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मध्य प्रदेश में 'जहर की बोतल' बने कफ सिरप: 16 मासूमों की जानें लील चुका, बैतूल में दो और हादसें

मध्य प्रदेश के हृदयस्थल में फैले एक अदृश्य जहर ने मासूम बच्चों की हंसी को हमेशा के लिए चुप करा दिया है। खांसी-जुकाम जैसी मामूली बीमारी के इलाज के नाम पर दी जा रही 'कोल्ड्रिफ' कफ सिरप अब 'जानलेवा' साबित हो रही है। छिंदवाड़ा जिले में 14 बच्चों की मौत के बाद अब पड़ोसी बैतूल जिले से दो और दिल दहला देने वाली खबरें आई हैं, जहां दो मासूमों की किडनी फेलियर से जान चली गई।

कुल 16 मौतों का यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा, और पूरे राज्य में दहशत का माहौल है। स्वास्थ्य विभाग और केंद्र सरकार की जांच तेज हो गई है, लेकिन सवाल वही पुराना-क्या दवा उद्योग की लापरवाही मासूमों की जानों पर भारी पड़ रही है?

Cough syrup turns into poison bottle in MP 16 innocent lives claimed two more accidents in Betul

जानिए पूरा मामला

यह कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि उन परिवारों की है जो कभी सोच भी नहीं सकते थे कि एक साधारण सी दवा उनके घर का उजाला छीन लेगी। बैतूल के ग्रामीण इलाके में रहने वाले दो भाई-बहन-5 साल की रिया और 3 साल का आरव-खांसी की शिकायत पर स्थानीय डॉक्टर प्रवीण सोनी को दिखाए गए। डॉक्टर ने तुरंत 'कोल्ड्रिफ' सिरप लिखा, जो बाजार में आसानी से उपलब्ध था। लेकिन कुछ ही घंटों बाद बच्चों की हालत बिगड़ने लगी। उल्टी, दस्त और तेज बुखार ने उन्हें जकड़ लिया, और अंततः किडनी फेलियर ने उनकी सांसें थाम ली। परिवार के सदस्यों का रो-रोकर बुरा हाल है। मां का कहना है, "डॉक्टर साहब ने कहा था, ये सिरप जादू की तरह काम करेगा। लेकिन ये तो जहर निकला!"

बैतूल की यह घटना छिंदवाड़ा के उस भयावह कांड की याद दिला रही है, जहां इसी सिरप ने 14 बच्चों की जान ले ली। छिंदवाड़ा के एडीएम धीरेंद्र सिंह ने शनिवार को पुष्टि की कि जिले में अब तक 14 मौतें हो चुकी हैं, सभी 2 से 5 साल के बच्चे। इनमें से ज्यादातर मौतें किडनी और लीवर फेलियर से हुईं। एडीएम ने बताया, "सभी मामलों में मुआवजा स्वीकृत हो गया है। प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये की राशि उनके खातों में ट्रांसफर कर दी गई है।" लेकिन पैसे से तो वो खोई हुई मुस्कानें वापस नहीं आ सकतीं। छिंदवाड़ा के 8 बच्चे अभी भी नागपुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती हैं, जहां उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। प्रशासन ने इनकी निगरानी के लिए एक विशेष टीम गठित की है, जिसमें डॉक्टर, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट और स्वास्थ्य अधिकारी शामिल हैं। टीम हर घंटे रिपोर्ट भेज रही है, ताकि कोई और हादसा न हो।

सिरप में छिपा था घातक जहर: जांच ने खोला राज

जांच एजेंसियों की रिपोर्ट्स से साफ हो गया है कि 'कोल्ड्रिफ' सिरप में सांद्रित डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) नामक विषैला रसायन मिला हुआ था। यह रसायन औद्योगिक सॉल्वेंट के रूप में इस्तेमाल होता है, जो किडनी को सीधे निशाना बनाता है। सिरप का निर्माण तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित Sresan Pharmaceuticals के प्लांट में मई 2025 में किया गया था। स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार को पुष्टि की कि सैंपल टेस्ट में दो प्रमुख कंटैमिनेंट्स-DEG और अन्य टॉक्सिन्स-पाए गए। केंद्र सरकार ने तुरंत देशभर में इस सिरप और इसी तरह के 22 अन्य बैचों पर बैन लगा दिया। मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र-तीन राज्यों में पूर्ण प्रतिबंध लागू हो गया है।

यह पहली बार नहीं है जब कफ सिरप बच्चों के लिए खतरा बने हैं। 2022-23 में भी उत्तर भारत में इसी तरह के कंटैमिनेटेड सिरप से सैकड़ों मौतें हुई थीं। लेकिन क्या सबक लिया गया? विशेषज्ञों का कहना है कि दवा कंपनियों की गुणवत्ता जांच में लापरवाही और डॉक्टरों का बिना सोचे लिखना इसकी मुख्य वजह है। बैतूल के डॉक्टर प्रवीण सोनी को शनिवार रात हिरासत में ले लिया गया है। पूछताछ में उन्होंने स्वीकार किया कि सिरप बाजार से ही लिया गया था, लेकिन अब सवाल उठ रहा है-क्या डॉक्टरों को ऐसी दवाओं पर ट्रेनिंग दी जानी चाहिए?

प्रशासन की कार्रवाई: बैन से आगे क्या?

मध्य प्रदेश सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उच्च स्तरीय बैठक बुलाई, जिसमें NCDC (नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल) की टीम को जांच सौंपी गई। डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने कहा, "जांच रिपोर्ट आने तक कोई भी आरोप निराधार है। लेकिन दोषियों को सख्त सजा मिलेगी।"

हालांकि, उनका यह बयान विपक्ष पर भारी पड़ा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर सरकार की 'सुस्ती' पर सवाल उठाए। राजस्थान में भी दो मौतें दर्ज हो चुकी हैं, जहां इसी सिरप से प्रभावित 5 बच्चे ICU में हैं। केंद्र स्वास्थ्य मंत्रालय ने शनिवार को एडवाइजरी जारी की-2 साल से कम उम्र के बच्चों को कफ-कोल्ड दवाएं बिल्कुल न दें। इसके अलावा, डॉक्टरों को सलाह दी गई कि केवल प्रमाणित दवाएं ही प्रिस्क्राइब करें।

मुख्य आंकड़े,विवरण

  • कुल मौतें (MP),"16 (छिंदवाड़ा: 14, बैतूल: 2)"
  • प्रभावित बच्चे,8 (नागपुर अस्पताल में भर्ती)
  • विषैला तत्व,डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG)
  • निर्माता कंपनी,"Sresan Pharmaceuticals, तमिलनाडु"
  • बैन वाले राज्य,"MP, राजस्थान, महाराष्ट्र"
  • मुआवजा,5 लाख रुपये प्रति परिवार (स्वीकृत)

मासूमों की मौतों से सबक: क्या बदलेगी व्यवस्था?

यह त्रासदी सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं। देशभर में दवा बाजार की निगरानी पर सवाल खड़े हो गए हैं। पेडियाट्रिशियन डॉ अनुराग अग्रवाल कहते हैं, "बच्चों की दवाओं में टॉक्सिन्स का खतरा हमेशा रहता है। पैरेंट्स को सलाह है-कभी भी बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न दें, और लेबल चेक करें।"

अब सवाल यह है कि क्या यह हादसा दवा उद्योग में सुधार लाएगा? या फिर एक और जांच रिपोर्ट कागजों में दफन हो जाएगी? छिंदवाड़ा के एक पिता ने कहा, "हमारा बच्चा चला गया, लेकिन बाकी मासूमों को बचाओ।" यह आवाज अनसुनी न रहे, यही प्रार्थना है। जांच जारी है, लेकिन समय है कि कार्रवाई तेज हो-वरना यह सिलसिला और लंबा खिंच सकता है।

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