बिहार विधानसभा चुनाव : जोर पकड़ती दिख रही है सांप्रदायिक-जातिगत सियासत

बिहार विधानसभा चुनाव : जोर पकड़ती दिख रही है सांप्रदायिक-जातिगत सियासत

बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे परवान चढ़ रहा है राजनीतिक नफा-नुकसान की सियासत अपना स्वरूप लेने लगी है। अचानक ऐसी घटनाओं की बाढ़ आ गयी है जिससे सांप्रदायिक और जातिगत ध्रुवीकरण हो। यह कोशिश बिहार में तो हो ही रही है, टीवी स्क्रीन पर भी हो रही है जिसका असर बिहार ही नहीं पूरे देश पर पड़ रहा है।

बिहार में आतंकी पाते हैं पनाह : पहले बोले मोदी, अब नित्यानंद

बिहार में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने यह बयान देकर सनसनी फैला दी है कि आरजेडी की जीत से बिहार में कश्मीर से आए आतंकी पनाह लेंगे। अगर अतीत को याद करें तो जो बात नित्यानंद राय 2020 में बोल रहे हैं वही बात नरेंद्र मोदी 2014 के आम चुनाव में बोल चुके थे। फर्क यह था कि निशाने पर आरजेडी न होकर जेडीयू थी। दरअसल 27 अक्टूबर 2013 को पटना में हुई नरेंद्र मोदी की रैली में सिलसिलेवार धमाके हुए थे। उसी का जिक्र करते हुए 2014 के आम चुनाव में पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कहा था कि “बिहार आतंकियों के लिए स्वर्ग बन चुका है।“ तब जवाब में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगे की याद दिलायी थी। जबकि आज तेजस्वी यादव बेरोजगारी के आतंक पर बोलने की चुनौती बीजेपी को दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि बिहार में 46.6 प्रतिशत बेरोजगारी पर बीजेपी बोले।

बिहार विधानसभा चुनाव : जोर पकड़ती दिख रही है सांप्रदायिक-जातिगत सियासत

बिहार से बाहर भी तय हो रहे हैं मुद्दे

बिहार में चुनाव का मुद्दा सेट करने की कोशिश बिहार के बाहर से भी हो रही है। बिहार में सवर्ण सियासत कर रही बीजेपी ने यूपी के हाथरस मामले में राजपूतों को लुभाने की कोशिश की है। पीड़ित दलित परिवार पर शक जताते हुए उनका नार्को टेस्ट कराने और फिर सीबीआई जांच के दायरे में उन्हें लाकर योगी सरकार ने जरूरी संदेश बिहार के वोटरों को दिया है। हालांकि यही काम दलितों के लिए साथ खड़ी होकर कांग्रेस ने भी करने की कोशिश की है। हाथरस की सियासत का असर बिहार पर पड़ेगा, ऐसा माना जा रहा है। कांग्रेस को हिन्दू विरोधी और मुस्लिम परस्त साबित करने की सियासत राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर रोज हो रही है। कभी पालघर के नाम पर, कभी फारूक अब्दुल्ला के नाम पर और बारंबार सीएए-एनआरसी आंदोलन की याद दिलाते हुए दिल्ली दंगों के नाम पर। हाथरस केस तक को सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शन से जोड़कर कांग्रेस को घसीटने की कोशिशें हुई हैं। बलात्कार की घटनाएं देशभर में हो रही हैं। उन घटनाओं में सेलेक्टिव होने का मुद्दा भी इसी रूप में उठाया जा रहा है मानो सियासत कांग्रेस कर रही हो।

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एनडीए में सुशांत सिंह केस बीजेपी को चाहिए, जेडीयू को नहीं

सुशांत सिंह केस की जरूरत एनडीए में बीजेपी को है लेकिन जेडीयू को नहीं। जेडीयू नेता नीतीश कुमार को एनडीए में रहकर सवर्णों का न तो विरोध करना है और न ही सवर्ण की सियासत करनी है। लिहाजा नीतीश कुमार ने सुशांत सिंह मुद्दे पर सुर्खियां बटोरते हुए डीजीपी पद से इस्तीफा देने और फिर सियासत में आने वाले गुप्तेश्वर पांडे को टिकट नहीं दिया। राजनीति में कच्चे गुप्तेश्वर ने अगर राजनीतिक समझी होती तो वे जेडीयू के बजाए बीजेपी ज्वाइन करते। बहरहाल वे सुशांत सिंह की सियासत में नीतीश की भूमिका पढ़ने में नाकाम रहे। सुशांत सिंह राजपूत केस में महाराष्ट्र बनाम बिहार की सियासत का मकसद ही महाराष्ट्र की सरकार में शामिल कांग्रेस को निशाने पर लेना रहा है। इसके अलावा सुशांत सिंह राजपूत के नाम पर सवर्ण की सियासत को तूल देना इसका सबसे बड़ा मकसद था। अब तक की जांच में आत्महत्या को हत्या में बदलने की कोई कोशिश सफल नहीं हुई है लेकिन सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ दिलाने का मुद्दा चुनाव में जोर पकड़ने वाला है। यह मुद्दा जोर-शोर से उछालने की तैयारी है।

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राष्ट्रवाद का मुद्दा छोड़ना नहीं चाहती बीजेपी

बिहार चुनाव में मुद्दे तलाश रही बीजेपी किसी भी सूरत में राष्ट्रवाद का मुद्दा छोड़ना नहीं चाहती। यह ऐसा मुद्दा है जो बीजेपी और सत्ताधारी दल की सभी कमियों की पर्देदारी कर देता है। यही वजह है कि आए दिन चीन, पाकिस्तान और कश्मीर मुद्दे की चर्चा गाहे-बगाहे कर ही दी जाती है। इस बहाने बीजेपी को राष्ट्रवादी, सेना समर्थक और मुंहतोड़ जवाब देने वाला पेश किया जाता है। वहीं, विपक्ष को देश का दुश्मन बताया जाता है। ये बातें भी आने वाले दिनों में और अधिक जोर पकड़ने वाली है। बिहार विधानसभा चुनाव में अभी भावनात्मक मुद्दों की बाढ़ आने वाली है और एक-दूसरे के लिए बुरा बोलने का दौर भी शुरू होगा, मगर महागठबंधन के नेता तेजस्वी इस बार सतर्क लगते हैं। यही वजह है कि वे मुस्लिम समर्थक के रूप में प्रचारित करने की साजिश को भांपते हुए बार-बार मुद्दा बेरोजगारी और प्रवासी मजदूर को बना रहे हैं। वामदलों के साथ खड़ी आरजेडी ने महागठबंधन उम्मीदवारों की सूची एक साथ जारी कर अपनी एकजुटता का इजहार किया है। देखना यह है कि भावनात्मक मुद्दे पर चुनाव लड़ने की कोशिश को वे रोक पाते हैं या नहीं।

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