हौसलों की उड़ान! एक हाथ था लेकिन नहीं हारी जज्बा, बनाया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड
लंदन, 24 मई। पंख से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है। लंदन की अनुशे हुसैन के ऊपर ये कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है जिन्होंने सिर्फ एक हाथ की मदद से 1229 फीट और 9 इंच की खड़ी ऊंचाई पर चढ़कर एक नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। अनुशे ने एक घंटे के रिकॉर्ड समय में ये पूरा किया है।

जन्म के समय से ही नहीं था एक हाथ
लंदन में रहने वाली अनुशे हुसैन जब पैदा हुई तो उनका कोहनी के नीचे से दाहिना हाथ ही नहीं था लेकिन उन्होंने एक हाथ न होने के बावजूद जज्बा नहीं कम होने दिया और आज गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करा दिया है।
अनुशे ने बताया कि जब वह चढ़ाई के लिए प्रशिक्षण ले रही थी तो सबसे कठिन था उस हिस्से का इस्तेमाल करने पर ध्यान केंद्रित करना जो लोगों की नजर में सबसे कमजोर था। वो अपन दाहिने हाथ की बात कर रही थीं।

जब डबल मुश्किल से हुआ सामना
गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड से बात करते हुए हुसैन ने बताया कि उनकी छोटी बाजू वास्तव में दीवार पर उनकी सबसे प्रभावी बांह थी। ऐसे में उन्हें यह सीखना था कि केवल बाएं हाथ की मदद से सीधी चढ़ाई को कैसे चढ़ें। साथ ही इस दौरान अपना संतुलन कैसे बनाएं रखें, एक ही हाथ से कैसे ताकथ भरें और सबसे महत्वपूर्ण अपने सबसे कमजोर पक्ष (दाएं हाथ) के साथ काम करने के लिए सामंजस्य कैसे बिठाएं।
अनुशे के लिए सिर्फ यही एक समस्या नहीं थी। किशोरावस्था में वह कैंसर और एहलर्स-डानलोस सिंड्रोम का शिकार हो गई और इसने उनके 10 साल ले लिए। इससे उबरने के बाद उन्होंने चढ़ाई को एक खेल के रूप में चुना।

लंबे समय के बाद खुद के सामान्य होने का अहसास
जीतने के बाद उन्होंने कहा "मैं दीवार पर एक सामान्य इंसान की तरह थी। मैं सिर्फ एक पर्वतारोही थी। लंबे समय में पहली बार, मैंने पहली बार खुद को एक आम इंसान की तरह महसूस किया न कि एक विकलांग शख्स के रूप में जो लंबे समय से अपनी पहचान के साथ संघर्ष कर रहा है।
उन्होंने कहा कि पिछला साल स्वास्थ्य के लिहाज से मेरे लिए बहुत ही बुरा था। इसलिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड का खिताब मिलना या फिर इसलिए लिए प्रयास करना भी मेरे लिए मील का पत्थर साबित होगा।

कभी मार्शल ऑर्ट को बनाया था करियर
अनुशे के लिए चढ़ाई करना पहला खेल नहीं था। उन्होंने किशोर के रूप में मार्शल आर्ट को अपना करियर चुना था। इसमें उन्हें सफलता भी मिली और लग्जमबर्ग जाने वाली राष्ट्रीय टीम का हिस्सा भी बनीं लेकिन इसी बीच उन्हें एहलर्स-डैनलॉस सिंड्रोम के बारे में पता चला और उन्हें यह खेल छोड़ना पड़ा। सिंड्रोम से उबरने के बाद उन्होंने एक बार फिर हौंसला बांधा और चढ़ाई को चुना। आज वह गिनीज रिकॉर्ड में नाम दर्ज कर चुकी हैं।
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