Samrat Choudhary:'बिहार के सम्राट' बनने तक की इनसाइड स्टोरी, राजनीतिक सफर से फैमिली बैकग्राउंड तक जानें सबकुछ
Samrat Choudhary Profile: बिहार की राजनीति में 14 अप्रैल 2026 सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक नए दौर की शुरुआत मानी जा रही है। करीब दो दशकों तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ( Nitish Kumar) के इस्तीफे के साथ सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदलने की कगार पर है। इसी बदलाव के केंद्र में एक नाम सबसे तेजी से उभरकर सामने आया है सम्राट चौधरी।
दिलचस्प बात यह है कि आज जिस नेता को बीजेपी का सबसे भरोसेमंद चेहरा माना जा रहा है, वही कभी लालू प्रसाद यादव की राजनीति का हिस्सा हुआ करता था। जिसे कल तक 'लालू का सिपाही' कहा जाता था। यही सफर इस कहानी को और भी खास बनाता है। सूत्रों की मानें तो वे अब बिहार के नए मुख्यमंत्री बनने की दहलीज पर खड़े हैं। ऐसे में आइए जानते हैं सम्राट चौधरी के राजनीतिक सफर से लेकर फैमिली बैकग्राउंड के बारे में हर एक डिटेल।

लालू की पाठशाला से भाजपा के शीर्ष तक का सफर (Samrat Choudhary Life Story)
सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। 16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर गांव में जन्मे सम्राट को राजनीति विरासत में मिली थी। उनके पिता शकुनी चौधरी (Shakuni Choudhary) बिहार की राजनीति के वो दिग्गज रहे हैं जिन्होंने समता पार्टी की नींव रखी, लेकिन वे कभी भाजपाई नहीं रहे। शकुनी चौधरी को लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दोनों का बेहद करीबी माना जाता था। शकुनी चौधरी कई बार विधायक और सांसद रह चुके हैं। उनकी मां पार्वती देवी भी विधायक रही हैं।
सम्राट ने अपनी सक्रिय राजनीति की शुरुआत 1990 के दशक में लालू यादव की छत्रछाया में की थी। 1999 में वे राबड़ी देवी की सरकार में कृषि मंत्री बने। उस वक्त उनकी उम्र को लेकर काफी विवाद भी हुआ था। लेकिन सम्राट का असली राजनीतिक उत्कर्ष तब शुरू हुआ जब उन्होंने 'समाजवाद' की ढाल छोड़कर भाजपा का 'भगवा' थाम लिया। 2018 में भाजपा में शामिल होने के बाद, उन्होंने महज 8 साल के भीतर वो मुकाम हासिल कर लिया जिसे पाने में दशकों लग जाते हैं।
कई दलों का सफर, लेकिन असली उछाल BJP में (Samrat Choudhary Rise in BJP)
राजनीति में कई दलों का अनुभव लेने के बाद सम्राट चौधरी ने 2017-18 के आसपास बीजेपी का दामन थामा। यहीं से उनके करियर ने तेज रफ्तार पकड़ी। बीजेपी में शामिल होने के बाद उनका कद लगातार बढ़ता गया। 2019 में उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया, 2020 में एमएलसी बने और 2022 में विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी मिली।
2023 में उन्हें बिहार बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, यह वह मोड़ था, जहां से वे सीधे सत्ता के केंद्र में आ गए। 2024 में वे डिप्टी सीएम और वित्त मंत्री बने और बाद में गृह मंत्रालय जैसे अहम विभाग की जिम्मेदारी भी उनके पास आ गई।

मोदी-शाह के भरोसेमंद बनने का गुप्त फॉर्मूला
सवाल उठता है कि जो नेता संघ (RSS) की पृष्ठभूमि से नहीं आता, वो प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का इतना चहेता कैसे बन गया? इसका जवाब उनके काम करने के 'आक्रामक अंदाज' और 'जातीय समीकरण' में छिपा है।
जब अगस्त 2022 में नीतीश कुमार ने भाजपा को धोखा देकर महागठबंधन का हाथ थामा था, तब भाजपा को एक ऐसे नेता की तलाश थी जो नीतीश की आंखों में आंखें डालकर बात कर सके। अमित शाह ने सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर उन पर बड़ा दांव खेला। सम्राट ने भी हार नहीं मानी और संकल्प लिया कि जब तक नीतीश को कुर्सी से नहीं हटा देंगे, तब तक सिर पर 'मुरैठा' (पगड़ी) बांधे रखेंगे। उनकी यह जिद और फिर अयोध्या में राम मंदिर दर्शन के बाद उस संकल्प को पूरा करना, दिल्ली दरबार को भा गया। उन्होंने साबित कर दिया कि वे न केवल एक कुशल रणनीतक हैं, बल्कि जमीन पर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का दम भी रखते हैं।
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जाति का गणित: लव-कुश समीकरण में 'कुश' की ताकत (Samrat Choudhary Caste Equations)
बिहार में सत्ता का रास्ता जातियों से होकर गुजरता है। सम्राट चौधरी 'कोइरी' (कुशवाहा) जाति से आते हैं। 2023 की जातीय गणना के मुताबिक बिहार में कुशवाहा समाज की आबादी लगभग 4.2 प्रतिशत है। नीतीश कुमार का सबसे बड़ा पावर हाउस 'लव-कुश' (कुर्मी-कोइरी) समीकरण रहा है। भाजपा ने सम्राट को आगे करके नीतीश के इसी अभेद्य किले में सेंध लगा दी।
सम्राट को आगे रखने के पीछे भाजपा की सोची-समझी रणनीति है कि यादवों के बाद सबसे बड़े ओबीसी समूह यानी कुशवाहा समाज को अपने पाले में लाया जाए। सम्राट की छवि एक कड़क ओबीसी नेता की है, जो न केवल अपने समाज की बात करता है, बल्कि पूरे ओबीसी वर्ग को भाजपा के पक्ष में लामबंद करने की क्षमता रखता है।

गृह मंत्री के रूप में 'योगी मॉडल' की झलक
नवंबर 2025 में जब सम्राट चौधरी दोबारा डिप्टी सीएम बने और उन्हें 'गृह विभाग' की जिम्मेदारी मिली (जो पिछले 20 साल से नीतीश कुमार अपने पास रखते थे), तो बिहार की पुलिसिंग में बड़ा बदलाव दिखा। उन्होंने पद संभालते ही अपराधियों को साफ चेतावनी दी'या तो अपराध छोड़ो या बिहार'।
बेगूसराय के गैंगस्टर शिवदत्त राय पर हुई त्वरित कार्रवाई को बिहार के लोगों ने 'यूपी वाले योगी मॉडल' की शुरुआत माना। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के लिए 'अभय ब्रिगेड' और 'पिंक पोलिसिंग' की शुरुआत की। साथ ही डायल 112 के रिस्पॉन्स टाइम को 10 मिनट से कम करने का निर्देश दिया। अवैध खनन और भू-माफियाओं के खिलाफ उनके 'बुलडोजर' वाले तेवर ने उन्हें भाजपा आलाकमान की नजरों में और भी ऊंचा उठा दिया।
घर-परिवार और शिक्षा: विवादों से लेकर उपलब्धियों तक (Samrat Choudhary Family Background and Education)
सम्राट का परिवार बिहार के सबसे रसूखदार राजनीतिक परिवारों में से एक है। पिता शकुनी चौधरी 7 बार विधायक और सांसद रहे हैं, तो माता पार्वती देवी भी तारापुर से विधायक रह चुकी हैं। सम्राट ने अपनी उच्च शिक्षा मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से प्राप्त की, हालांकि उनकी डिग्री को लेकर समय-समय पर विरोधियों ने सवाल भी उठाए।
उनका निजी जीवन अनुशासन और राजनीति के प्रति समर्पण से भरा है। 1995 में राजनीति के शुरुआती दौर में वे 89 दिनों के लिए जेल भी गए थे, जिसका जिक्र बिहार विधान परिषद की वेबसाइट पर भी है। यह उनके जुझारू व्यक्तित्व को दिखाता है कि वे जमीन से उठकर आज सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे हैं।

Samrat Choudhary Profile (सम्राट चौधरी प्रोफाइल)
- 16 नवंबर 1968: मुंगेर के लखनपुर गांव में जन्म। पिता शकुनी चौधरी और माता पार्वती देवी।
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: पिता 7 बार विधायक/सांसद रहे और माता भी तारापुर से विधायक रहीं।
- शिक्षा: मुंगेर से शुरुआती पढ़ाई के बाद मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की।
राजनीतिक सफर: साल दर साल (Samrat Choudhary Political Career Timeline)
- 1990: सक्रिय राजनीति में कदम रखा।
- 1995: राजनीतिक आंदोलन के दौरान 89 दिनों तक जेल में रहे।
- 19 मई 1999: राबड़ी देवी सरकार में कृषि मंत्री के रूप में शपथ ली।
- 2000: परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक चुने गए।
- 2010: दूसरी बार विधायक बने और विधानसभा में विपक्षी दल के मुख्य सचेतक नियुक्त हुए।
- 2014: राजद (RJD) में टूट का नेतृत्व किया और जीतन राम मांझी सरकार में नगर विकास एवं आवास मंत्री बने।
- 2017: औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए।
- 2018: बिहार भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए गए।
- 2020: भाजपा कोटे से विधान परिषद (MLC) के सदस्य निर्वाचित हुए।
- 2021: नीतीश कुमार की कैबिनेट में पंचायती राज मंत्री बनाए गए।
- 2022: बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) चुने गए।
- मार्च 2023: बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष (State President) नियुक्त हुए।
- जनवरी 2024: भाजपा विधायक दल के नेता बने और पहली बार बिहार के उपमुख्यमंत्री (Deputy CM) के रूप में शपथ ली।
- फरवरी 2024: वित्त, स्वास्थ्य और नगर विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला।
- जुलाई 2024: अयोध्या में सरयू स्नान के बाद अपनी 'प्रतिज्ञा की पगड़ी' उतारी।
- 25 जुलाई 2024: भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल पूरा हुआ (दिलीप जायसवाल नए अध्यक्ष बने)।
- नवंबर 2025: बिहार विधानसभा चुनाव में तारापुर सीट से जीत दर्ज की और दोबारा उपमुख्यमंत्री बने।
- दिसंबर 2025: उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ बिहार के गृह मंत्री (Home Minister) का प्रभार संभाला।

बिहार में 'सम्राट' युग की आहट
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार भाजपा के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह इस बात का प्रतीक है कि भाजपा अब पिछलग्गू पार्टी बनकर नहीं रहना चाहती। सम्राट के पास प्रशासनिक अनुभव है, जातीय समर्थन है और सबसे बड़ी बात- उनके पास मोदी-शाह का भरोसा है। अब देखना यह होगा कि 'लालू के पूर्व सिपाही' और अब 'भाजपा के सेनापति' सम्राट चौधरी बिहार के विकास की गाड़ी को किस रफ्तार से आगे ले जाते हैं।
सम्राट चौधरी को लेकर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. सम्राट चौधरी की जाति क्या है?
सम्राट चौधरी कोइरी (कुशवाहा) जाति से संबंध रखते हैं, जो बिहार में एक प्रभावशाली ओबीसी वर्ग है।
2. सम्राट चौधरी के पिता कौन हैं?
उनके पिता शकुनी चौधरी हैं, जो बिहार के कद्दावर नेता, पूर्व सांसद और विधायक रह चुके हैं।
3. सम्राट चौधरी ने सिर पर पगड़ी क्यों बांधी थी?
उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक वे नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से नहीं हटा देंगे, तब तक पगड़ी नहीं उतारेंगे।
4. सम्राट चौधरी कब भाजपा में शामिल हुए?
वे साल 2018 में आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे।
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