जानिए कौन हैं भगवान दास रायकवार, जिन्हें मिला पद्म सम्मान, बुंदेलखंड की राई को विश्व मंच तक पहुंचाया
MP News: कल्पना कीजिए एक ऐसा इंसान जो साधारण गांव की मिट्टी से निकला, जहां न कोई बड़ा स्कूल था, न कोई बड़ा मंच, लेकिन उसके दिल में बस एक जुनून था - बुंदेलखंड का पारंपरिक लोक नृत्य 'राई' को कभी खत्म नहीं होने देना! आज वही इंसान देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक पद्म श्री से नवाजा जा रहा है।
जी हां, हम बात कर रहे हैं भगवान दास रायकवार की - मध्य प्रदेश के सागर जिले से ताल्लुक रखने वाले इस वरिष्ठ कलाकार की, जिन्होंने दशकों की मेहनत से 'राई' को मौत के मुंह से खींचकर फिर से जीवित कर दिया।

'राई' क्या है? बुंदेलखंड की धड़कन जो लगभग थम गई थी
राई बुंदेलखंड का एक अनोखा लोक नृत्य है - जहां पुरुष महिलाओं के वेशभूषा में ढोल-मृदंग की थाप पर कमर लचकाते हैं, पद संचालन करते हैं। यह नृत्य फसल कटाई, खुशी के मौकों, त्योहारों और सामाजिक उत्सवों से जुड़ा हुआ है। लेकिन आधुनिकीकरण, शहरीकरण और नई पीढ़ी की उदासीनता ने इसे लगभग विलुप्त होने की कगार पर पहुंचा दिया था। गांवों में लोग भूल रहे थे, युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे थे, और राई की लय धीरे-धीरे फीकी पड़ रही थी।
तभी मैदान में उतरे भगवान दास रायकवार। उन्होंने न सिर्फ खुद इस नृत्य को सीखा और प्रस्तुत किया, बल्कि सागर, दमोह, टीकमगढ़ जैसे इलाकों में घर-घर जाकर युवाओं को सिखाया। उनके नेतृत्व में छत्तरशाल बुंदेलखंड अखाड़ा (रामपुर वार्ड, सागर) ने राई को नया जीवन दिया। ICCR (भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद) की एम्पैनल्ड लिस्ट में उनका नाम 'अखाड़ा मार्शल आर्ट' के तहत दर्ज है, लेकिन उनका असली योगदान राई नृत्य को संरक्षित और प्रचारित करने में रहा। उन्होंने भारत पर्व, राज्य स्तर के कार्यक्रमों और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राई का प्रदर्शन किया। उनकी टीम ने तलवारबाजी, लाठी कला के साथ राई को मिश्रित कर एक अनोखा रूप दिया, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
साधारण जीवन, असाधारण संघर्ष
भगवान दास जी का जीवन किसी प्रेरक फिल्म से कम नहीं। साधारण परिवार से आने वाले इस कलाकार ने कभी बड़े संसाधनों की उम्मीद नहीं की। वे खुद राई सिखाते, प्रस्तुतियां देते और नए कलाकार तैयार करते रहे। उनके प्रयासों से आज सैकड़ों युवा इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं। राई अब सिर्फ एक नृत्य नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
पद्म पुरस्कार 2026 की घोषणा में उनका नाम उन 45 'अनसंग हीरोज' में शामिल है, जिन्हें 'कर्मयोगी' श्रेणी में सम्मानित किया गया। सूची में उनके साथ अंके गौड़ा, बृज लाल भट्ट, बुधरी ताती जैसे नाम हैं। मध्य प्रदेश से भगवान दास रायकवार का चयन न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत मेहनत का सम्मान है, बल्कि पूरे बुंदेलखंड की लोक कला की जीत है।
पद्म सम्मान: एक सम्मान जो पूरी पीढ़ी का है
पद्म पुरस्कार 2026 की प्रारंभिक सूची में भगवान दास रायकवार का नाम उन चुनिंदा 'कर्मयोगियों' में शामिल है, जिन्होंने बिना किसी सरकारी पद या बड़े संसाधनों के समाज और संस्कृति के लिए जीवन समर्पित कर दिया। सूची में उनके साथ ब्रजलाल भट्ट, बुधरी ताती जैसे अन्य नाम भी हैं। यह सम्मान उनके लिए व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है।
एक सीनियर कलाकार के रूप में उन्होंने कभी हार नहीं मानी। साधारण परिवार से आने के बावजूद, उन्होंने अपनी संस्कृति को खत्म होने से बचाया। आज जब युवा पीढ़ी राई सीख रही है, प्रदर्शन कर रही है, तो पीछे उनकी मेहनत की छाप साफ दिखती है। भगवान दास रायकवार की कहानी हमें याद दिलाती है कि असली हीरो वही होते हैं जो चुपचाप अपनी जड़ों को मजबूत करते हैं। पद्म सम्मान उनके संघर्ष को सलाम है - और बुंदेलखंड की मिट्टी को एक नई पहचान!












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