बिहार विधानसभा चुनाव: परिवारवाद-रिश्तेदारवाद जीवंत मुद्दा होकर भी मुर्दा क्यों है?

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चुनाव के दौरान टिकटों के बंटवारे में परिवारवाद-रिश्तेदारवाद राजनीति की सच्चाई है। यह सच्चाई दो रूपों में दिखती है। एक रूप की चर्चा होती है, दूसरे की नहीं होती। जिस रूप की चर्चा होती है वह है एक पार्टी में एक ही परिवार के लोग या नजदीकी रिश्तेदारों का वर्चस्व। मगर, जब अलग-अलग पार्टियों में यही परिजन बंट जाते हैं या रिश्तेदार अलग-अलग दलों से एक-दूसरे को चुनौती देने लगते हैं और एक तरह से जीत किसी की हो परिवारवाद को मजबूत करते हैं तो परिवारवाद के इस रूप की चर्चा नहीं होती। सच यह है कि दोनों किस्म का परिवारवाद राजनीति में बहुत चतुराई से पैठ जमा चुका है।

लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में जेल जाने से पहले राबड़ी देवी को सत्ता की चाभी सौंप जाते हैं तो इसकी चर्चा परिवारवाद के तौर पर होती है। एक अर्से के बाद जब तेजस्वी यादव को लालू अपनी विरासत सौंपते हैं और तेज प्रताप भी साथ होते हैं तो वंशवाद के तौर पर इसकी चर्चा होती है। जब लालू प्रसाद अपने समधी चंद्रिका राय को आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़वाते हैं, उन्हें विधायक बनाते हैं तब भी इसे परिवारवाद के विस्तार के तौर पर चिन्हित किया जाता है। चर्चा इस बात की नहीं होती कि लालू विरोधी जब इन्हीं चंद्रिका राय को अपनी पार्टी में बुलाकर टिकट देते हैं और उस परिवारवाद का पोषण करते हैं जिसका वे अब तक विरोध कर रहे होते हैं।

जीतनराम मांझी की हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा यानी 'हम’ का मतलब अचानक बदल जाता है जब वे स्वयं, उनके दामाद और उनकी समधिन पार्टी को गठबंधन में मिली 7 सीटों में से 3 पर कब्जा कर बैठते हैं। कार्यकर्ता विरोध में हंगामा मचाते हैं लेकिन इन पर फर्क नहीं पड़ता। गठबंधन पर भी फर्क नहीं पड़ता जो अब तक परिवारवाद-रिश्तेदारवाद के विरोध का डंका बजाते रहे थे।
क्या दो समधी और जेठ-भावज की उम्मीदवारी परिवारवाद नहीं?
दो दिलचस्प उदाहरणों पर गौर कीजिए। बिहार की सीवान सीट पर बीजेपी के उम्मीदवार हैं पूर्व सांसद ओम प्रकाश यादव। यहीं आरजेडी के उम्मीदवार हैं पूर्व मंत्री अवध बिहारी चौधरी। जीत किन्हीं की हो मगर जीतेंगे समधी ही। लगभग ऐसा ही दूसरा उदाहरण संदेश विधानसभा सीट पर है। यहां जीत जेठ-भावज में किसी की हो सकती है। एक गठबंधन की ओर से जेडीयू उम्मीदवार विजेंद्र यादव हैं तो दूसरे गठबंधन की ओर से उनके ही भाई आरजेडी विधायक अरुण यादव की पत्नी किरण देवी चुनाव मैदान में हैं। क्या यह परिवारवाद का उदहरण नहीं है?

क्या अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ने से परिवारवाद खत्म हो जाता है या रिश्तेदारवाद खत्म हो जाता है? क्या दो अलग-अलग गठबंधनों या दलों को एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारने के लिए केवल एक ही परिवार के लोग मिलते हैं? अगर हां, तो इसका मतलब ये है कि यहां ये उम्मीदवार मजबूर नहीं है पार्टियां ही मजबूर हैं जो ऐसे रिश्तेदारवाद को बढ़ावा दे रही हैं। जेडीयू के ससुर-दामाद की जोड़ी का उदाहरण ले लीजिए। ससुर नरेंद्र नारायण यादव आलमनगर की सीट से उम्मीदवार हैं तो दामाद निखिल मंडल मधेपुरा शहर की सीट से। ससुर-दामाद को राजनीतिक रूप से स्थापित करने के लिए जेडीयू की इस पहल को क्यों नहीं परिवारवाद-रिश्तेदारवाद का उदाहरण माना जाना चाहिए?
लवली आनंद और चेतन आनंद के उदाहरण से यह सवाल भी उठता है कि आखिर एक राजनीतिक दल की वो कौन सी मजबूरी होती है कि वह जेल में बंद पूर्व नेता की पत्नी को भी टिकट दे देती है, फिर बेटे को भी? जातिवाद के साथ परिवारवाद के इस रिश्ते की जानबूझकर आरजेडी जैसे राजनीतिक दल बलि चढ़ा देते हैं। पिछले चुनाव में जो किसी और दल से लड़ चुकी हो, हार चुकी हो- ऐसे उम्मीदवार को टिकट देना। उनके बेटे को भी टिकट सौंप देना परिवारवाद भी है और परिवारवाद पर जातिवाद की मजबूत पकड़ का प्रमाण भी।
परिवारवाद बिहार में चुनाव का मुद्दा नहीं है। हर पार्टी परिवारवाद या रिश्तेदारवाद की शिकार नज़र आती है। एक ही परिवार से मां-बेटे, भाई-भाई, ससुर-दामाद, समधी-समधन, भाई-भावज, भाई-भाई उम्मीदवार हैं। कई रिश्तेदार तो एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। अलग-अलग ध्रुवों की सियासत में बंटकर दो समधी अपनी पारिवारिक और राजनीतिक दोनों रोटियां सेंक रहे हैं मगर इस परिवारवाद को मौन सहमति है। इस पर सवाल नहीं उठाने की भी सहमति है। ऐसा क्यों?












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