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जानिए कौन हैं शिवराज सिंह चौहान के छह मजबूत हाथ

Shivraj Singh Chauhan
भोपाल। मंत्रालय में अपनी तीसरी पारी की शुरुआत करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब कल मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि बेस्ट परफार्मर ही मंत्री बनेंगे तब से पिछले मंत्रीमंडल के मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड खगाला जाने लगा है। ऐसे मंत्रियों को छांट कर अलग किया जा रहा है जिनकी परफार्मेन्स परफैक्ट रही है। ऐसे मंत्री जो विधानसभा के अंदर भी और बाहर भी सरकार की हमेशा अलग-अलग ढंग न केवल सबल प्रदान करते हैं, बल्कि अपने विभाग में मजबूत पकड़ रखते हुए सकारात्मक परिणाम भी देते हैं।

हम यहां उन मंत्रियों की बात करेंगे जिन्होंने सदन के अंदर व बाहर हमेशा अपना बेस्ट परफार्मेंस दिया है। जिनका इस बार भी मंत्री बनाया जाना तय है। इस बार 165 विधायक जो जीतकर आये हैं और ऊपर से राष्ट्रीय नेताओं का दबाव, लेकिन यह भी तय है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक-एक विधायक को जानते हैं और उन्हें पता है कि कौन बेहतर प्रर्दशन कर सरकार की छवि बना सकता है कौन अपनी क्षमता के दम पर आसन्न लोकसभा चुनाव में पार्टी को जितनाने में मददगार सिद्ध हो सकता है। केवल मुख्यमंत्री को अपनी निर्णय लेने की क्षमता को सिद्ध करना है। वे जितना देर करेंगे उतनी आम जनता में मायूसी छायेगी वहीं सरकार के काम को भी गति नहीं मिल पायेगी। चलिये एक-एक कर मंत्रियों पर नजर डालते हैं-

बाबू लाल गौर, जिन्हें लोग बुल्डोजर कहते हैं

बाबूलाल गौर की तो दस बार विधानसभा का चुनाव जीतना ही अपने-आप में एक दक्षता है। उसमें वे जब-जब मंत्री रहे तब-तब उनके कार्यों से प्रदेश में भाजपा को मजबूती मिली है मुख्यमंत्री के तौर पर जरूर उनको कम समय मिला, लेकिन उस कार्यकाल में भी अयोध्या बस्ती एवं गोकुल ग्राम योजना पूरे प्रदेश में चर्चित रही और यदि समय मिलता तो प्रदेश में एक मिसाल बनती। इसके पहले पटवा शासन काल में बुल्डोजर मंत्री के रूप में जाने वाले मंत्री गौर ने तब शहरों में अतिक्रमण हटाकर भाजपा को मजबूती प्रदान की जो आज भी कायम है।

यही कारण है कि नगरीय प्रशासन गौर का पसंदीदा विभाग भी रहा है प्रदेश की राजधानी में हमेशा सुधार के लिये प्रयासरत रहे बाबूलाल गौर राजधानी से ही पूरे प्रदेश में भाजपा के प्रति सकारात्मक संदेश देते है। मुख्यमंत्री बनने के बाद मंत्री पद स्वीकार कर लेना भी गौर जैसे ही नेता का अंदाज कहा जा सकता है कहना न होगा कि एक मंत्री के रूप में गौर का परफार्मेन्स बेस्ट ही कहा जावेगा। गौर हमेशा भारी मतों से जीतते हैं। एक बार प्रदेश में सर्वाधिक मतों से जीतने का रिकार्ड भी बनाया। हाल ही में 70 हजार से अधिक मतों से जीते हैं।

गोपाल भार्गव, एक धाकड़ नेता

कभी कांग्रेस का गढ़ रहे रहली विधानसभा क्षेत्र से लगातार सातवीं बार जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। एक बार मध्य प्रदेश में सर्वाधिक मतों से भी जीते चुके है। हाल ही में 51 हजार से अधिक मतों से जीते हैं। भार्गव को हमेशा पार्टी ने चुनौतीपूर्ण विभाग दिये हैं। सबसे पहले कृषि एवं सहकारिता का विभाग दिया गया है तब भार्गव ने अपनी काबिलियत दिखाते हुए मप्र के सहकारिता क्षेत्र से कांग्रेस के धाकड़ नेताओं को बाहर कर दिया है। ये बात और है कि भार्गव अब भी सहकारिता के मंत्री के दौरान हुए दर्ज मुकदमों में जमानत करवा रहे हैं।

कृषि क्षेत्र में भी तब सुधार के आधारभूत ढांचा तैयार किया गया था जिसके परिणाम पिछले वर्षों में आने शुरू हो गये थे इसके बाद गोपाल भार्गव को सामाजिक न्याय एवं पंचायत व ग्रामीणा मंत्री बनाये गये जिसमें भी भार्गव ने अपनी दक्षता दिखाते हुए पंच परमेश्वर योजना शुरू की जिसके कारण भाजपा का गांवों में ग्राफ बढ़ा इसके अलावा मुख्यमंत्री सड़क योजना एवं मुख्यमंत्री आवास योजना चलाकर प्रधानमंत्री सड़क एवं इंदिरा आवास के मामले में मप्र को केन्द्र से मिल रहे असहयोग की भरपाई की इसके अलावा भी भार्गव ने सामाजिक न्याय मंत्री रहते हुए कन्यादान योजना, मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना, बेटी बचाओं अभियान एवं बृद्धों एवं नि:शक्तजनों की योजनाओं को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

इसके अलावा भी भार्गव में वह क्षमता है कि वे विधानसभा के अंदर या बाहर कभी भी राजनैतिक परिदृश्य को बदलने की दृष्टि रखते हैं। भार्गव की सबसे बड़ी कमी यही है कि वे न तो दिल्ली का दौरा कर राष्ट्रीय नेताओं से संबंध बनाते है और न ही प्रदेशव्यापी दौरा कर प्रदेश के नेता बनने का प्रयास करते हैं।

कैलाश विजयवर्गीय, राष्ट्रीय स्तर के ख‍िलाड़ी

इन्होंने मालवा में सीट बदलने के बाद भी जीत दर्ज की। कैलाश विजयवर्गीय ने जहां अनेक राष्ट्रीय नेताओं से भी मधुर संबंध हैं वहीं प्रदेश में भाजपा के अनेकों कार्यकर्ताओं से भी सीधा संवाद रखते हैं।

उद्योगमंत्री रहते हुए देश और विदेश के उद्योगपतियों से भी कैलाश विजयवर्गीय के अच्छे संबंध स्थापित हो गये जो आज की राजनीति की महती आवश्यकता है। कैलाश विजयवर्गीय की प्रदेश में संपन्न हुई इन्वेस्टर्स सीट को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है वही सदन के अंदर भी वे सरकार के संकट मोचक के रूप में हमेशा काम आये है।

जयंत मलैया, वित्त के दिग्गज

जयंत हमेशा लो प्रोफाइल पॉलिटिक्स करते हैं लोधी बाहुल्य दमोह सीट पर ऐन-केन प्रकरण सीट जीत ही लेते हैं। वे विभागीय कार्यों में पूरी शिद्दत और दक्षता के साथ निपटाते हैं। यही कारण है कि पिछले दिनों उन्हें राघवजी के हटाने के बाद वित्त विभाग का चार्ज दिया गया था।

प्रदेश में कृषि विकास दर बढने के पीछे यह कारण माना गया था कि जयंत मलैया ने जल संसाधन विभाग के माध्यम से सिंचाई का रकबा बढ़वा दिया जिसे कृषि के उत्पादन में वृद्धि हुई। बहरहाल, जयंत मलैया की गंभीरता को देखते हुए उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाने और वित्त मंत्री का दायित्व सौंपने की भी चर्चायें चल रही हैं।

नरोत्तम मिश्रा, तालमेल बिठाने में माहिर

आप मुख्यमंत्री के निकट और विश्वसनीय भी कहे जाते हैं। संसदीय कार्यमंत्री रहते हुए सदन के अंदर तालमेल बिठाने का काम बडी चतुराई से किया है। स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए भी नरोत्तम मिश्रा ने जननी सुरक्षा योजना, जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं का प्रदेश में बेहतर क्रियान्वयन किया।

ग्वालियर में जहां अनूप मिश्रा चुनाव हार गये वहीं नरोत्तम मिश्रा साम-दाम, दंड-भेद की राजनीति करके अच्छे मार्जिन से चुनाव जीतने में कामयाब हुए हैं। नरोत्तम मिश्रा के भी भाजपा के कई राष्ट्रीय नेताओं से मधुर संबंध है।

उमाशंकर गुप्ता, एमपी के थानेदार

गृहमंत्री रहते हुए उमाशंकर गुप्ता ने भी पुलिस विभाग में सुधार के अनेकों उल्लेखनीय प्रयास किये। यही कारण है कि गृहमंत्री रहते हुए चुनाव जीते जबकि अब तक अधिकांश गृहमंत्री प्रदेश में चुनाव हारवे रहे हैं। वैसे तो लोक निर्माण मंत्री रहते हुए नागेन्द्र सिंह ने भी बेहतर कार्य किया था, लेकिन वे चुनाव लड़े नहीं इसलिए उनका मंत्री बनने का सवाल ही नहीं। इसी प्रकार वित्त मंत्री रहते हुए राघवजी का कार्यकाल भी बेहतर था।

10 वर्षों में सरकार को एक भी बार ओव्हर ड्राफ्ट का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन उनकी एक गलती ने फिलहाल उनकी सब उपलब्धियों पर पानी फेर दिया है। पर्यटन एवं खेल मंत्री के रूप में यशोधरा राजे सिंधिया ने भी अपनी विशेष पहचान बनाई थी। इसी प्रकार रामपाल सिंह, एवं रूष्तम सिंह, अर्चना चिटनीस, विजय शाह का मंत्री के रूप में कार्यकाल को बेहतर माना जाता रहा है।

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