हिंदुत्व के असर वाली इस सीट को क्या कांग्रेस 2023 के चुनाव में जीत पाएगी, जानिए सीहोर विधानसभा सीट का समीकरण

Sehore Assembly constituency 2023: मध्य प्रदेश में आगामी दिनों में विधानसभा चुनाव होना है और मध्य प्रदेश के कुछ इलाके ऐसे हैं जहां पर धर्म के नाम पर मतदाताओं का रुझान ज्यादा होता है। ऐसे ही एक विधानसभा सीट सीहोर की है। लेकिन अब इस विधानसभा क्षेत्र में लोगों का रुझान बदल रहा है। आईए जानते हैं इस विधानसभा क्षेत्र के समीकरण।

बता दे सीहोर विधानसभा क्षेत्र में वर्तमान में भाजपा विधायक सुदेश राय काबिज है। पिछले सात चुनावों से यहां पर भाजपा के प्रत्याशी ही जीत रहे हैं। सीहोर ऐसा विधानसभा क्षेत्र है, जहां पर हिंदुत्व के नाम पर दो निर्दलीय प्रत्याशी विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर चुके हैं। इसके बाद उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर चुनाव लड़ा और फिर विधायक बने। अंतिम दो बार से ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है। पहले रमेश सक्सेना निर्दलीय चुनाव लड़कर विधायक बने। उसके बाद भाजपा ने उन्हें टिकट दिया और इसके बाद वो बीजेपी से विधायक बने। इसके बाद सुरेश राय निर्दलीय जीते फिर उन्हें भाजपा ने टिकट देकर प्रत्याशी बनाया और वे भी दूसरी बार बीजेपी से विधायक बने।

Equation of Sehore assembly, will Congress be able to win the Hindutva seat in 2023 elections

लेकिन वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार क्षेत्रीय विधायक हिंदुत्व का चेहरा कम और व्यापारी अधिक माने जा रहे हैं। जनता के बीच उनकी सक्रियता कम नजर आती है। वर्तमान विधायक लोगों को खटकने लगे हैं। सीहोर में आबादी बढ़ने के साथ बेरोजगारी विकराल रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में यदि कांग्रेस ठीक चेहरा मैदान में उतारती है तो भाजपा के लिए ये सीट बचाना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि अब कांग्रेस भी हिंदुत्व की राह पर चल पड़ी है।

सीहोर विधानसभा का इतिहास

सीहोर शहर में 1957 में पहली बार विधानसभा के चुनाव हुए यहां से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उमराव सिंह विधायक बनकर सदन पहुंचे थे। नवाब के प्रभाव वाले इस इलाके में दो बार मुस्लिम समाज से भी विधायक बने। पहली बार 1962 में कांग्रेस ने इनायतुल्लाह खान को टिकट दिया और वे जीत गए। इस दौरान सीहोर विधानसभा में हिंदुत्व का माहौल बनना शुरू हो गया था। धीरे-धीरे लोगों की सोच में परिवर्तन हुआ और तीसरे ही विधानसभा चुनाव में संघ समर्थन से बनी पार्टी जन संघ के आरके मेवाड़ा 1967 में विधायक बनकर सदन पहुंचे। हालांकि कांग्रेस के बड़े नेता अजीत कुरैशी ने 1972 के विधानसभा चुनाव में ये सीट वापस छीन ली थी और विधायक बने थे। कुरैशी ने भारतीय जन संघ के सुदर्शन महाजन को 6782 वोटों से हराया था।

लेकिन इसके बाद से हिंदुत्व की लहर ने ऐसी उछाल मारी कि इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस सिर्फ एक ही बार सीट जीतने में सफल हुई। ये माहौल अभी भी बरकरार है। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि नवाबी शासन के समय आंदोलन चला, तभी यहां के मतदाता हिंदू-मुस्लिम वोटर्स में कन्वर्ट हो गए। कृषि प्रधान इलाका होने के कारण यहां पर ज्यादातर पिछड़ा वर्ग की जातियां निवास करती है इसलिए रोजगार की बहुत अधिक चिंता नहीं रही। आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन बजरंग दल का भी खास असर इस क्षेत्र में दिखाई देता है, जब दो बार कांग्रेस ने मुस्लिम चेहरा मैदान में उतरा तो उसके खिलाफ एक माहौल सा बन गया, जो अब तक कायम है।

बीजेपी ने 1998 निर्दलीय विधायक का चुनाव लड़े रमेश सक्सेना की ताकत को पहचाना और उन्हें टिकट दिया। साल 1958 में हुए विधानसभा चुनाव में रमेश सक्सेना ने 46,171 वोट लेकर कांग्रेस के कैंडिडेट जसपाल सिंह अरोरा को 13,288 वोट से पराजित किया था। इसके बाद साल 2003 में रमेश सक्सेना ने 52,681 वोट लेकर कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह ठाकुर को 11011 वोट से विधानसभा चुनाव हराया। वहीं 2008 में 48,404 वोट लेकर कांग्रेस के सुदेश राय को 10036 वोटों से चुनाव हराया, लेकिन 2013 में रमेश सक्सेना की जीत का क्रम टूट गया। कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े सुदेश राय ने टिकट नहीं मिलने के कारण निर्दलीय पर्चा भर दिया। इसका नुकसान रमेश सक्सेना को हुआ और उनकी पत्नी चुनाव हार गई। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी सुरेश राय विधायक बन गए, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी हरीश राठौर तीसरे नंबर पर पहुंच गए।

2013 के विधानसभा चुनाव में सुदेश राय को 63,604 वोट मिले, जबकि ऊषा सक्सैना को 61978 वोट मिले। इस तरह 1626 वोट से सुदेश राय ने जीत दर्ज की। इसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में सुदेश राय को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया और उन्होंने कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह ठाकुर को 20,644 वोटों से हरा दिया। खास बात यह है कि इस बार भी रमेश सक्सेना ने अपनी पत्नी उषा ठाकुर को मैदान में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उतारा था लेकिन उन्हें सिर्फ 26,397 वोट ही मिले। लेकिन अब रमेश सक्सेना कांग्रेस में शामिल हो चुके है।

सीहोर विधानसभा में जातीय समीकरण

इस विधानसभा में सर्वाधिक वोट एक जाति के नहीं है, बल्कि 1920 स्थिति में है। सीहोर में पाटीदार, राजपूत, मेवाड़ा, मीना, खाती, डांगी, गुर्जर विश्वकर्मा, कलार (वर्तमान विधायक भी जाति के हैं ) लोधी समाज के मतदाता भी बड़ी संख्या में विधानसभा क्षेत्र में है। जबकि सामान्य वर्ग की जातियों का भी खास असर है। ब्राह्मण, कायस्थ और बनिया शहरी क्षेत्र में बड़ी संख्या में निवास करते हैं। लेकिन इस क्षेत्र में सबसे बड़ी संख्या दलित प्लस आदिवासी समाज की है। वही मुस्लिम समाज की संख्या भी 20,000 से अधिक है। अब तक दलित वर्ग का वोट भाजपा के साथ रहा है, लेकिन अब इस क्षेत्र में रुझान बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।

सीहोर विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या

सीहोर विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या की बात की जाए तो 2018 विधानसभा चुनाव के अनुसार यहां पर कुल मतदाताओं की संख्या 2,15,025 है। जिसमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 1,10,203 है, जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 1,04,814 व अन्य की संख्या 8 है।

सीहोर विधानसभा क्षेत्र की खासियत

वरिष्ठ पत्रकार विशाल बरेठा के अनुसार सीहोर पूरा कृषि प्रधान इलाका है और बड़ी मंडी के साथ यहां पर वेयरहाउस का बिजनेस भी काफी फैला हुआ है। खेती उन्नत होती है। इंदौर हाईवे के कारण पर्यटन, होटल, रिजार्ट में काफी व्यापार होता है। इसके साथ ही सीहोर चिंतामन गणेश मंदिर के लिए फेमस है। सीहोर में गन्ना मिल थी लेकिन कई साल पहले वह बंद हो चुकी है। क्षेत्र में रोजगार को लेकर कोई बड़ी इंडस्ट्री नजर नहीं आती। इसलिए युवाओं को भोपाल और इंदौर पलायन करना पड़ता है।

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