कोरोना: ओमिक्रॉन वेरिएंट की लहर से कैसे बच सकेंगे हम? - दुनिया जहान
इस साल नवंबर के मध्य में दक्षिणी अफ्रीका के बोत्सवाना में वैज्ञानिक एक नए तरीके के कोविड वायरस के सैंपल देख रहे थे. उन्हें वायरस की स्पाइक प्रोटीन में कई ऐसे म्यूटेशन्स दिखे जो पहले नहीं देखे गए थे.
इसके तीन हफ्तों में ही वायरस का ये वेरिएंट 70 से अधिक मुल्कों और अमेरिका के क़रीब 15 राज्यों में फैल चुका था. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वेरिएंट B.1.1.529 को नाम दिया ओमिक्रॉन और इसे "चिंता का विषय" बताया.
संगठन ने इसे डेल्टा से अधिक संक्रामक तो बताया है पर ये भी कहा है कि उसके मुक़ाबले ये अधिक घातक है या नहीं ये जानने में अभी वक्त लगेगा.
तो इस सप्ताह दुनिया जहान में पड़ताल इस बात की कि कोरोना वायरस के इस नए वेरिएंट से हम लड़ेंगे कैसे?
म्यूटेशन क्यों
आगे बढ़ें उससे पहले समझते हैं कि वायरस आख़िर म्यूटेट क्यों करता है?
व्यक्ति को संक्रमित करने के बाद वायरस और फैलने के लिए अपनी नकल बनाता है, ये उसके लिए कभी न रुकने वाली प्रक्रिया है. इस दौरान वो कभी-कभी गड़बड़ी कर देता है जिसे हम म्यूटेशन कहते हैं. जब वायरस में इतने म्यूटेशन हो जाते हैं कि वो पहले से अलग दिखने लगे तो उसे नया वेरिएंट करते हैं.
कोरोना वायरस सबसे पहले चीन के वुहान में मिला, कुछ वक्त बाद इसका एक वेरिएंट सामने आया जिसे अल्फ़ा नाम दिया गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यूनानी अक्षरों की तर्ज पर वेरिएंट्स के नाम दिए और हाल के डेल्टा (B.1.617.2) के बाद अब वायरस का नया ओमिक्रॉन वेरिएंट ( B.1.1.529) सामने आया है.
प्रोफ़ेसर रिचर्ड लेज़ल्स, दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ क्वाज़ुलू-नटाल में संक्रामक रोग विशेषज्ञ हैं. वो बताते हैं कि हाल के महीनों में बड़ी संख्या में लोग या तो कोविड से ठीक हुए हैं या उन्हें टीका दिया जा रहा है. ऐसे में माना जा सकता है कि संक्रमण फिर से हुआ तो ये लोग गंभीर बीमारी से बच पाएंगे.
वो कहते हैं, "शुरुआत में माना जा रहा था कि संक्रमण से लोग मामूली बीमार पड़ रहे हैं. लेकिन इनमें से अधिकतर 10 से 30 साल की उम्र तक के युवा थे, इनमें छात्र थे जिनका लोगों से मिलना-जुलना अधिक था. हमें समझना होगा कि पूरी तरह वैक्सीनेटेड न होने पर भी वो गंभीर रूप से बीमार नहीं होंगे.
जून-जुलाई में जब डेल्टा की लहर आई थी तब दोबारा संक्रमण की दर में कुछ ख़ास बढ़त नहीं देखी गई थी. लेकिन अभी तस्वीर अलग है. ओमिक्रॉन की लहर की शुरूआत में ही विशेषज्ञ दोबोरा संक्रमण के जोख़िम में तीन गुना बढ़ोतरी देख रहे हैं. इसका मतलब ये है कि ये वेरिएंट लोगों की उस इम्यूनिटी को भी भेद पा रहा है जो लोगों को पहले हुए संक्रमण से मिली थी."
- ओमिक्रॉन वेरिएंट को लेकर भारत सरकार ने जारी की सलाह
- भारत में भी ओमिक्रॉन की दस्तक, पहली बार मिले दो मामले
बचाव के प्रयास कम
कोरोना वायरस का पहला मामला क़रीब 18 महीनों पहले मिला था. तब से लेकर अब तक इसमें कई म्यूटेशन्स आ चुके हैं. अल्फ़ा के मुक़ाबले डेल्टा अधिक घातक था, ऐसे में ओमिक्रॉन को लेकर चिंता बेवजह नहीं.
प्रोफ़ेसर रिचर्ड कहते हैं, "लोग आपस में घुल-मिल रहे हैं, सार्वजनिक तौर पर अधिक लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर पाबंदी नहीं है. देखा जाए तो वायरस को फैलने से रोकने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं किया जा रहा. लेकिन जो मुल्क अभी डेल्टा का क़हर झेल रहे हैं वहां पाबंदियां हैं. डर ये है कि कहीं ऐसा न हो कि जब तक ओमिक्रॉन को फैलने से रोकने के लिए क़दम उठाए जाएं तब तक स्थिति बिगड़ जाए."
इस दुविधा में सरकारें भी हैं कि कहीं उनके हाथ से वक्त न निकल जाए. लेकिन उन्हें पाबंदियों का विरोध होने का भी डर है.
प्रोफ़ेसर रिचर्ड कहते हैं, "नए वेरिएंट के बारे में पता चलते की तीव्र प्रतिक्रिया हुई, कई मुल्कों की सरकारों ने यात्रा प्रतिबंध लगाए. लेकिन जब तक प्रतिबंध लागू किए गए तब तक ये वायरस कई मुल्कों तक पहुंच चुका था. उन जगहों पर प्रतिबंध लगाने से जहां संक्रमितों की संख्या अधिक है वायरस को फैलने को रोका जा सकेगा ये ज़रूरी नहीं. साथ ही एक चुनौती ये भी है कि कहीं प्रतिबंधों के डर से नए वेरिएंट के बारे में जानकारी देने से पहले लोग दोबारा सोच में न पड़ जाएं."
दक्षिण अफ्रीका ने नए वेरिएंट का पता चलते ही जल्द से जल्द इसकी जानकारी दी और जीनोम सीक्वेंस पब्लिश किया. इससे वैज्ञानिकों की मदद तो हुई लेकिन ख़ुद उसके लिए चुनौतियां कम नहीं रहीं.
प्रतिरक्षा तंत्र पर कैसे असर डालता है
प्रोफ़ेसर फ्रांस्वा बालू यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में जेनेटिक्स इंस्टीट्यूट के निदेशक हैं. विषाणुओं का जीनोम सीक्वेंस पढ़कर वो ये जानने की कोशिश करते हैं कि कोई वेरिएंट किसी व्यक्ति को कैसे प्रभावित करेगा, यानी वैक्सीनेटेड या पहले कोविड संक्रमित व्यक्ति का इम्यून सिस्टम उसे रोक पाने में कितना सक्षम होगा.
वो कहते हैं, "हमारा इम्यून सिस्टम इस वायरस के सैंकड़ों हिस्से पहचान सकता है. लेकिन इसके छह ऐसे हिस्से हैं जो संक्रमण रोकने में महत्वपूर्ण होते हैं और स्पाइक प्रोटीन में हैं. ये वायरस को कोशिका से चिपकने में मदद करते हैं. अगर इनमें बदलाव आया तो हमारा इम्यून सिस्टम वायरस को नहीं पहचान पाएगा."
संक्रमित करने के लिए वायरस के लिए इम्यून सिस्टम को पार करना बेहद महत्वपूर्ण है.
वो कहते हैं, "अगर एंटीबॉडी वायरस के इन हिस्सों को नहीं पहचान पाती तो संक्रमण का ख़तरा अधिक रहता है. हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ेगा क्योंकि हमारा इम्यून सिस्टम अभी भी वायरस के सैंकड़ों हिस्से पहचानता है. हालांकि इसके छह हिस्से बेहद महत्पूर्ण हैं और ओमिक्रॉन में इनमें से तीन में बदलाव है, इसलिए ये पहले के वेरिएंट के मुक़ाबले कहीं अधिक संक्रामक हैं."
मतलब ये कि इम्यूनिटी अच्छी है तो कुछ हद तक ओमिक्रॉन से लड़ने में मदद मिल सकती है. साथ ही वैज्ञानिक ऐसी दवा बनाने के काम में जुटे हैं जो वायरस को रेप्लीकेट करने से रोक सकेंगे.
प्रोफ़ेसर फ्रांस्वा बालू कहते हैं, "मर्क मोल्नुपीराविर नाम की दवा बना रहा है जो रेप्लीकेट करते वक्त वायरस की ग़लतियां बढ़ा सकता है और उनमें इतने अधिक म्यूटेशन्स पैदा कर सकता है कि वायरस असरदार नहीं रह जाता. एक और दवा है फ़ाइज़र की जो वायरस की रेप्लीकेट करने की क्षमता को ही रोक देता है. हमें उम्मीद है कि ये दोनों ओमिक्रॉन का मुक़ाबला कर सकेंगे."
फ्रांस्वा कहते हैं इसकी पूरी आशंका है कि संक्रमण के मामले में ओमिक्रॉन डेल्टा को पीछे छोड़ कोरोना वायरस का डोमिनेन्ट वेरिएंट बन जाए. हालांकि इसे लेकर अभी अनिश्चितता है.
वैक्सीन कंपनियों ने भरोसा दिलाया है कि ओमिक्रॉन और किसी और संभावित वेरिएंट से लड़ने के लिए वैक्सीन जल्द बनाई जा सकती है.
वो कहते हैं, "हम ये मान सकते हैं कि अगर हम बार-बार वैक्सीन लेते हैं और कोरोना के संक्रमण से ठीक भी हुए हैं तो हम वायरस से लड़ने में बेहतर हो सके हैं. बचपन से लेकर अब तक हम सैंकड़ों वायरस के संपर्क में आते हैं जिनसे हम गंभीर रूप से बीमार नहीं पड़ते. जब हम फिर से उसी वायरस से संक्रमित होते हैं तो कई बार हमें इसका पता तक नहीं चल पाता. हो सकता है कि वक्त के साथ ये वायरस ऐसा बन जाए जो बड़ी तबाही न मचा सके"
हालांकि ये भी हो सकता है कि इसमें कुछ साल का वक्त लगे. लेकिन इस बीच हम और क्या उम्मीद कर सकते हैं.
बेहतरी तक का लंबा सफ़र
क्लेयर ब्रायंट यूनिवर्सिटी ऑफ़ केम्ब्रिज में इन्नेट इम्यूनिटी की प्रोफ़ेसर हैं. वो कहती हैं कि व्यक्ति को संक्रमित करने के बाद कोई नया वेरिएंट उसे कैसे प्रभावित करता है ये जानने में हफ्तों का वक्त लग सकता है.
वो कहती हैं, "अभी तक हमें ये पता है कि ओमिक्रॉन, डेल्टा से अधिक संक्रामक है और ये चिंता का विषय है क्योंकि इससे अस्पतालों पर दबाव बढ़ सकता है. लेकिन एक और मुश्किल ये भी है कि अधिक संक्रामक होने के कारण ये वायरस अधिक लोगों के शरीर में होगा तो इसके म्यूटेट करने की संभावना भी अधिक होगी. यानी और नए वेरिएंट पैदा हो सकते हैं जो ख़तरा बन सकते हैं. इस पर लगाम लगाने के लिए वैक्सीन बेहद ज़रूरी है."
क्लेयर कहती हैं कि नियमित अंतराल पर वैक्सीन लेने से इसमें मदद मिल सकती है. कई मुल्क फ्लू वायरस से निपटने के लिए इसी तरह की रणनीति अपनाते हैं.
वो कहती हैं, "वैक्सीन देने से जो वायरस सर्कुलेशन में है उसकी संख्या को कम किया जा सकेगा और वो म्यूटेट कर ऐसे वेरिएंट नहीं बना सकेगा जो हमें गंभीर रूप से बीमार कर सके. फ्लू वायरस के साथ यही होता है, हर साल उसके नए स्ट्रेन को लेकर वैक्सीन बनती है और इससे वायरस को काबू में रखने में मदद मिलती है. हो सकता है कि आने वाले वक्त में म्यूटेशन से इसके कम घातक वेरिएंट बनें, लेकिन अभी कुछ कहना मुश्किल है."
इसके लिए ज़रूरी है कि वैज्ञानिक नए वेरिएंट्स पर नज़र रखें ताकि वैक्सीन तैयार करने में मदद मिल सके.
क्लेयर कहती हैं, "दक्षिण अफ्रीका ने इस मामले में जल्द जानकारी देकर बेहतरीन काम किया है, लेकिन आने वाले वक्त में चुनौती ये है कि क्या दूसरे मुल्क भी नए वेरिएंट की जानकारी देने के लिए आगे आएंगे."
एक अहम सवाल ये भी है कि क्या वैक्सीन में बदलाव करना आसान होगा?
वो कहती हैं, "अब तीन महीनों के वक्त में नई वैक्सीन बनाई जा सकती है क्योंकि इसके लिए बस मौजूदा वैक्सीन में कुछ बदलाव करने होंगे. अभी हमें ये भी नहीं पता कि कहीं इस बीच कोई नया वेरिएंट न आ जाएं लेकिन फिर भी हम 18 महीने पहले के मुक़ाबले बेहतर स्थिति में हैं."
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तैयारी कितनी ज़रूरी
हमारे चौथे एक्सपर्ट डॉक्टर विकास भाटिया अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान हैदराबाद के कार्यकारी निदेशक हैं. वो कहते हैं कि अब तक ओमिक्रॉन के मामले जहां सामने आए हैं वहां इस कारण मृत्युदर में बहुत बदलाव नहीं देखा गया है. लेकिन वायरस लगातार बदलता रहता है इस कारण ज़रूरी है कि हम बेफ़िक़्र न हों.
वो कहते हैं, "हो सकता है कि ये एक तरफ़ बिगनिंग ऑफ़ द एंड ऑफ़ द कोविड पैन्डेमिक हो. ये एक शुरुआत हो सकती है, बशर्ते बीच में कोई ऐसा म्यूटेशन ना आ जाए जो बहुत ही ख़तरनाक हो. ये अभी हमें देखना पड़ेगा.
लेकिन हमें हमेशा इसके लिए तैयार रहना है. दुश्मन किस प्रकार से अपना स्वभाव बदल ले हमें उस बात को समझना है और तैयार रहना है. वायरस में लगातार म्यूटेशन होता है, फिर म्यूटेशन होगा और नया वायरस आएगा और इसे लेकर चिंता भी रहेगी.
लेकिन ये बात भी है कि इससे बचने का सबसे आसान और भरोसेमंद हथियार है मास्क है और सभी लोग टीका भी लगवा लें क्योंकि इसके बाद अस्पताल में भर्ती होने की दर में कमी आ सकती है."
डॉक्टर विकास कहते हैं कि अलग-अलग सर्वे में ये पता चला है कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा या तो वायरस के संपर्क में आ चुका है या फिर इसके संक्रमण से उबर चुका है. ऐसे में उनके शरीर में कुछ इम्यूनिटी है और फिर कुछ मदद टीकाकरण से भी मिल सकती है.
वो कहते हैं, "अगले कुछ दिनों में 18 साल से अधिक की आयु के 90 फ़ीसदी लोगों को कोविड का कम से कम एक टीका लग जाएगा. ये अपने आप में बड़ी बात है. 90 फ़ीसदी के आसपास सीरो पॉज़ीटिविटी और 90 फ़ीसदी तक एक टीका इन दोनों को मिलाकर हम हाइब्रिड इम्युनिटी कहते हैं. कोविड के ख़िलाफ़ ये हमें ताक़त प्रदान करता है."
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बच्चों के लिए ख़तरा कितना
लेकिन उनका क्या जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है यानी बच्चे, क्या उन्हें अधिक ख़तरा हो सकता है?
डॉक्टर विकास कहते हैं, "कुछ मामले आजकल बच्चों और किशोरों में ज़्यादा सुनने को मिल रहे हैं क्योंकि बड़ों में वैक्सीन और हाइब्रिड इम्यूनिटी आ चुकी है. लेकिन अच्छी बात ये है कि बच्चों और किशोरों में चिंता वाली बात नहीं आई क्योंकि उनमें ना के बराबर मौत हुई और अस्पतालों में जाने के ऐसे मामले भी नहीं आ रहे हैं जिसे लेकर हम चिंतित हों. लेकिन हमें समझना होगा कि संक्रमण और बीमारी में फ़र्क़ है, संक्रमण सबको हो सकता है, ज़रूरी नहीं है कि बीमारी हो."
लेकिन सवाल ये है कि वायरस घातक न भी हुआ तो भी संक्रामक होने के कारण वो अधिक लोगों को बीमार कर सकता है. ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था पर दवाब पड़ना लाजमी है?
वो कहते हैं, "इसीलिए हम इस बात पर बार-बार ज़ोर दे रहे हैं कि अगर मान लीजिए लाखों लोगों को एक साथ ये संक्रमण हो गया तो भले ही इस कारण मृत्यु दर कम हो, अस्पताल में भर्ती होने की दर तो ज़्यादा होगी और उसके अनुसार हमारे पास बेड का इंतज़ाम होना चाहिए. हमें इसके लिए सतर्क और तैयार रहना है क्योंकि आगे ये कैसे फैलता है, कैसे स्वरूप बदलता है उसके बारे में कहना अभी मुश्किल है."
हम कितने तैयार और मुक़ाबला कैसे
लेकिन डेल्टा की लहर का मुक़ाबला करने के बाद ओमिक्रॉन से लड़ने के लिए हम कितने तैयार हैं और सरकार को किस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है.
डॉक्टर विकास भाटिया बताते हैं, "भारत सरकार ने कोविड की दूसरी लहर के वक़्त काफ़ी तैयारी कर ली है, अब ये देखना है कि वो सब चीज़ें तैयार हैं और एक्टिव मोड हैं और अस्पताल रेडी हैं. लोगों को इस बारे में अधिक जागरूक करने की ज़रूरत है. साथ ही टेस्टिंग को और बढ़ाने की ज़रूरत है. अभी ऐसा नहीं लगता कि पहले जैसी स्थिति बनेगी क्योंकि अब हम लोग पहले के काफ़ी अच्छे तरीके से तैयार हैं."
लौटते हैं अपने सवाल पर ओमिक्रॉन वेरिएंट की लहर से हम मुक़ाबला कैसे करेंगे?
इसका जवाब इस बार पर निर्भर करता है कि नया वेरिएंट कैसा है. अब तक जो पता है उसके अनुसार ये अधिक संक्रामक तो है, लेकिन ये कितनी गंभीर बीमारी कर सकता है इस बारे में अभी स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं पता.
अगर अधिक संख्या में लोग बीमार पड़े तो ये मतलब होगा कि ये हमारे इम्यून सिस्टम को भेद सकता है और ऐसे में सरकारों को अधिक पाबंदी लगाने की ज़रूरत होगी और ये वायरस महामारी वायरस से आम वायरस बने इसके लिए हर साल वैक्सीन बनाने का काम भी चालू रखना होगा.
आख़िर में महामारी चूहे बिल्ली के खेल के जैसी है और उम्मीद की जा रही है कि इस खेल में जीत वैज्ञानिकों की होगी.
प्रोड्यूसर - मानसी दाश
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