पड़े। दिन हो या रात वो बेखौफ बाहर जाएं। इसके लिए मैंने गांव के आसपास की लड़कियों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग दी है। बीते 10 साल में मैंने यहां की 100 से ज्यादा महिलाओं को बंदूक लोड करने के बाद उसे चलाना सिखाया है।

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