Nitish Kumar का फोकस- विपक्षी राजनीतिक दलों की एकजुटता, जून में बैठक के एजेंडे पर रहेंगी नजरें
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2024 के लोक सभा चुनाव से पहले गैर भाजपाई नेताओं-पार्टियों को एक मंच पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। विपक्षी राजनीतिक दलों की एकजुटता और जून में नीतीश की बैठक के एजेंडे पर सबकी नजरें हैं।

Nitish Kumar जून में बिहार की राजधानी में जुटने वाले विपक्षी नेताओं के साथ अहम बैठक करेंगे। हालांकि, बैठक की तारीख का औपचारिक ऐलान बाकी है, लेकिन बैठक में राहुल गांधी जैसे शीर्ष नेताओं की मौजूदगी इसे खास बनाती है।
नीतीश के करीबी सूत्र अगले महीने होने वाली बैठक के बारे में बेहद आशान्वित हैं। पिछले साल अगस्त में राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस समेत 7 दलों के एकसाथ गठबंधन वास्तव में हैरानी भरा था।
नीतीश का कमल छोड़कर RJD की लालटेन थामना, भाजपा विरोधी गठबंधन की रूपरेखा को आकार देने की शुरुआत मानी गई। नीतीश मिशन विपक्षी एकता में कैटालिस्ट के रूप में उभरे हैं।
वह न केवल कांग्रेस को सहमत करने में सफल रहे, बल्कि ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव जैसे प्रमुख क्षेत्रीय खिलाड़ियों के बीच की तल्खी कम करने में भी नीतीश की इमेज से काफी मदद मिली।
तीनों नेता पहले ही अपने 'एकला चलो' नैरेटिव को छोड़कर विपक्षी एकता बनाने की बात कर चुके हैं। अब जून में संभावित बैठक में भावी रणनीति या रुपरेखा पर सबकी नजर है।
बता दें कि विगत 21 मई को नीतीश ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी। नीतीश ने केंद्र के अध्यादेश के खिलाफ केजरीवाल की पार्टी को अपना समर्थन दिया।
नीतीश की तमाम कोशिशों के बावजूद महागठबंधन बनाने की उनकी राह में अभी भी कई बाधाएं हैं। ओडिशा में नीतीश के समकक्ष नवीन पटनायक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री और भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) सुप्रीमो के चंद्रशेखर राव (केसीआर) औपचारिक तौर पर नीतीश के साथ नहीं जुड़े हैं।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख वाईएस जगन मोहन रेड्डी भी नीतीश के कैंप में नहीं आए हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन को नीतीश के साथ माना जा रहा है।
विपक्ष की आगामी बैठक में कम से कम 450 सीटों पर भाजपा के खिलाफ एक कॉमन उम्मीदवार सुनिश्चित करना होगा। नीतीश ने पहले ही लोकसभा चुनावों में भगवा पार्टी को हराने के संभावित स्थानों के रूप में चिह्नित किया है।
2019 के लोकसभा चुनावों में अपनी लोकप्रियता के चरम पर रही भाजपा को लगभग 38 प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा की मजबूत चुनाव मशीन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का मुकाबला करने के लिए नीतीश ने एक के खिलाफ एक नीति सुझाई है।
नीतीश की आगामी बैठक पर इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, जनता दल (यूनाइटेड) के एक नेता ने कहा, "चुनावी विवरण का मतलब है कि 62 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा के खिलाफ मतदान किया। विपक्ष विचार का एक हिस्सा इन मतदाताओं को एकजुट करना है।"
इसका मतलब विपक्ष की ओर से एक सीट पर एक साझा उम्मीदवार होगा जो बीजेपी के खिलाफ लड़ेगा। संयोग से इसी तरह के सीट-बंटवारे के फॉर्मूले पर 1977 और 1989 के आम चुनावों में विपक्ष को अनुकूल चुनावी परिणाम मिले थे।
संयोग से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 24 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकता पर चर्चा करने के लिए पटना में सभी गैर-भाजपा दलों की बैठक आयोजित करने का सुझाव दिया था।
ममता ने कोलकाता में नीतीश और उनके डिप्टी तेजस्वी यादव से मुलाकात के बाद इस बारे में बात की थी। नीतीश भी आपसी मतभेद, अंतर-राज्य प्रतिद्वंद्विता, अहंकार के मुद्दों और भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को दरकिनार करने भी बात भी करते रहे हैं।












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