बिहार के मतदाता सूची संशोधन पर उठे सवाल,गैरकानूनी प्रक्रिया साबित हुई तो पूरे देश में SIR हो सकता है रद्द- SC
SC On Sir: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पर जो सख़्त टिप्पणी की है, वह भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी नींव, मतदान के अधिकार की गंभीरता को रेखांकित करती है। अदालत ने यह साफ़ कर दिया कि अगर चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची संशोधन के दौरान किसी तरह की गैरकानूनी प्रक्रिया अपनाई गई, तो न केवल बिहार बल्कि देशभर में जारी ऐसी सभी कवायदें रद्द की जा सकती हैं।
यह चेतावनी उस समय आई है जब कई राज्यों में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज़ हैं और मतदाता सूची में गड़बड़ियां चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह ही यह निर्देश दिया था कि मतदाता सूची संशोधन में आधार कार्ड को 12वें वैध दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाए।

आधार कार्ड पर नया विवाद
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं, लेकिन पहचान और निवास का ठोस सबूत है। दरअसल, कई शिकायतें मिल रही थीं कि स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने आधार को मानने से इनकार किया, जबकि यह सबसे अधिक प्रचलित पहचान पत्र है। न्यायालय का यह रुख व्यावहारिक है, क्योंकि जब तक नागरिकता के अलग प्रमाण की बाध्यता न हो, तब तक पहचान और पते के लिए आधार को नकारने का कोई औचित्य नहीं है।
विपक्ष के आरोप और जनता की चिंता
बिहार में विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि असली मतदाताओं के नाम बिना समुचित जांच के सूची से हटा दिए जा रहे हैं। यदि यह सच है, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए 11 दस्तावेज़ तय किए हैं, पर आधार कार्ड को प्रारंभिक सूची में शामिल न करना आम मतदाताओं के लिए कठिनाई का कारण बना। गांव-गांव में मतदाता शिविरों में लंबी कतारें और दस्तावेज़ों की कमी लोगों के बीच अविश्वास को जन्म दे रही है।
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसका काम ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही आयोग की नीयत पर संदेह नहीं जताया, लेकिन यह भी कहा कि वह कानून और नियमों के पालन को लेकर सतर्क है। यह संदेश साफ़ है कि आयोग को हर स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। मतदाता सूची लोकतंत्र की रीढ़ है; इसमें एक भी गड़बड़ी सीधे तौर पर चुनाव की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
लोकतांत्रिक चेतावनी
यह मामला केवल बिहार का नहीं, पूरे देश के लिए चेतावनी है। आने वाले महीनों में कई राज्यों में चुनाव होने हैं। अगर मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया में लापरवाही या पक्षपात हुआ तो यह केवल राजनीतिक दलों के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए बड़ा झटका होगा। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से उम्मीद है कि आयोग अपने सभी राज्य कार्यालयों को स्पष्ट निर्देश देगा कि हर वैध दस्तावेज़, खासकर आधार, को समान रूप से स्वीकार किया जाए और किसी मतदाता को मनमाने तरीके से सूची से न हटाया जाए।
मतदान नागरिक का मूल अधिकार
मतदान नागरिक का मूल अधिकार है, और इसकी रक्षा करना सिर्फ अदालत का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र का दायित्व है। सुप्रीम कोर्ट ने यह दिखा दिया है कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। अब चुनाव आयोग की अगली परीक्षा 7 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई और उससे पहले की अपनी कार्यवाही में पारदर्शिता साबित करने की होगी। लोकतंत्र की ताक़त इसी में है कि हर नागरिक का वोट सुरक्षित रहे और हर आवाज़ गिने।












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