Bihar Politics: मांझी को नहीं मिल रहा उचित सम्मान, क्या फ्लोर टेस्ट से पहले बदलेगी सियासी फिज़ा?
Jitan Ram Manjhi News: बिहार में सत्ता परिवर्तन का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। इसी बीच बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी का क़द बढ़ने के साथ ही बार्गेनिंग पॉवर भी बढ़ गई है। सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज़ हो गी है कि कहीं बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी ही तो पॉलिटिकल ड्रामा के सूत्रधार नहीं।
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के संरक्षक जीतन राम मांझी ने भाजपा के साथ हाथ मिलाकर इस सियासी खेल की नींव, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आईना दिखाने लिए तो नहीं रखी है। आइए समझते हैं पूरा खेल क्या हो सकता है। महागठबंधन में जीतन राम मांझी नीतीश के साथ साये की तरह खड़े थे।

समय के साथ-साथ बिहार में समीकरण बदलने लगे, मांझी और नीतीश में मतभेद शुरू हुआ। इसके बाद मांझी के बटे संतोष मांझी को मंत्री पद से हटाया गया। इसके बाद हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने महागठबंधन से किनारा करते हुए एनडीए का दामन थामा।
एनडीए गठबंधन में जाते ही बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि नीतीश कुमार भी पाला बदलकर एनडीए मे ही आएंगे। इसके बाद से सियासी खेल का ताना बाना बुना जाने लगा। बिहार में एनडीए की सरकार थी, और फेरबदल की सियासत शुरू हुई थी।
जीतन मार मांझी नीतीश कुमार के साथ खड़े थे। जब सत्ता परिवर्तन (जदयू राजद गठबंधन) की नींव पड़ रही थी तो, जीतन राम मांझी को उम्मीद थी कि उन्हें विधानसभा अध्यक्ष का पद मिलेगा। लेकिन उनका सपना अधूरा ही रह गया।
जीतन राम मांझी को उम्मीद थी कि उनके बेटे संतोष मांझी को वज़नदार पद मिलेगा। लेकिन उन्हें लघु जल संसाधन के साथ अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण मंत्री बनाया गया। लघु जल संसाधन विभाग भी हाथों से गया।
अति पिछड़ा आयोग का गठन हुआ तो तो पांच सदस्य बने, जिसमें 3 जदयू और राजद कोटा से 2 बने। बिहार विधानसभा में HAM (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के चार विधायक थे। लेकिन एनडीए की सरकार में एक-एक विधायक की काफी अहमियत थी। इसलिए सीएम नीतीश के पाला बदलने से पहले जीतन मांझी ने पलटी मारी और एनडीए के साथी बन गए।
बिहार की मौजूदा एनडीए की सरकार में जीतन राम मांझी जो सम्मान चाह रहे थे, वह नहीं मिल पा रहा है। अब फ्लोर टेस्ट से पहले जीतन मांझी के सुर बदल रहे हैं। ऐसे में यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि कहीं जीतन मांझी पाला बदलते हुए महाठबंधन का दामन ना थाम लें।
सियासी दांवपेच के बीच आंकड़ों का गणित समझिए, बिहार में किल विधायकों की तादाद 243 है। बहुमत के लिए 122 विधायकों का साथ चाहिए। एनडीए 128 विधायकों के साथ का दावा कर रही है। इनमें भाजपा के 78, जदयू के 45, HAM (मांझी की पार्टी) के 4 और 1 निर्दलीय विधायक शामिल हैं।
विपक्ष के पास 114 विधायकों की तादाद है, जिसमें राजद के 79, कांग्रेस के 19 विधायक, लेफ्ट के 16 विधायक हैं। ऐसे में अगर AIMIM के 1 विधायक शामिल होते हैं तो विपक्ष के पास 115 विधायक हो जाएंगे। फिर भी बहुमत के लिए 7 और विधायकों की ज़रूरत होगी।
आंकड़ों की गणित में अगर मांझी महागठबंधन के साथ आते हैं तो 119 विधायकों की तादाद होगी। इसके बाद भी 3 विधायकों की कमी रहेगी। ऐसे 1 निर्दलीय विधायक आये तो 120 तादाद होगी। फिर भी बहुमत साबित नहीं हो पाएगा।
कुल मिलाकर एनडीए मज़बूत स्थिति में नज़र आ रही है। ऐसे में देखने होगा कि मांझी पाला बदलते हैं तो अपने साथ क्या आंकड़ों की बाज़ीगरी साथ लाते हैं। सवाल यह भी है कि क्या मांझी ने पाला बदलने के लिए अन्य दलों के विधायकों भी अपने साथ लाने की कोशिश में हैं।












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