Pawan Singh: किस जाति से हैं भोजपुरी पावर स्टार पवन सिंह? बिहार की राजनीति में कितना है उनके कास्ट का दबदबा
Bihar Election 2025 (Pawan Singh): बिहार की राजनीति में जाति का असर हमेशा से सबसे बड़ा फैक्टर रहा है। यहां हर विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण ही तय करते हैं कि बाजी किसके हाथ लगेगी। ऐसे में जब भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार और पावर स्टार कहलाने वाले पवन सिंह सक्रिय राजनीति में कदम रखते हैं, तो चर्चा का मुद्दा सिर्फ उनका स्टारडम नहीं रहता, बल्कि उनकी जातीय पृष्ठभूमि भी सुर्खियों में आ जाती है। वनइंडिया हिंदी की खास सीरिज "जाति की पाति" में आज बात पावर स्टार पवन सिंह की।
करीब डेढ़ साल बाद बीजेपी में वापसी करने वाले पवन सिंह के बारे में कयास है कि वे 2025 विधानसभा चुनाव में आरा से उम्मीदवार हो सकते हैं। गानों और फिल्मों के जरिए घर-घर में पहचान बनाने वाले पवन अब पूरी तरह राजनीति में सक्रिय दिख रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पवन सिंह किस जाति से आते हैं और उनकी जाति का बिहार की सियासत में कितना दबदबा है।

Pawan Singh caste: क्या है पवन सिंह की जाति?
पवन सिंह का जन्म 5 जनवरी 1986 को बिहार के भोजपुर जिले (आरा) में हुआ। भोजपुरी सिनेमा में 2007 में पवन सिंह ने डेब्यू किया था। जातिगत पहचान की बात करें तो पवन सिंह राजपूत यानी क्षत्रिय समाज से आते हैं। अक्सर लोगों में यह कन्फ्यूजन होता है कि वे यादव हैं, लेकिन असल में पवन सिंह राजपूत जाति से ताल्लुक रखते हैं।
चर्चा है कि पवन सिंह 2025 विधानसभा चुनाव में आरा या काराकाट से मैदान में उतर सकते हैं। हाल ही में उन्होंने एक 'राइज एंड फॉल' शो को बीच में छोड़कर कहा था -"मेरी जनता ही मेरा भगवान है और चुनाव के समय मेरा फर्ज है कि मैं उनके बीच रहूं।" यह बयान साफ करता है कि पवन सिंह अब फिल्मी पर्दे से ज्यादा राजनीतिक मंच पर एक्टिव रहने वाले हैं।
बिहार विधानसभा में राजपूतों की ताकत
रे बिहार की जातीय जनगणना में राजपूतों की संख्या लगभग 3.45% ही है। बावजूद इसके इनकी राजनीतिक पकड़ कम नहीं है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो 2020 में विधानसभा में 28 राजपूत विधायक जीतकर आए थे, जबकि 2015 में यह संख्या 20 थी। एनडीए ने 2020 में 29 राजपूत उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 19 जीत गए। महागठबंधन ने 18 को टिकट दिया, जिनमें से 8 ही जीत पाए। इससे साफ है कि एनडीए में राजपूत वोटर अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूती से खड़े रहते हैं।
शाहाबाद इलाके में जातीय समीकरण
भोजपुर जिला उस शाहाबाद एरिया का हिस्सा है जिसमें भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर जैसे चार जिले आते हैं। यहां कुल 22 विधानसभा सीटें हैं। इस इलाके में यादव, कुशवाहा और राजपूत जाति राजनीति को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। यादवों की संख्या करीब 20% है। कुशवाहा 10-12% तक और राजपूत लगभग 15% हैं। राजपूतों का दबदबा खासकर भोजपुर और रोहतास जिलों में काफी मजबूत है।
क्यों अहम है पवन सिंह का कास्ट फैक्टर?
शाहाबाद बेल्ट में राजपूत वोटरों का झुकाव एनडीए की तरफ रहा है, लेकिन 2020 में जदयू के कई राजपूत नेता चुनाव हार गए। यही कारण है कि बीजेपी को अब पवन सिंह जैसे चेहरे की जरूरत है जो न सिर्फ राजपूत समाज को जोड़ सकें, बल्कि भोजपुरी बेल्ट में युवाओं और आम वोटरों पर भी असर डाल सकें। पवन सिंह की पॉपुलैरिटी भोजपुरी गानों और फिल्मों की वजह से गांव-गांव तक है। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
हालांकि पवन सिंह की राह आसान नहीं होगी। यादव और कुशवाहा वोटरों की बड़ी संख्या वाले इस इलाके में अगर दो जातियां एकजुट हो जाती हैं तो चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। साथ ही, भाजपा के अंदर भी कई दिग्गज नेताओं को पवन सिंह की एंट्री पचाना मुश्किल हो सकता है। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि पवन सिंह का कास्ट फैक्टर और उनकी लोकप्रियता शाहाबाद की राजनीति को नई दिशा दे सकती है।
2024 लोकसभा चुनाव और पवन सिंह का असर
पिछले लोकसभा चुनाव में पवन सिंह ने काराकाट से निर्दलीय चुनाव लड़ा था और 2.74 लाख वोट हासिल किए। खास बात यह रही कि उन्हें एनडीए उम्मीदवार उपेंद्र कुशवाहा से 21 हजार वोट ज्यादा मिले। नतीजा यह हुआ कि पवन सिंह भले ही चुनाव न जीत सके, लेकिन वे दूसरे नंबर पर आए और एनडीए उम्मीदवार हार गए। यहां से साफ है कि पवन सिंह की लोकप्रियता को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
बीजेपी और पवन सिंह का रिश्ता
2024 के चुनाव में पवन सिंह को शुरू में पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट से टिकट दिया गया था, लेकिन विरोध के चलते टिकट काट दिया गया। नाराज पवन सिंह ने काराकाट से निर्दलीय चुनाव लड़ डाला। उनके इस कदम से बीजेपी को आरा, काराकाट और बक्सर जैसे इलाकों में नुकसान उठाना पड़ा। नतीजतन, बीजेपी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। लेकिन अब विधानसभा चुनाव से पहले पवन सिंह फिर से बीजेपी में लौट आए हैं।
पवन सिंह सिर्फ भोजपुरी सिनेमा के पावर स्टार नहीं हैं, बल्कि बिहार की राजनीति में भी एक बड़ा नाम बनने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी जाति राजपूत का बिहार की सियासत में प्रभाव भले ही सीमित हो, लेकिन शाहाबाद जैसे अहम इलाके में यह समाज निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में पवन सिंह का चुनावी मैदान में उतरना बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बड़ा आकर्षण साबित हो सकता है।
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