CG News: बीजेपी की दूसरी लिस्ट से फूटे बगावत के सुर, दिवंगत विधायक भीमा की बेटी ने पिता के बलिदान पर उठाए सवाल
CG Election 2023: छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी ने दो दिन पहले अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा की। नामों की घोषणा के बाद अब भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष देखा जा रहा है। इसी असंतोष के कारण कार्यकर्ताओं ने सूची पर सवाल खड़े करना भी शुरू कर दिया है। इसी बीच दंतेवाड़ा विधानसभा सीट से भाजपा ने चैतराम अटामी की टिकट फाइनल की है।
वहीं इस नाम पर विरोध भी शुरू हो गया है। सबसे पहला विरोध दंतेवाड़ा के दिवंगत विधायक भीमा मंडावी की बेटी ने सोशल मीडिया पर वीडियो के जरिए जताया है। उन्होंने अपनी मां व दिवंगत विधायक की पत्नी ओजस्वी मंडावी को टिकट देने की सिफारिश की।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में दिवंगत विधायक भीमा की बेटी दीपा मंडावी ने कहा है कि उनके पिता ने पार्टी के लिए अपना बलिदान दिया। पिता के जाने के बाद उन्हें अपने भविष्य का पता नहीं था। इसके बाद उनकी मां ओजस्वी मंडावी ने बच्चों को संभाला।
यही नहीं, भीमा के सपनों को पूरा करने के लिए उन्होंने पार्टी में पिता की जगह भी ली, लेकिन पार्टी ने ओजस्वी को टिकट न देकर पिता के बलिदान को व्यर्थ कर दिया है। उन्होंने सवाल करते कहा कि क्या उनके पिता के बलिदान की कोई कीमत नहीं है?
ओजस्वी को टिकट नहीं मिलने पर दीपा ने अपनी नाराजगी सोशल मीडिया के जरिए सार्वजनिक की। बस्तर में ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि भाजपा की टिकट फाइनल होने के बाद इस तरह से सार्वजनिक रूप से टिकट वितरण पर सवाल उठाए गए हों। इससे पहले भी कार्यकर्ताओं में असंतोष देखा जाता था, लेकिन सार्वजनिक तौर पर इसे कार्यकर्ता जाहिर होने नहीं देते थे, लेकिन जिस तरह से टिकटों के वितरण के बाद विरोध और सूची पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, भाजपा के लिए ये अच्छे संकेत नहीं हैं।
मालूम हो कि दंतेवाड़ा विधानसभा से साल 2018 में भाजपा के प्रत्याशी रहे भीमा मंडावी ने कांग्रेस की देवती कर्मा को 2172 मतों से हराकर सीट हासिल की थी। साल 2018 में बस्तर की 12 सीटों में से भीमा अकेले ऐसे विधायक थे, जो भाजपा से थे, जबकि बाकी 11 सीटों पर कांग्रेस के विधायक काबिज हो चुके थे। इससे पहले साल 2008 में भी भीमा ने भाजपा की ही टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता था।
साल 2018 में चुनाव जीतने के बाद साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 9 अप्रैल को एक नक्सली हमले में उनकी मौत हो गई थी। बताया जाता है कि लोकसभा चुनाव के दौरान वे जनसंपर्क के तहत किरंदुल-बचेली से वापस लौट रहे थे कि उनके काफिले पर नकुलनार के पास हमला कर दिया था। इसी हमले में भीमा की मौत हो गई थी।
संवाद सूत्र: ऋषि भटनागर, जगदलपुर/छत्तीसगढ़












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