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मालेगांव बम ब्लास्ट केस: साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की बरी होने के बाद भोपाल में ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत

17 साल पहले 2008 के मालेगांव बम ब्लास्ट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को विशेष एनआईए कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के बाद 3 अगस्त 2025 को वे पहली बार भोपाल लौटीं। उनके बंगले पर समर्थकों ने ढोल-नगाड़ों और आतिशबाजी के साथ भव्य स्वागत किया।

इस मौके पर साध्वी प्रज्ञा ने कांग्रेस पर जमकर हमला बोला, इसे "हिंदू आतंकवाद" की झूठी थ्योरी गढ़ने का दोषी ठहराया और दावा किया कि उन्हें जांच के दौरान अमानवीय यातनाएं दी गईं। मालेगांव ब्लास्ट मामले में बरी होने के बाद साध्वी प्रज्ञा पहली बार भोपाल पहुंचीं।

Malegaon bomb blast case Drums and trumpets welcome Sadhvi Pragya Singh Thakur after her acquittal

बोलीं, 'सत्यमेव जयते। मेरे ऊपर बड़े लोगों के नाम लेने का दबाव था, लेकिन मैं नहीं टूटी।' यह कहानी साध्वी प्रज्ञा के बरी होने, उनके स्वागत, और उनके विवादास्पद बयानों के साथ-साथ मालेगांव मामले की पृष्ठभूमि को उजागर करती है।

भोपाल में भव्य स्वागत: ढोल-नगाड़े और आतिशबाजी

3 अगस्त 2025 को साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर जब भोपाल के अपने बंगले पर पहुंचीं, तो उनके समर्थकों ने उनका स्वागत ढोल-नगाड़ों, आतिशबाजी, और फूल-मालाओं के साथ किया। सैकड़ों लोग उनके आवास के बाहर जमा थे, जिनमें भाजपा कार्यकर्ता, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के सदस्य शामिल थे। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर मालेगांव विस्फोट मामले में बरी होने के बाद पहली बार भोपाल में अपने आवास पर पहुंचीं।" स्वागत के दौरान "भारत माता की जय" और "जय श्री राम" के नारे गूंज रहे थे। समर्थकों ने इसे "भगवा की जीत" और "हिंदुत्व की विजय" करार दिया।

साध्वी ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा, "मैंने शुरू से कहा था कि मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं है। मुझे फंसाया गया, प्रताड़ित किया गया। यह भगवा की जीत है, सत्य की जीत है। जिन्होंने भगवा को बदनाम किया, भगवान उन्हें सजा देगा।

मालेगांव बम ब्लास्ट केस: 17 साल की कानूनी लड़ाई

29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के नासिक जिले में मालेगांव के भिक्कू चौक पर एक मोटरसाइकिल पर रखा गया बम फटा था, जिसमें 6 लोगों की मौत हुई और 95 लोग घायल हुए। यह धमाका रमजान के पवित्र महीने में और नवरात्रि की पूर्व संध्या पर हुआ, जिसे सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश माना गया। महाराष्ट्र एटीएस ने जांच शुरू की और दावा किया कि धमाके में इस्तेमाल मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा के नाम पर रजिस्टर्ड थी। अक्टूबर 2008 में साध्वी प्रज्ञा को गिरफ्तार किया गया, और उनके साथ लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और 5 अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया।

विशेष एनआईए कोर्ट ने सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया, क्योंकि "प्रॉसिक्यूशन विश्वसनीय और ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा।" कोर्ट ने कहा कि मोटरसाइकिल का चेसिस नंबर पूरी तरह से प्राप्त नहीं हुआ, और यह सिद्ध नहीं हुआ कि वह साध्वी के स्वामित्व में थी। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि "आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, क्योंकि कोई भी धर्म हिंसा की वकालत नहीं करता।"

2011 में जांच एनआईए को सौंपी गई। 2016 में एनआईए ने अपनी पूरक चार्जशीट में कहा कि एटीएस ने सबूतों के साथ छेड़छाड़ की थी, और साध्वी के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे। हालांकि, कोर्ट ने 2018 में साध्वी और अन्य के खिलाफ यूएपीए और आईपीसी के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया। 323 गवाहों की जांच और 10,800 से अधिक दस्तावेजों के बावजूद, 37 गवाह मुकर गए, जिससे प्रॉसिक्यूशन का केस कमजोर हो गया।

साध्वी प्रज्ञा का बयान: "मुझे पुरुषों ने प्रताड़ित किया"

भोपाल में पत्रकारों से बात करते हुए साध्वी प्रज्ञा ने जांच के दौरान अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का जिक्र किया। उन्होंने कहा, "मुझे फंसाया गया। जांच के समय मुझे पुरुषों द्वारा प्रताड़ित किया गया। मुझे बड़े-बड़े लोगों, जैसे नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, और मोहन भागवत का नाम लेने के लिए टॉर्चर किया गया, लेकिन मैंने झूठ नहीं बोला।"

साध्वी ने आगे कहा, "मैं सन्यासी थी, मेरा जीवन भक्ति और सेवा में बीत रहा था। इस केस ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। मैं जीवित हूं, क्योंकि मैं सन्यासी हूं।" उन्होंने 2014 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दी गई अपनी शिकायत का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने हिरासत में यातना की बात कही थी, हालांकि आयोग ने सबूतों के अभाव में इस मामले को बंद कर दिया था।

कांग्रेस पर हमला: "हिंदू आतंकवाद का झूठा नैरेटिव"

साध्वी प्रज्ञा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला और "हिंदू आतंकवाद" शब्द को कांग्रेस की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा, "आतंकवाद का रंग होता है, और धर्म भी होता है। हरा रंग लेकर आतंकवाद फैलाते हैं। मुस्लिम आतंकवाद को खुश करने के लिए कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद जैसा शब्द गढ़ा।"

उन्होंने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह पर भी निशाना साधा, जिन्हें उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में भोपाल से हराया था। साध्वी ने कहा, "दिग्विजय सिंह का नाम लेना भी खराब है। उन्होंने हिंदुओं को चुन-चुनकर मारा। कांग्रेस आतंकवादियों के लिए रोती है और हिंदुओं को प्रताड़ित करती।

"हिंदू आतंकवाद" का नैरेटिव: सियासी तूफान

2008 के मालेगांव धमाकों के बाद "हिंदू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" जैसे शब्दों ने भारतीय राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया था। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने इस नैरेटिव को बढ़ावा दिया और आरएसएस को "बम बनाने की फैक्ट्री" चलाने का आरोप लगाया। 2010 में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम और 2013 में सुशील कुमार शिंदे ने भी "भगवा आतंकवाद" का जिक्र किया, जिसे बीजेपी ने हिंदू धर्म का अपमान बताया।

साध्वी प्रज्ञा ने कहा, "कांग्रेस ने विधर्मी मानसिकता को स्थापित किया। उन्होंने हिंदुओं को चुन-चुनकर मारा और झूठे केस में फंसाया।" उन्होंने दावा किया कि मालेगांव केस में उन्हें और अन्य आरोपियों को गलत तरीके से फंसाया गया ताकि कांग्रेस अपने वोटबैंक को खुश कर सके।

राजनीति में वापसी पर सवाल: "हम राष्ट्रनीति करते हैं"

जब पत्रकारों ने साध्वी से उनकी राजनीतिक वापसी के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, "हम राष्ट्रनीति करते हैं, राजनीति नहीं। मैंने हमेशा हिंदू संस्कृति और राष्ट्र के लिए काम किया है। "हिंदुओं को कांग्रेस ने हमेशा कुचला। हमारा लक्ष्य सनातन धर्म की रक्षा करना है।" साध्वी ने 2019 में भोपाल से बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता था, लेकिन 2024 में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया।

उनके विवादास्पद बयानों, जैसे नाथूराम गोडसे को "देशभक्त" कहना और हेमंत करकरे की मृत्यु को "शाप" से जोड़ना, ने बीजेपी को असहज किया था। पीएम नरेंद्र मोदी ने गोडसे वाले बयान की निंदा की थी और कहा था कि वे "गांधी का अपमान करने वालों को कभी माफ नहीं करेंगे।"

हसामाजिक कार्यकर्ता रीना शर्मा ने कहा, "यह केस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकता है। हमें आतंकवाद को धर्म से जोड़ने की बजाय तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए।" समाजशास्त्री डॉ. संजय वर्मा ने कहा, "मालेगांव केस ने भारत की जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। यह एक सबक है कि बिना पुख्ता सबूतों के किसी को फंसाना खतरनाक हो सकता है।"

मालेगांव की पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक संदर्भ

मालेगांव, नासिक जिले में एक सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर, 2008 के धमाकों से पहले भी सांप्रदायिक तनाव का गवाह रहा है। 2006 में भी मालेगांव में धमाके हुए थे, जिन्हें जिहादी आतंकवाद से जोड़ा गया था। 2008 के धमाकों को कुछ लोग इससे "बदला" मानते थे, लेकिन कोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया। साध्वी प्रज्ञा ने दावा किया कि उनका मोटरसाइकिल डेढ़ साल पहले बेच दिया गया था, और एनआईए कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया।

यह केस कई सवाल खड़े करता है:

जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता: क्या एटीएस ने सबूतों के साथ छेड़छाड़ की, जैसा कि एनआईए ने 2016 में दावा किया था?

सांप्रदायिक नैरेटिव: "हिंदू आतंकवाद" और "मुस्लिम आतंकवाद" जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्या समाज को और विभाजित करेगा?

पीड़ितों का इंसाफ: धमाके में मारे गए 6 लोगों और घायल हुए 95 लोगों के परिवारों को अब इंसाफ कैसे मिलेगा?

राजनीतिक दुरुपयोग: क्या जांच का राजनीतिकरण हुआ, और इसका जवाबदेही कौन लेगा?

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