अनिल अंबानी को बड़ी राहत, रिलायंस इंफ्रा को 48 घंटे 1000 करोड़ का भुगतान करेगी दिल्ली मेट्रो

नई दिल्ली, 60 दिसंबर: दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की शाखा दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड के साथ चल रहे विवाद में बकाया पैसा देने के लिए तैयार हो गई है। डीएमआरसी ने पैसे चुकाने के लिए 48 घंटों का समय मांगा है। डीएमआरसी ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि वह 48 घंटों में एक निलंब अकाउंट में 1,000 करोड़ रुपये जमा करेगा। लेकिन बाकी राश‍ि के लिए बैंकों से धन की व्यवस्था करने के लिए समय चाहिए।

Delhi Metro says it will pay Rs 1,000 cr to Reliance Infras in 48 hrs

दिल्ली हाईकोर्ट 7,100 करोड़ रुपये के भुगतान के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए डीएमआरसी के खिलाफ रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। सुनवाई के दौरान, अदालत ने कहा: अंतिम राशि पहले ही तय हो चुकी है, गणना का मुद्दा क्या है?" डीएमआरसी ने अपने तर्क में दावा किया कि उसे 5,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा, जबकि आरइन्फ्रा ने 8,000 करोड़ रुपये का दावा किया था।

जस्टिस सुरेश कुमार कैट की बेंच के समक्ष तुषार मेहता ने कहा कि अनिल अंबानी का ये रवैया गलत है। सरकार के साथ वह कई प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं। लेकिन पैसे वापस लेने के लिए जिस तरह का सलूक कर रहे हैं वह समझ से बाहर है। नैय्यर ने मेहता के उस प्रस्ताव का भी विरोध किया जिसमें कहा गया है कि अगले 48 घंटों में 1000 करोड़ रुपये निलंब खाते में जमा कराए जाएंगे। बाकी की रकम पर बाद में विचार होगा।

इसके अलावा, डीएमआरसी ने तर्क दिया था कि नकदी की कमी है और वह एक बार में पूरी राशि का भुगतान नहीं कर सकती है। उसने कहा कि बाकी भुगतान के लिए उसे बैंकों से कर्ज लेना होगा। डीएमआरसी के सॉलिसिटर जनरल (एसजी) ने अदालत से कहा कि अगर एक बार में पूरी राशि का भुगतान कर दिया जाता है तो सार्वजनिक कार्य प्रभावित होंगे। हाईकोर्ट ने अब सुनवाई 22 दिसंबर के लिए टाल दी है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 9 सितंबर को दिल्ली मेट्रो रेलवे कारपोरेशन से कहा कि वह अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर को उसके क्लेम का भुगतान करे। कंपनी को इंट्रेस्ट भी दिया जाना है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में DAMEPL के पक्ष में 2017 में आए मध्यस्थता अदालत के फैसले को बरकरार रखा। DMRC में दिल्ली सरकार की हिस्सेदारी 50 फीसदी है। जबकि केंद्र की 50 फीसदी हिस्सेदारी है।

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