Bihar ‘मांझी’ Politics : सोनिया गांधी के मंच पर बैठने वाले भागीरथ अब बने जदयू के ‘मांझी’
पहाड़ का सीना चीरने वाले दशरथ मांझी बिहार के गौरव हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दशरथ मांझी का मान-सम्मान तो बढ़ाया लेकिन उनके परिजनों का कभी राजनीतिक इस्तेमाल नहीं किया था। लेकिन जून 2023 में परिस्थियां अचानक बदल गयीं। जदयू को मांझी (मुसहर) वोटों के छिटकने की आशंका सताने लगीं। तब उसने दशरथ मांझी के बेटे भागीरथ मांझी और दामाद मिथुन मांझी को अपनी राजनीति का पतवार बना लिया। इसके पहले चुनाव के समय कई राजनीति दल दशरथ मांझी के दरवाजे पर जा कर उनसे मदद मांगते थे। वे भी बिना भेदभाव के मदद करते थे। लेकिन उनके पुत्र भागीरथ मांझी कभी किसी दल के सदस्य नहीं बने थे। या यूं कहा जाय कि किसी दल ने उन्हें पार्टी मेम्बर बनाने की जरूत नहीं समझी थी। लेकिन जदयू की राजनीति मजबूरी ने भागीरथ मांझी और मिथुन मांझी के लिए सियासत का रास्ता खोल दिया। अब चर्चा है कि भागीरथ मांझी जदयू के टिकट पर गया से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे।
जदयू क्यों मेहरबान हुआ भागीरथ मांझी पर ?
राजनीति में अवसरवादिता को रणनीति के लबादे में छिपा लिया जाता है। गया जिले के गेहलोर में गरीबी का जीवन जी रहे भागीरथ मांझी पर अचानक जदयू कैसे मेहरबान हो गया ? इसके पहले उसने दशरथ मांझी के परिजनों खैरियत क्यों नहीं पूछी ? जब अचानक बिहार की राजनीति में मांझी वोट को लेकर ट्विस्ट आ गया तो जदयू ने उनके स्वागत में राजनीति का गलीचा बिछा दिया। आज भागीरथ मांझी भले नीतीश कुमार की प्रशंसा करें लेकिन कुछ साल पहले उन्होंने एक इंटरव्यू में उनकी अनदेखी पर बेबाक राय रखी थी।

“सरकारी नौकरी मांगी तो दुकान में रखवा दिया”
इस इंटरव्यू में भागीरथ मांझी कहते हैं, पटना में दशरथ मांझी स्मृति भवन (उनके कहने का मतलब था, दशरथ मांझी श्रम नियोजन एवं अध्ययन संस्थान जिसका उद्घाटन 2018 में हुआ था।) शुरू हुआ था। मुझे भी बुलाया गया था। मैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिला। बातचीत के दौरान मैंने उनसे कहा, मेरा लड़का पढ़ा लिखा है, इसको कहीं कम पर रखवा दीजिए। लेकिन उसको सरकारी नौकरी देने की बजाय बोधगया में एक प्राइवेट काम पर रखवा दिया गया। गेहलोर से बोधगया आने जाने में पैसा लगता था। लड़का एक दुकान में काम करता था। आमदनी इतनी नहीं थी कि गुजारा हो सके। उसने काम छोड़ दिया। फिर वह दशरथ मांझी को भारत रत्न दिलाने की मुहिम में शामिल हो गया। भागीरथ मांझी ने आगे कहा, नीतीश कुमार ने मेरे पिता (दशरथ मांझी) को हाईलाइट तो बहुत किया लेकिन ये नहीं सोचा कि उनके परिवार का भरण पोषण कैसे होगा।
सोनिया गांधी की सभा में आमंत्रित थे भागीरथ
2015 के विधानसभा चुनाव में दशरथ मांझी के नाम को भुनाने की भरपूर कोशिश हुई थी। इसके लिए राजनीतिक दलों के लोग उनके परिवार को अपनी सभा में बुलाने के लिए लाइन लगाये रहते थे। अक्टूबर 2015 में गया जिले के वजीरगंज जिले में सोनिया गांधी की चुनावी रैली हुई थी। वजीरगंज से कांग्रेस के उम्मीदवार अवधेश कुमार सिंह चुनाव लड़ रहे थे। इस सभा में दशरथ मांझी के पुत्र भागीरथ मांझी को आमंत्रित किया गया था। वजीगंज में दलित समुदाय के वोटर निर्मणायक हैं। इसलिए इस समुदाय को लुभाने के लिए सोनिया के मंच पर दशरथ मांझी को बैठाया गया था।
लालू यादव और पप्पू यादव ने भी रिझाया
दशरथ मांढी का गांव गहलोर गया जिले के अतरी विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है। 2015 में अतरी से राजद की उम्मीदवार कुंती देवी चुनाव लड़ रही थीं। उनके चुनाव प्रचार के लिए लालू यादव की एक सभा आयोजित की गयी थी। तब राजद के कुछ नेताओं ने दशरथ मांझी के परिवार के कुछ सदस्यों को फुसला कर वहां ले जाने की कोसिश की थी। पूर्व सांसद और जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष पप्पू यादव ने 2015 के चुनाव में दशरथ मांझी के परिजनों से कहा था कि वे उनके उम्मीदवार कृष्णनंदन यादव का समर्थन करें। पप्पू यादव ने चुनाव से पहले दशरथ मांझी के परिवार को एक लाख रुपये की सहायता दी थी। पैतृक घर के बाहर उनकी प्रतिमा भी बनवायी थी। इस वजह से उनकी मांझी परिवार से जानपहचान हो गयी थी।
“सिर्फ चुनाव के समय ही दशरथ मांझी से प्यार”
2015 के विधानसभा के चुनाव के समय खुद भागीरथ मांझी ने कहा था, जब चुनाव आता है तब नेताओं का दशरथ मांझी के प्रति प्यार उमड़ जाता है। लेकिन चुनाव के बाद ये प्यार दिखायी नहीं पड़ता। दशरथ मांझी की प्रतिमा, स्मारक तो बनवा दिया लेकिन क्या इससे हमारा पेट भर जाएगा। हमें स्थायी रोजगार (सरकारी नौकरी) चाहिए, खेतों को पानी चाहिए ताकि सुबह-सांझ रोटी मिल सके। उस समय दशरथ मांझी के बेटी लौंगी देवी ने भी अपनी बात रखी थी- जब चुनाव आता है तब नेता लोग उनके परिवार को तंग कर के रख देते हैं। यहां चलो। वहां चलो। वे वोट के लिए पिता जी के नाम का इस्तेमाल करने में कोई कमी नहीं रखते। वे बड़ी बड़ी गाड़ियों में धूल उड़ाते हुए आते हैं। बहुत कुछ देने की बात कहते हैं। लेकिन मिलता कुछ नहीं है।












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