Chhattisgarh: आधी रात कोसमनारा पहुंचे CM विष्णुदेव साय, हठयोगी का लिया आशीर्वाद, जानिए कौन हैं सत्यनारायण बाबा
Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपने 2 दिवसीय रायगढ़ प्रवास पर हैं। बुधवार को देर रात उन्होंने बाबाधाम कोसमनारा पहुंचकर विश्वप्रसिद्ध संत सत्यनारायण बाबा से आशीर्वाद लिया और छत्तीसगढ़ की खुशहाली और समृद्धि की कामना की। ज्ञात हो कि सत्यनारायण बाबा कोई साधारण संत नहीं हैं, वह सुबह से देर शाम तक ध्यान में रहते हैं,फिर श्रद्धालुओं से इसके पश्चात ही मिलते हैं। आइये आपको बताते हैं कि कौन हैं सत्यनारायण बाबा।

छत्तीसगढ़ के पूर्वांचल में स्थित रायगढ़ जिले में कोसमनारा नाम का एक गांव हैं, जहां 16 फरवरी 1998 से एक योगी तपस्या में लीन हैं, जिन्हे लोग सत्यनारायण बाबा कहते हैं। यह एक हठयोगी हैं, करीब 25 वर्ष से एक ही स्थान पर विराजमान हैं। चाहे गर्मी हो, बरसात या ठंड का मौसम वह खुले आसमान के नीचे हमेशा ध्यान में लीन रहते हैं। छत्तीसगढ़ समेत देशभर और विदेशों की कई बड़ी हस्तियां उनका आशीर्वाद लेने रायगढ़ पहुंचते हैं।
आधी रात ही खोलते हैं ऑंखें
इस साल श्रद्धालुओं ने सत्यनारायण बाबा की तपस्या का स्थापना का 25 वर्ष रजत जयंती के रुप में मनाया हैं। छत्तीसगढ़ समेत देशभर के लोग अब सत्यनारायण बाबा के दर्शन को ही तीर्थ के समान मानते है। बाबा कब क्या खाते हैं? कब समाधि से उठते हैं? आम लोगों को पता नहीं, किंतु बाबा धाम की सेवा और व्यवस्था में लगे करीबी लोग बताते हैं कि 24 घंटे में केवल एक बार आधीरात के बाद ध्यान से सामान्य अवस्था में आते हैं। दूध और फल ग्रहण करते हैं। इस दौरान वह लोगों को दर्शन देकर समस्याएं सुनते हैं और आशीर्वाद से समाधान देते हैं। वह केवल इशारों में बातें करते हैं।

सत्यनारायण बाबा की उम्र कितनी है? बचपन में क्या था नाम?
ज्ञात हो कि सत्यनारायण बाबा का जन्म 12 जुलाई 1984 को हकोसमनारा से 19 किलोमीटर दूर देवरी, डूमरपाली में एक किसान दयानिधि साहू और हंसमति साहू के परिवार में हुआ था। उनमे बचपन से ही आध्यात्मिक रुचि थी। बताया जाता है कि एक बार उन्होंने गांव के ही तालाब के बगल में स्थित शिव मंदिर में लगातार 7 दिनों तक तपस्या की थी। तब वह अपने माता-पिता और गांव वालों की समझाने पर घर लौट आये थे, लेकिन उन्हें ज्यादा दिन नहीं रोका जा सका। कुछ समय बाद उन्होंने रायगढ़ शहर के पास स्थित कोसमनारा में एक बंजर जमीन पर उन्होंने कुछ पत्थरों को इकट्ठा कर शिवलिंग का रूप दिया और अपनी जीभ काट कर उन्हें समर्पित कर दी। तभी से सत्यनारायण बाबा तपस्या में लीं हैं।
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