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Bastar News: 25 फीट ऊंचे दो मंजिला रथ पर सवार होंगी मांई दंतेश्वरी, जानिए क्यों है बस्तर दशहरा का विशेष महत्व?

Bastar Dussehra 2023: पूरे भारत में सबसे ज्यादा दिनों तक मनाया जाने वाला विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की तैयारियों में पूरा बस्तर जुटा हुआ है। 75 दिनों तक मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा बीते महीनों अधिकमास के कारण इस साल 107 दिनों का हो गया है।

बस्तर दशहरा में रथ चलाने की प्रथा है। जिसमें विराजित होकर बस्तर की आराध्य देवी माईं दंतेश्वरी नगर का भ्रमण करती हैं। बीते 600 सालों से लकड़ी का विशालकाय रथ बनाने की परंपरा लगातार जारी है।

Bastar Dussehra 2023

बताया जाता है कि रथ निर्माण के लिए भी विशेष परंपरा होती है। सैकड़ों सालों से इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए रथ निर्माण की प्रक्रिया जिले के विभिन्न गांवों के विशेष वर्गों द्वारा की जाती है। इस साल 25 फीट ऊंचे दो मंजिला रथ का निर्माण किया जा रहा है, जिसमें विशेष रूप से बस्तर जिले के दुबेउमरगांव व झारउमरगांव के ग्रामीण रथ को आकार दे रहे हैं।

रथ निर्माण के लिए साल की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है। जिसे विशेष आदिवासी वर्ग के लोग लेकर आते हैं। इसके बाद इस लकड़ी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।

25 दिनों के समय अंतराल में दुबेउमरगांव व झारउमरगांव के ग्रामीण रथ तैयार करते हैं। रथ निर्माण में 200 से ज्यादा ग्रामीण व रथ कारीगर शहर के सिरहासार भवन में ठहरकर ही दो मंजिला रथ तैयार करते हैं।

रथ निर्माण में खास बात ये होती है, कि इसमें किसी भी आधुनिक औजारों या उपकरणों का उपयोग नहीं किया जाता। दुबेउमरगांव व झारउमरगांव के ग्रामीणों ने बताया कि पारंपरिक औजारों से ही पूरा रथ खड़ा कर दिया जाता है। पारंपरिक औजारों में बसूला, छेनी-हथौड़ी, रंदा सहित अन्य शामिल होते हैं। उनका मानना है कि देवी को अर्पित किए जाने वाले रथ में आधुनिक उपकरणों का उपयोग किया गया तो यह अशुभता का संकेत होता है।

रथ निर्माण होने के बाद विजयादशमी के दिन माईं दंतेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ किया जाता है और रथ की नगर परिक्रमा करवाई जाती है। बस्तर दशहरा के रीति-रिवाजों के जानकार हेमंत कश्यप बताते हैं कि जंगल से रथ निर्माण के लिए जो लकड़ियां लाई जाती हैं, उनकी अलग विशेषता होती है। ग्रामीण करीब 150 से 200 साल पुराने साल के पेड़ों की छंटनी करते हैं। इसके बाद पूरे विधि-विधान से उस पेड़ को काटा जाता है।हालांकि पेड़ काटने के बदले ग्रामीण नए पौधों का रोपण भी करते हैं, ताकि बस्तर दशहरा में रथ निर्माण के लिए लकड़ियों की कमी न हो।

हेमंत बताते हैं कि ग्रामीणों में माईं दंतेश्वरी के प्रति गहरी आस्था जुड़ी हुई है। इसलिए वे दिन-रात के अथक परिश्रम से रथ निर्माण में जुट जाते हैं। बस्तर दशहरे में 8 चक्कों वाला विशाल रथ आकर्षण का मुख्य केंद्र होता है। इसे स्थानीय बोली में देव वाहन कहा जाता है। बस्तर में बारसी उतारनी के साथ ही रथ निर्माण शुरू हो जाता है।

संवाद सूत्र: ऋषि भटनागर, जगदलपुर/छत्तीसगढ़

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