Kasba Assembly Seat: 40% मुस्लिम वोट और बिखरे हिंदू वोटर, कसबा विधानसभा का चुनावी गणित किसके पक्ष में?
Kasba Assembly Seat: पूर्णिया जिले की कसबा विधानसभा सीट, जहां खेतों में धान और जूट की हरियाली दिखती है तो वहीं हर साल बाढ़ की त्रासदी भी इसी धरती की पहचान बन चुकी है। रोजगार की तलाश में होने वाला पलायन, टूटी सड़कों और कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं के बीच यह ग्रामीण इलाका अब 2025 के चुनावी मौसम में सियासी हलचल का केंद्र बनने जा रहा है।
कसबा में लगभग 40% मुस्लिम मतदाता और बिखरे हुए हिंदू वोटों का गणित इस बार फिर कसबा के नतीजे तय करेगा। कांग्रेस के तीन बार के विधायक मोहम्मद अफाक आलम के सामने अपनी चौथी जीत की चुनौती है, जबकि भाजपा और लोजपा खोया किला वापस पाने की पूरी कोशिश में जुटे हैं।

चुनावी मुद्दे
बाढ़ और जलभराव- हर साल की बाढ़ फसल और जिंदगी दोनों डुबो देती है।
पलायन और बेरोजगारी- बड़ी संख्या में युवा दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र में मेहनत-मजदूरी को मजबूर।
खेती-किसानी का संकट- धान, मक्का और जूट की खेती को बाजार और एमएसपी का सहारा नहीं।
बुनियादी सुविधाओं की कमी- सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा आज भी बड़ा सवाल।
युवाओं का भविष्य- कॉलेज और रोजगार का ठोस इंतज़ाम सबसे बड़ी मांग।
राजनीतिक समीकरण
मुस्लिम वोट बैंक (40%)- परंपरागत रूप से कांग्रेस का आधार, लेकिन RJD और जन्सुराज भी सक्रिय।
हिंदू वोटर (सवर्ण + ओबीसी + दलित)- भाजपा और लोजपा की नजर, लेकिन बिखराव कांग्रेस को लाभ पहुंचाता है।
EBC और दलित वोट- JDU इन तबकों में पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेगी।
युवा मतदाता- रोजगार का मुद्दा लेकर जन्सुराज और नए दलों को मौका मिल सकता है।
संभावित उम्मीदवार
कांग्रेस (महागठबंधन): मोहम्मद अफाक आलम (मौजूदा विधायक)
RJD (महागठबंधन): स्थानीय समीकरण से मुस्लिम या यादव चेहरा उतारने की संभावना।
JDU (NDA): कोई मजबूत EBC/OBC उम्मीदवार।
भाजपा: प्रदीप कुमार दास (पूर्व विधायक) को फिर उतार सकती है।
लोजपा: युवा उम्मीदवार के साथ मैदान में उतर सकती है।
जन्सुराज: युवाओं को आकर्षित करने के लिए नया चेहरा सामने ला सकती है।
समीकरण क्या कहते हैं?
मुस्लिम वोटों की एकजुटता बनी रही तो अफाक आलम की राह आसान होगी।
हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ तो भाजपा-लोजपा के लिए जीत का मौका।
RJD और जन्सुराज ने मुस्लिम व युवा वोटों में सेंधमारी की तो कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
कसबा विधानसभा की सियासत इस बार सिर्फ विकास बनाम जातीय समीकरण नहीं होगी, बल्कि यहां बाढ़ से त्रस्त किसानों, पलायन से जूझते युवाओं और रोज़गार की तलाश में भटकते परिवारों की आवाज़ भी गूंजेगी। कांग्रेस के लिए यह सीट गढ़ बचाने की चुनौती है तो भाजपा-लोजपा के लिए वापसी का अवसर है।
वहीं RJD और जन्सुराज जैसे दलों के लिए यह मौका होगा कि वे कसबा की जमीनी सियासत में अपने लिए जगह बनाएं। 2025 का नतीजा आखिर तय करेगा कि कसबा परंपरा की राह पर चलता है या सियासी समीकरण इस बार कोई नया मोड़ ले आते हैं।












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