Bihar Chunav: नीतीश vs तेजस्वी–किस पर जनता की मुहर? बिहार चुनाव में सर्वे ने बदली हवा! चौंकाने वाले आंकड़े
Bihar Chunav 2025 Survey: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सियासी तापमान तेजी से चढ़ रहा है। C-Voter के ताजा मासिक सर्वे ने राज्य की राजनीति को एक नई दिशा दे दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जहां अब भी लोगों के भरोसे पर टिके हुए हैं, वहीं तेजस्वी यादव की लोकप्रियता में गिरावट और प्रशांत किशोर की तेजी से बढ़ती पहचान ने सियासी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
🔵 तेजस्वी यादव की गिरती साख: यादव वोट बैंक में दरार?
C-Voter के मुताबिक फरवरी 2025 में तेजस्वी यादव की लोकप्रियता 41% थी, जो जुलाई तक घटकर 35% रह गई है। 6% की यह गिरावट मामूली नहीं है। इसका एक बड़ा कारण उनके कोर वोट बैंक यादव समुदायमें उपजी नाराजगी है।

मोतिहारी में अजय यादव की सांप्रदायिक हिंसा में मौत के बाद तेजस्वी और आरजेडी की चुप्पी ने समुदाय को आहत किया। यादव समाज के कई लोग महसूस कर रहे हैं कि तेजस्वी सामाजिक सुरक्षा और एकता जैसे मसलों पर अपेक्षित मजबूती से नहीं बोले। RJD समर्थकों में यह भाव बनता जा रहा है कि "जब समाज ही असुरक्षित होगा, तब पार्टी कैसे बचेगी?"
🔵 नीतीश कुमार की लोकप्रियता बनी हुई है
नीतीश कुमार की सेहत और उम्र को लेकर भले ही चर्चाएं हैं, लेकिन उनके सुशासन मॉडल और विकास योजनाओं पर जनता का भरोसा अब भी कायम है। जून में 59% और जुलाई में 58% लोगों ने उनके काम से संतुष्टि जताई।
हालांकि, गठबंधन बदलने की आदत (2022 में महागठबंधन, 2024 में फिर NDA) उनकी छवि को नुकसान पहुंचा रही है। फिर भी महिला वोटर्स के लिए 35% आरक्षण और डोमिसाइल नीति जैसे फैसले उन्हें नई ऊर्जा दे रहे हैं।
🔵 प्रशांत किशोर: 'तीसरे विकल्प' के रूप में उभरते रणनीतिकार
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर अब सिर्फ एक रणनीतिकार नहीं, बल्कि राजनीतिक विकल्प के रूप में उभर चुके हैं। फरवरी 2025 में 14.9% की लोकप्रियता अब 18.4% तक पहुंच चुकी है।
उनकी जाति-निरपेक्ष सोच और युवा-शहरी वोटरों के बीच बढ़ता क्रेज उन्हें मौजूदा समीकरणों को तोड़ने की स्थिति में ला रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार की राजनीति में जातीय गणित को पूरी तरह तोड़ना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
🔵 महागठबंधन की रणनीतिक विफलताएं
महागठबंधन, खासकर कांग्रेस और पप्पू यादव जैसे नेताओं के साथ तेजस्वी यादव का सीट बंटवारे और संवाद में असंतुलन उनकी छवि को नुकसान पहुंचा रहा है। गठबंधन की अस्पष्ट रणनीति और आपसी मतभेद ने विपक्ष को कमजोर कर दिया है।
🔵जंगलराज बनाम सुशासन की बहस फिर लौट आई
चुनावी मौसम आते ही 'जंगलराज बनाम सुशासन' की पुरानी बहस फिर उभर आई है। NDA इसे हथियार बनाकर तेजस्वी को घेर रहा है। बेरोजगारी और अपराध जैसे मुद्दे उठाने के बावजूद तेजस्वी जनता का भरोसा पूरी तरह नहीं जीत पा रहे।
🔵 कौन किसकी चुनौती?
- तेजस्वी यादव को अपने वोट बैंक को बचाए रखने और महागठबंधन को एकजुट करने की चुनौती है।
- नीतीश कुमार को अपनी छवि को बनाए रखते हुए विश्वसनीय उत्तराधिकारी तैयार करने की जरूरत है।
- प्रशांत किशोर को जमीनी स्तर पर संगठन विस्तार और सामाजिक समीकरणों में पैठ बनानी होगी।
बिहार का चुनाव अब केवल NDA बनाम महागठबंधन की लड़ाई नहीं रहा। अब यह तीन ध्रुवों की जंग बन चुका है जिसमें प्रशांत किशोर की मौजूदगी ने नया मोड़ ला दिया है। जनता बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं के आधार पर फैसला करेगी। आने वाले महीनों में जनता का मूड, नेताओं की रणनीति और गठबंधनों की मजबूती तय करेगी कि बिहार की गद्दी पर अगला कौन बैठेगा?












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