Bihar Chunav: राजपूत समुदाय इस बार भाजपा को देंगे टेंशन, आखिर किन वजहों से हुई है यह नाराजगी?
Bihar Chunav Rajput Vote: बिहार विधानसभा चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, जातिगत समीकरणों को साधने की मुहिम भी शुरू हो गई है। इस बार ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि बीजेपी को राजपूत समुदाय की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें आ रही हैं कि इस समुदाय के बड़े नेताओं की अनदेखी की वजह से राजपूतों की नाराजगी बीजेपी के लिए बढ़ती जा रही है। राजपूत समुदाय पिछले दो दशक से कमोबेश बीजेपी और एनडीए के ही साथ रहा है।
ऐसे में अगर इ, बार राजपूतों की नाराजगी बीजेपी से रहती है, तो इसका नुकसान सिर्फ भाजपा को नहीं बल्कि पूरे एनडीए को उठाना पड़ सकता है। हालांकि, पिछले चुनाव में राजपूतों को बीजेपी ने प्राथमिकता दी थी और 19 उम्मीदवार उतारे थे। लोकसभा चुनाव में आरके सिंह की हार और राजीव प्रताप रूडी को मंत्री नहीं बनाने जैसे मुद्दों पर बीजेपी की नाराजगी का दावा किया जा रहा है।

Bihar Chunav में राजपूतों की मांग प्रतिनिधित्व बढ़ाने की
बीजेपी के बारे में कहा जाता है कि यह ब्राह्मण-बनिया की पार्टी है। हालांकि, बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में देखें तो यहां राजपूतों को भी खूब लाभ दिया गया है। बिहार की राजनीति के जानकार और पॉलिटिकल विश्लेषक वीरेंद्र यादव का कहना है, 'भाजपा में राजपूत विधायकों की संख्या 19 है। यह विधानसभा की कुल संख्या का लगभग 24 प्रतिशत है। फिर भी कहा जा रहा है कि भाजपा से राजपूत नाराज हैं। क्यों? इसका उत्तर पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह के पास है। लोकसभा चुनाव में हार के बाद एनडीए के विरुद्ध अखाड़े में उतरने के लिए व्याकुल दिख रहे हैं। वही बेहतर बता सकते हैं कि राजपूतों को कितनी हिस्सेदारी चाहिए थी और भाजपा ने कितना कम दिया।'
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राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र यादव कहते हैं, भाजपा बनिया-ब्राह्मण की पार्टी है, लेकिन बिहार में असली मलाई राजपूत खा रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राजपूत से 21 प्रत्याशी उतारे थे। इनमें 16 जीत गए। लगभग 73 प्रतिशत। बाद में दो विधायक वीआइपी से तोड़ लिए और एक उपचुनाव में जीत गए। कुल 19 हो गए।' बिहार में राजपूतों की आबादी लगभग 4 फीसदी है और इसके बावजूद उनका प्रतिनिधित्व इसकी तुलना में काफी ज्यादा है।
उत्तर बिहार से अकेले 11 Rajput विधायक
विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर बिहार से 13 राजपूतों को टिकट दिया था। इनमें से दो हार गए और 11 जीते थे। हारने वालों में स्वीटी सिंह (किशनगंज) और विनय सिंह (सोनपुर) थे। जीतने वालों में विनय बिहारी (लौरिया), राणा रणधीर (मधुबन), नीरज सिंह बबलू (छातापुर), अरुण सिंह (बरुराज), अशोक सिंह (पारु), रामप्रवेश सिंह (बरौली), सुभाष सिंह (गोपालगंज), कर्णजीत सिंह (दरौंदा), जनक सिंह (तरैया), संजय सिंह (लालगंज) और राजेश सिंह (मोहिउद्दीननगर) हैं।
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दक्षिण बिहार में भाजपा ने आठ राजपूत प्रत्याशी उतारे थे। इनमें मे तीन हारे और पांच जीते थे। हारने वालों में सत्येंद्र सिंह (फतुहा), अशोक सिंह (रामगढ़) और रामाधार सिंह (औरंगाबाद ) हैं। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद हुए उपचुनाव में अशोक सिंह जीत गए। दक्षिण बिहार से भाजपा के निर्वाचित विधायकों में ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू (बाढ़), राघवेंद्र सिंह (बड़हरा), अमरेंद्र सिंह (आरा), वीरेंद्र सिंह (वजीरगंज) और श्रेयसी सिंह (जमुई) हैं।
यादव और भूमिहारों की तुलना में राजपूतों का बड़ा प्रतिनिधित्व
भाजपा ने राजपूतों को सत्ता की मलाई भी दी है। बिहार में सर्वाधिक मंत्री इसी जाति से हैं। आयोग और बोर्डों में भी भरमार है। विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह इसी जाति से आते हैं। सत्ता की हिस्सेदारी में यादव और भूमिहार काफी पीछे हैं। दूसरा पक्ष यह भी है कि भाजपा में यादव और भूमिहार विधायकों की संख्या दोनों मिलाकर सिर्फ 15 है, जबकि अकेले राजपूतों की संख्या 16 है। अब देखना है कि यह नाराजगी वोटों में भी बदलती है या फिर टिकट वितरण में समायोजन कर इस जाति को बीजेपी अपने साथ जोड़कर चलने में सफल रहेगी।
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