बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट अब क्यों नहीं देगा विपक्ष को राहत? चुनाव तारीखों के ऐलान के बाद बदले हालात
Bihar Election 2025 (Bihar SIR): बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीखों के ऐलान के साथ ही सियासी गलियारों में एक बड़ा सवाल उठ रहा है-क्या अब सुप्रीम कोर्ट से बिहार SIR (Special Intensive Revision) मामले में कोई राहत मिल पाएगी?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अब इसके आसार बेहद कम हैं, क्योंकि जैसे ही चुनाव आयोग ने 6 और 11 नवंबर को मतदान और 14 नवंबर को मतगणना की तारीखें घोषित कीं, संविधान का अनुच्छेद 329 सक्रिय हो गया है, जो चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक दखल को सीमित करता है। आइए जानतें हैं क्या है अनुच्छेद 329।

🔹 क्या है अनुच्छेद 329 और यह क्यों रोकता है अदालत को दखल देने से?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 329 यह स्पष्ट रूप से कहता है कि एक बार जब चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाती है, तो अदालतें चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।
इस अनुच्छेद की दो अहम धाराएं हैं-
(a) किसी भी कानून की वैधता जो सीटों के बंटवारे या सीमांकन से जुड़ी हो, अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
(b) किसी चुनाव को केवल चुनाव याचिका के ज़रिए ही चुनौती दी जा सकती है, वो भी परिणाम घोषित होने के बाद।
यानी अब बिहार में मतदान की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, तो सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट इस दौरान किसी भी प्रकार की रोक या राहत नहीं दे सकते। चुनाव पूरा होने के बाद ही इसे कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है।
🔹 सुप्रीम कोर्ट का पुराना रुख भी यही कहता है
1952 में आए ऐतिहासिक फैसले N.P. Ponnuswami बनाम Returning Officer में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि "election" शब्द का मतलब सिर्फ मतदान नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया है -अधिसूचना जारी होने से लेकर परिणाम आने तक। इसलिए कोर्ट ने यह परंपरा बनाई कि जब तक चुनाव खत्म न हो जाएं, न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं करेगी।
इसी सिद्धांत को कई बार दोहराया गया है। हाल ही में 2023 में लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा था कि अदालतें तभी दखल देंगी जब कोई प्रशासनिक कदम निष्पक्षता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा हो। वरना, कोर्ट का "हैंड्स-ऑफ" रुख बनाए रखना ही लोकतंत्र के लिए जरूरी है ताकि चुनाव बिना देरी के पूरे हो सकें।
🔹 बिहार SIR पर क्या है विवाद?
बिहार में 24 जून 2024 को चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया शुरू की थी। इस प्रक्रिया के तहत राज्य के करीब 7.89 करोड़ मतदाताओं से कहा गया कि वे 25 जुलाई तक अपना फॉर्म भरें और अपने जन्म व नागरिकता से जुड़ी जानकारी दोबारा जमा करें। इससे पहले इतनी गहन मतदाता सूची समीक्षा साल 2003 में हुई थी।
SIR के दौरान लगभग 68.5 लाख नाम डिलीट किए गए, जबकि 21.53 लाख नए मतदाता जोड़े गए। अब बिहार की मतदाता सूची में कुल 7.42 करोड़ वोटर हैं, और इसी लिस्ट पर नवंबर में वोटिंग होगी।
कई विपक्षी दलों और संगठनों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उनका आरोप है कि SIR के नाम पर लाखों वैध मतदाताओं के नाम सूची से गायब कर दिए गए। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
🔹 सुप्रीम कोर्ट की पिछली सुनवाई में क्या हुआ था?
पिछली सुनवाई में जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने साफ कहा था कि मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन से अदालत की जांच की संभावना खत्म नहीं होती। अगर कोई गंभीर अवैधता पाई गई, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन यह "अगर" बहुत बड़ा है-क्योंकि चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाने के बाद कोर्ट आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक कि कोई असाधारण परिस्थिति न हो।
🔹 विपक्ष की उम्मीदें अब क्यों धुंधली पड़ीं?
अब जबकि चुनाव आयोग ने औपचारिक रूप से चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी है, विपक्षी दलों के पास विकल्प सीमित हो गए हैं। वो अब केवल चुनाव खत्म होने के बाद ही इसे "election petition" के रूप में हाईकोर्ट में चुनौती दे सकते हैं -और वो भी 45 दिनों के भीतर।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह स्थिति विपक्ष के लिए झटका है क्योंकि SIR के जरिए जो मतदाता सूची तैयार हुई है, उसी पर वोटिंग होगी। अगर वाकई बड़ी संख्या में नाम काटे गए हैं, तो अब उसका असर चुनावी नतीजों पर पड़ेगा, न कि प्रक्रिया पर।
🔹 राहत की उम्मीद 'फिलहाल' टली
साफ है कि चुनाव तारीखों के ऐलान ने बिहार SIR विवाद का रुख पूरी तरह बदल दिया है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में कोई बड़ा आदेश जारी नहीं कर सकता, क्योंकि संविधान के तहत उसका ऐसा करना "बार टू इंटरफेरेंस" (रोक) के दायरे में आता है। हां, अगर बाद में साबित हुआ कि SIR प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई थी, तो मामला चुनाव के बाद जरूर खुल सकता है -लेकिन अभी नहीं।












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