सभी 243 सीटों पर लड़ने की नहीं राजद की हैसियत, कांग्रेस के सामने पार्टी कर रही चिरौरी

सहयोगी दलों के एक-एक कर अलग होने से क्या लालू यादव डर गये हैं ? कल तक कांग्रेस को तेवर दिखाने वाले राजद के नेता अब बिल्कुल ढीले पड़ गये हैं। उनकी भाषा बदल गयी है। यहां तक कि राजद के नेता दुखड़ा रो कर कांग्रेस को मनाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या राजद को इस बात का डर है कि अगर कांग्रेस भी चली गयी तो उसे महागठबंधन तोड़ने के लिए कसूरवार ठहराया जाएगा ? अगर महागठबंधन बिखर गया और राजद अकेले रह गया तो क्या वह सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ पाएगा ? जब बिहार में लालू की तूती बोलती थी तब भी राजद सभी सीटों पर चुनाव नहीं लड़ पाया था। फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद ने सबसे अधिक 210 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसके बाद उसकी चुनावी सीटों की संख्या लगतार कम होती रही। अब तक के वोटिंग पैर्टन से एक बात साफ हो चुकी है कि बिहार में कोई एक दल अकेले सत्ता हासिल नहीं कर सकता। राजद को भी मालूम है कि सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का नतीजा क्या होगा। इसलिए वह कम से कम कांग्रेस को अपने साथ जोड़ कर रखना चाहता है।

राजद ने दुखड़ा रोया
लालू के करीबी और राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने कहा है कि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है और हम क्षेत्रीय पार्टी हैं। कांग्रेस पूरे देश में चुनाव लड़ती है। जब कि हम बिहार और झारखंड की कुछ सीटों पर ही चुनाव लड़ते हैं। कांग्रेस को इसके बारे में सोचना चाहिए और बड़ा दिल दिखाना चाहिए। लेकिन कांग्रेस तो हमारी गर्दन दबाना चाहती है। तो क्या बिहार में अब राजद की हालत ऐसी हो गयी है कि कांग्रेस उसकी गर्दन दबाने की कोशिश करे ? कुछ दिनों पहले ही राजद के नेताओं ने आंख तरेर कर कहा था, कांग्रेस 58 सीट ले या फिर अपना रास्ता देखे। लेकिन अब ऐसी क्या बात हुई कि शिवानंद तिवारी को कांग्रेस के आगे दुखड़ा रोना पड़ा ? अगर कांग्रेस भी राजद का साथ छोड़ देती है तो क्या होगा ? वैसे भी महागठबंधन शब्द मजाक बन कर रह गया है। महागठबंधन से मांझी और कुशवाहा पहले निकल गये हैं। वीआइपी की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है। अगर कांग्रेस भी बाहर चली गयी तो राजद पर यही आरोप लगेगा कि उसमें गठबंधन चलाने की क्षमता और योग्यता नहीं है।

क्या राजद ने कभी 243 सीटों पर लड़ा है चुनाव ?
जब बिहार में लालू यादव के नाम सिक्का चलता था तब तो राजद ने कभी 243 सीटों पर चुनाव नहीं लड़ा। सन 2000 के चुनाव में बिहार और झारखंड एक था। उस समय लालू यादव ने 324 में से 293 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। राजद के आधे से अधिक उम्मीदवार हार गये। केवल 124 विधायक चुने गये। लालू बहुमत से दूर रह गये। उन्हें सरकार बनाने के लिए कांग्रेस की चिरौरी करनी पड़ी। फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में लालू ने 243 में से 210 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। इसमें से केवल 75 की जीत हुई। यानी राजद के 135 प्रत्याशी हार गये। तब तक लालू के दिन गिरने लगे थे। राबड़ी देवी की सरकार सत्ता से बेदखल हो गयी। जब अक्टूबर 2005 में फिर चुनाव हुए तो राजद ने 175 सीटों पर चुनाव लड़ा। लालू के रहते उनके 121 उम्मीदवार फिर हार गये। केवल 54 पर जीत मिली। 2010 में तो लालू यादव की शर्मनाक हार हुई। 168 में से उनके केवल 22 प्रत्याशी जीते। 2015 में राजद की जीत का प्रतिशत तब बढ़ा जब उसे नीतीश कुमार का सहारा मिला। राजद ने 101 में 80 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव प्राप्त किया। अब जब लालू जेल (इलाजरत) में हैं तो क्या राजद 243 सीटों पर चुनाव लड़ पाएगा ? राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह भले यह कहें कि उनकी पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है लेकिन उनको भी इस दावे की हकीकत मालूम है।

कांग्रेस क्यों अड़ी है 75 सीटों पर ?
खबरों के मुताबिक कांग्रेस 75 सीट लेने के लिए अड़ी हुई जब कि राजद उसे 58 सीटें देने के लिए ही तैयार है। इस जिद में कांग्रेस अलग होती है तो क्या उसका भला होगा ? कांग्रेस ने 2015 में राजद और जदयू के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था तो उसे 41 में 27 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन इसके इतर कांग्रेस ने जब भी अलग चुनाव लड़ा तो उसे करारी हार झेलनी पड़ी। बिहार में गठबंधन की राजनीति के बिना कोई दल आगे नहीं बढ़ सकता। कांग्रेस ने 2010 के विधानसभा चुनाव में सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें उसके केवल 4 उम्मीदवार ही जीत पाये थे। अक्टूबर 2010 में कांग्रेस ने 51 सीटों पर उम्मीवार दिये जिसमें से सिर्फ 9 ही जीत पाये। इसी तरह फरवरी 2005 के चुनाव में कांग्रेस के 84 में से 10 प्रत्याशी ही जीते थे। यानी 2015 में कांग्रेस की किस्मत तब चमकी जब वह मजबूत गठबंधन में शामिल हुई। अगर अधिक सीट लेने की जिद में राजद और कांग्रेस का गठजोड़ टूटता है तो यह दोनों के लिए घाटे का सौदा हो सकता है।
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