Bihar Chunav 2025: कांग्रेस ने खोई जमीन वापस पाने के लिए शुरू की तैयारी, राहुल-प्रियंका करेंगे बड़े कार्यक्रम
Bihar Chunav 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। राजनीतिक दलों ने अपने-अपने स्तर पर मतदाताओं तक पहुँचने की कवायद तेज कर दी है। महागठबंधन के भीतर कांग्रेस पार्टी भी अब सक्रिय दिख रही है। वोटर अधिकार यात्रा के बाद कांग्रेस ने यह भांप लिया है कि जनता से सीधा संवाद और समय रहते उम्मीदवारों की घोषणा ही संगठन को मजबूती और जनता का विश्वास दिला सकती है।
नई दिल्ली में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की अगुवाई में हुई बैठक में यह साफ झलक रहा था कि कांग्रेस इस बार पिछली बार की गलतियों से सबक लेना चाहती है। पिछली चुनावी लड़ाई में उम्मीदवारों की घोषणा में देरी और स्थानीय स्तर पर संगठन की सुस्ती ने कांग्रेस को नुकसान पहुँचाया था। इस बार पार्टी ने संकेत दिए हैं कि उम्मीदवारों की सूची समय रहते सामने लाकर उन्हें प्रचार का पर्याप्त अवसर दिया जाएगा।

बैठक में प्रदेश कांग्रेस की स्थिति, महागठबंधन की सीट शेयरिंग और आगामी कार्यक्रमों पर गहन चर्चा हुई। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस पिछली बार की तरह लगभग 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छुक है। हालांकि, कुछ सीटों को बदलने की भी मंशा रखती है ताकि स्थानीय समीकरणों के हिसाब से बेहतर परिणाम हासिल हो सके। यह कदम व्यवहारिक भी है और रणनीतिक भी। महागठबंधन के भीतर तालमेल और सहयोगी दलों के साथ सौहार्दपूर्ण समझौता बनाए रखना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी।
विशेष ध्यान देने योग्य है कि बैठक में केवल पारंपरिक नेता ही नहीं, बल्कि निर्दलीय सांसद पप्पू यादव, उनकी पत्नी रंजीत रंजन और कन्हैया कुमार जैसे नेताओं की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि कांग्रेस पार्टी नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश कर रही है। पप्पू यादव जैसे जनाधार वाले नेताओं की सक्रिय भागीदारी से कांग्रेस को कुछ क्षेत्रों में लाभ हो सकता है।
अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस बार बिहार की राजनीति में अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर पाएगी? कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक ऊर्जा और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने की होगी। यदि पार्टी केवल शीर्ष नेतृत्व की रैलियों पर निर्भर रही तो यह रणनीति अधूरी साबित हो सकती है। कांग्रेस को प्रमंडल और जिला स्तर पर अपने अभियान को इस तरह गढ़ना होगा कि वह निचले तबके, युवा और अल्पसंख्यक मतदाताओं तक गहरे असर के साथ पहुँच सके।
महागठबंधन में राजद, जदयू, कांग्रेस, रालोजपा और झामुमो जैसे दलों का गठजोड़ यदि सही तालमेल में काम करे तो भाजपा-जेडीयू के मजबूत गढ़ को भी चुनौती मिल सकती है। परंतु यह तभी संभव होगा जब सीट बंटवारे को लेकर सार्वजनिक रूप से कोई खींचतान न हो और मतदाताओं को यह संदेश जाए कि महागठबंधन एकजुट है।
कुल मिलाकर, कांग्रेस के पास यह अवसर है कि वह बिहार में अपनी साख को पुनर्जीवित करे। समय पर उम्मीदवारों की घोषणा, स्थानीय मुद्दों पर फोकस और गठबंधन के भीतर सामंजस्य ही उसके लिए सफलता की कुंजी होगी। यदि यह सब कांग्रेस कर पाती है, तो महागठबंधन की नैया में उसका योगदान केवल "संख्या" भर का नहीं बल्कि निर्णायक साबित हो सकता है।
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