Bihar Politics: दलितों की पहली पसंद कौन? मोदी-तेजस्वी नहीं, सबसे आगे हैं ये नेता! नाम जानकर चौंक जाएंगे आप
Bihar Dalit Politics: नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइजेशन्स (NACDOAR) और द कन्वर्जेंट मीडिया (TCM) द्वारा किए गए हालिया सर्वेक्षण ने बिहार की दलित राजनीति को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। यह सर्वे 10 जून से 4 जुलाई, 2025 के बीच 49 विधानसभा क्षेत्रों में 23 दलित जातियों के बीच किया गया था।
सर्वे की 5 सबसे अहम बातें:
1.बिहार में दलितों के सबसे बड़े नेता आज भी रामविलास पासवान ही हैं। सर्वे में 52.35% दलितों ने दिवंगत रामविलास पासवान को बिहार का सबसे बड़ा दलित नेता माना। दुसाध समुदाय में यह आंकड़ा 65.37% और छोटी दलित जातियों में 68.36% तक पहुंच गया।

यहां तक कि जीवित नेताओं जैसे मोदी, तेजस्वी, चिराग, राहुल गांधी सभी पीछे रह गए। इससे ज़ाहिए है कि रामविलास पासवान की विरासत अभी भी जीवित है, और उनकी जगह भरना किसी के लिए आसान नहीं।
2.मोदी दलितों के बीच सबसे लोकप्रिय नेता, लेकिन...
47.51% दलितों ने नरेंद्र मोदी को समर्थन दिया, जिससे वे राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के बीच शीर्ष नेता बनकर उभरे। वहीं, राहुल गांधी को 40.30% समर्थन के साथ करीबा मुकाबला मिला। मोदी की लोकप्रियता केंद्र की नीतियों से जुड़ी है, लेकिन उनकी स्वीकार्यता दलित नेतृत्व के संदर्भ में नहीं बल्कि 'राष्ट्रीय नेता' के तौर पर है।
3.मुख्यमंत्री पद की पसंद, तेजस्वी यादव नीतीश से आगे
28.83% दलितों ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी पसंद बताया, जबकि नीतीश को 22.80% समर्थन मिला। चिराग पासवान को मात्र 25.88% समर्थन मिला। महादलित योजना से शुरू हुई नीतीश की पकड़ खासकर रविदास-चर्मकार समुदाय में अब ढीली पड़ रही है।
4.महागठबंधन को बढ़त, एनडीए फिसला
महागठबंधन को 46.13% समर्थन मिला, जबकि एनडीए को सिर्फ 31.93%। सीमांचल में एनडीए मजबूत, लेकिन कोसी और भोजपुर में महागठबंधन ने पकड़ बनाई। 2020 के मुकाबले महागठबंधन का वोट शेयर 0.19% बढ़ा, जबकि एनडीए का 4.6% गिरा। बेरोजगारी, शिक्षा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने दलितों का रुख महागठबंधन की ओर मोड़ा है।
5. आरक्षण, वोटर लिस्ट और जातीय जनगणना पर डर और समर्थन
82.89% दलित आरक्षण की सीमा बढ़ाने के पक्ष में हैं। 71.56% को डर है कि उनका नाम वोटर लिस्ट से हट सकता है। 33.15% ने जातीय जनगणना का श्रेय मोदी को, जबकि 48.43% नीतीश सरकार से असंतुष्ट हैं। दलित समुदाय अभी भी अधिकार और पहचान को लेकर चिंतित है। जातीय जनगणना, आरक्षण और नाम हटने का डर, ये संकेत हैं कि 'सिर्फ चुनावी वादे' अब उन्हें संतुष्ट नहीं कर रहे।
दलित समुदाय में नेताओं का समर्थन प्रतिशत
| नेता | समर्थन (%) |
| रामविलास पासवान (दिवंगत) | 52.35% |
| नरेंद्र मोदी | 47.51% |
| राहुल गांधी | 40.30% |
| तेजस्वी यादव | 28.83% |
| चिराग पासवान | 25.88% |
| नीतीश कुमार | 22.80% |
| बाबू जगजीवन राम (रविदास समुदाय में) | 47.87% |
बिहार की दलित राजनीति का नया चेहरा या पुरानी छाया?
बिहार की राजनीति में दलित वोट बैंक हमेशा निर्णायक रहा है, लेकिन इस सर्वे से स्पष्ट है कि 'नेतृत्व की विरासत' अभी भी जीवित है। रामविलास पासवान की छवि आज भी बाकी नेताओं से बड़ी है। भाजपा को मोदी का समर्थन तो है, लेकिन दलित नेतृत्व के लिए चिराग पासवान को व्यापक समर्थन नहीं मिल पा रहा।
दूसरी ओर, महागठबंधन (खासतौर पर RJD) के लिए तेजस्वी की छवि उभर रही है, लेकिन यह स्थायी लाभ तभी होगा जब वे नीति और ज़मीनी कार्य पर ध्यान दें। राजनीतिक दलों के लिए यह एक सबक है कि दलित समाज सिर्फ वोट नहीं, अब प्रतिनिधित्व और हक़दारी चाहता है। दलित मतदाता अब भावनात्मक न होकर तथ्य आधारित मुद्दों पर निर्णय ले रहे हैं। रामविलास जैसे नेताओं की जगह भरना आसान नहीं, सिर्फ जाति समीकरण से अब जीत संभव नहीं।
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