बिहार चुनाव में क्यों फेल हो जाते हैं ज्यादातर एग्जिट पोल
पटना- बिहार चुनाव में ज्यादातर एग्जिट पोल के नतीजे एक बार फिर नाकाम रहे हैं। ऐसा लगता है कि चुनाव विश्लेषक अभी तक राजनीतिक रूप से बेहद सजग बिहार के मतदाताओं के मूड को पकड़ पाने का रहस्य नहीं सुलझा पाए हैं। यही वजह है कि अबकी बार ही ज्यादातर एग्जिट पोल के नतीजे नाकाम नहीं हुए हैं, 2015 के बिहार चुनाव में भी पोल पंडित बिहार के वोटरों के फैसले को समझ पाने में गच्चा खा गए थे। दोनों चुनाव के हालात, मुद्दे, सियासी समीकरण पूरी तरह से अलग थे और दोनों ही बार पोल पंडितों की चतुराई को बिहार के अलर्ट वोटर चकमा देने में कामयाब रहे। लगता है कि चुनाव के जानकारों को अब बिहार के लिए रिसर्च के कुछ और ठोस तरीकों पर काम करना पड़ेगा।
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भारतीय चुनाव के इतिहास में एग्जिट पोल का नाकाम होना कोई पहली घटना नहीं है। लेकिन, बिहार में ऐसा लगातार दो चुनावों में हुआ है। एग्जिट पोल के क्षेत्र में देश के कुछ चुनावों से इंडिया टुडे एक्सिस माय इंडिया ने अपना एक खास विश्वास कायम किया था। उसके नतीजे इतने सटीक होने लगे थे कि चुनाव मैदान में अपनी जीत को अपने काम की बदौलत निश्चित मानने वाले उम्मीदवार का हौसला भी डगमगा जाता था। टूडेज चाणक्या ने भी कई बार ऐसे ही परिणाम दिए हैं। यही वजह है कि जब इस बार इन दोनों 'भरोसेमंद' ने एग्जिट पोल में बिहार में एनडीए की मिट्टी पलीद की गई तो जेडीयू और भाजपा के दफ्तर विरान पड़ गए। जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने तो लगभग हार भी कबूल ली थी। दूसरी तरफ, हर बार उम्मीद से उलट भविष्यवाणी पर सवाल उठाने वाले राजद नेताओं के मन में लड्डू फूटने शुरू हो गए थे। लेकिन, जब मंगलवार को मतगणना ने गति पकड़नी शुरू की तो उनकी उम्मीदों पर उसी तरह पानी फिर गए, जैसा कि पांच साल पहले भाजपा के साथ हुआ था।
2015 के विधानसभा चुनाव में एनडीए 2014 की मोदी लहर पर सवार होकर मैदान में उतरा था। जबकि, महागठबंधन में लोकसभा चुनाव में राजग से मात खा चुके दलों का जमावड़ा था। मोदी फैक्टर उफान पर था। लगभग सारे एग्जिट पोल ने भी एनडीए की बड़ी जीत की भविष्यवाणी की थी। पोस्टर बैलट की गिनती ने उनके अनुमानों को और गति दे दी। लेकिन, जैसे ही ईवीएम खुलने लगे, एग्जिट पोल वाले सेफोलॉजिस्टस्ट भी गलत विश्लेषण के कारण ढूंढ़ने लगे। इस बार ठीक उलट हुआ। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में एनडीए को बढ़त दिखाई जा रही थी। लेकिन, चुनाव से कुछ दिन पहले अचानक तेजस्वी यादव के पक्ष में हवा बनती दिखाई दी। जब चुनाव के बाद एग्जिट पोल की बारी आई तो उनमें से ज्यादातर उसी हवा में बह गए। लेकिन, जब अंतिम नतीजे आए तो अधिकतर का अंदाजा गलत साबित हो गया। बिहार में ऐसा क्यों होता है, यह समझने से पहले हम इस साल के कुछ एग्जिट पोल की भविष्यवाणियों पर नजर डालते हैं।
इस बार के बिहार चुनाव के जो नतीजे हैं उसके मुताबिक एनडीए-125, महागठबंधन-110, लोजपा-01 और अन्य को 7 सीटें मिली हैं।
जबकि, कुछ चुनावों से सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले इंडिया टुडे एक्सिस माय इंडिया ने एडीए को 69-91, महागठबंधन को 139-161, लोजपा को 3 से 5 और अन्य को भी 3 से 5 का अनुमान जताया था। इसी तरह टुडेज चाणक्य ने एनडीए-55, महागठबंधन-180, लोजपा-00 और अन्य-08 सीटों की भविष्यवाणी की थी। इनके अलावा भी ज्यादातर एग्जिट पोल ने महागठबंधन की जीत या उसे जीत के बेहद करीब बताया था, जबकि एनडीए की हवा खराब बताने की कोशिश की थी।
अलबत्ता कुछ एग्जिट पोल परिणाम के ज्यादा करीब अवश्य रहे हैं। मसलन, न्यूज एक्स ने एनडीए को 124, महागठबधन को 107, लोजपा को 2 और अन्य को 10 सीटें दी थीं। एक और एग्जिट पोल एबीपी-सी वोटर ने भी एनडीए को 104 से 128, महागठबंधन को 108 से 131, एलजेपी को 1 से 3 और अन्य को 4 से 8 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था।
बिहार में सेफोलॉजिस्ट भले ही नाकाम रह जाते हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर बेहद जागरूक बिहार की जनता ज्यादा सटीक भविष्यवाणी कर सकती है। पटना के पास दीघा विधानसभा क्षेत्र के 72 साल के एक मतदाता मनोज झा वहां के चुनावी समीकरण को बखूबी बताते हैं। उन्होंने आजतक कभी भी किसी चुनाव में वोट डालना मिस नहीं किया है। वो कहते हैं, 'बिहार में चुनाव का हिसाब लगाना बहुत ही आसान है, जो कि सर्वे करने वाले समझ ही नहीं पाते। यहां तीन पार्टियां ही प्रमुख हैं- बीजेपी, आरजेडी और जेडीयू। जब सरकार बनाने की बात आती है तो इन तीन में से दो आपस में हाथ मिलाकर और कुछ छोटी पार्टियों के सहयोग से कभी भी ऐसा कर सकती हैं।' इनके अनुभव को पटना के दानापुर में रहने वाली 42 साल की कल्पना वर्मा नाम की एक घरेलू महिला और ज्यादा स्पष्ट करती हैं। उनका कहना है, 'बिहार के वोटर स्मार्ट हैं। चाहे विधानसभा का चुनाव हो या लोकसभा का, यहां की जनता स्पष्ट फैसला करती है।'












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