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MP News: भोपाल का 90 डिग्री ब्रिज विवाद, जानिए हाईकोर्ट ने दी ठेकेदार को क्यों दी राहत, मैनिट से जांच का आदेश

Bhopal MP News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ शामिल थे, ने भोपाल के ऐशबाग रेलवे ओवरब्रिज (ROB) के 90 डिग्री मोड़ वाले विवादित मामले में सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने ठेकेदार पुनीत चड्डा और डिजाइन कंसल्टेंट डायनामिक कंसल्टेंट की ब्लैकलिस्टिंग पर रोक लगा दी।

साथ ही, कोर्ट ने मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (मैनिट), भोपाल के निदेशक को निर्देश दिया कि स्ट्रक्चरल और सिविल इंजीनियरिंग में योग्यता रखने वाले एक वरिष्ठ प्रोफेसर से इस ब्रिज की तकनीकी जांच कराई जाए।

90 degree bridge dispute High court gives relief to contractor orders investigation from MANIT

कोर्ट ने साफ कहा कि जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि ब्रिज के निर्माण में गड़बड़ी कहां और किस स्तर पर हुई। क्या डिजाइन में खामी थी, या निर्माण कार्य में लापरवाही बरती गई? यह जांच न केवल इस विवाद का निपटारा करेगी, बल्कि भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकने के लिए भी दिशा-निर्देश देगी।

90 डिग्री ब्रिज: इंजीनियरिंग की विफलता या डिजाइन की गलती?

ऐशबाग का यह रेलवे ओवरब्रिज, जिसकी लागत 18 करोड़ रुपये थी, 648 मीटर लंबा और 8.5 मीटर चौड़ा है। इसका उद्देश्य महामाई का बाग, पुष्पा नगर, और न्यू भोपाल स्टेशन क्षेत्र को जोड़ना था, जिससे करीब 3 लाख लोगों को लाभ होना था। लेकिन इसके 90 डिग्री के तीखे मोड़ ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और आलोचना का विषय बना दिया। सोशल मीडिया पर इसे "इंजीनियरिंग ब्लंडर" और "ऑरिगेमी एक्सपेरिमेंट" तक कहा गया। स्थानीय निवासियों और नेटिजन्स ने इस डिजाइन पर सवाल उठाए कि इतना तीखा मोड़ वाहनों के लिए सुरक्षित कैसे हो सकता है?

जून 2025 में इस ब्रिज की तस्वीरें वायरल होने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने सख्त कदम उठाए। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जांच का आदेश दिया, जिसके बाद 7 PWD इंजीनियरों, जिनमें 2 चीफ इंजीनियर शामिल थे, को निलंबित कर दिया गया। एक रिटायर्ड सुपरिटेंडेंट इंजीनियर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई। साथ ही, ठेकेदार पुनीत चड्डा और डिजाइन कंसल्टेंट डायनामिक कंसल्टेंट को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।

ठेकेदार की दलील: डिजाइन PWD का, गलती हमारी नहीं

हाईकोर्ट में ठेकेदार पुनीत चड्डा की ओर से अधिवक्ता प्रवीण दुबे ने दलील दी कि ब्रिज का निर्माण लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा दी गई ड्रॉइंग और डिजाइन के अनुसार ही किया गया। उन्होंने कहा, "अगर डिजाइन में गलती थी, तो इसके लिए ठेकेदार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। PWD ने जो डिजाइन दिया, उसी के मुताबिक काम हुआ।" ठेकेदार ने यह भी तर्क दिया कि ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई बिना उचित जांच के की गई, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

दूसरी ओर, PWD ने दावा किया कि ठेकेदार ने ड्रॉइंग के अनुसार काम नहीं किया, जिसके कारण यह तीखा 90 डिग्री मोड़ बना। हालांकि, एक जांच में सामने आया कि ब्रिज का कोण 119 डिग्री है, जो पहले बताए गए 90 डिग्री से अलग है। यह भ्रम भी कोर्ट में चर्चा का विषय रहा।

मैनिट की जांच: सच्चाई का खुलासा

हाईकोर्ट ने इस विवाद को सुलझाने के लिए मैनिट के निदेशक को निर्देश दिया कि एक वरिष्ठ स्ट्रक्चरल और सिविल इंजीनियरिंग प्रोफेसर से ब्रिज का निरीक्षण कराया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच में यह पता लगाया जाए कि:

  1. क्या डिजाइन में खामी थी?
  2. क्या ठेकेदार ने डिजाइन का सही पालन नहीं किया?
  3. निर्माण में किन स्तरों पर लापरवाही हुई?

इस जांच के लिए मैनिट के प्रोफेसर को 1 लाख रुपये का भुगतान किया जाएगा, जिसका खर्च जांच रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता (ठेकेदार) वहन करेगा। कोर्ट ने PWD, भोपाल नगर निगम, और भोपाल विकास प्राधिकरण के मुख्य अभियंताओं को जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया।

सरकार को रिकॉर्ड पेश करने का समय

सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट से अनुरोध किया कि अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई (7 इंजीनियरों का निलंबन और ब्लैकलिस्टिंग) के रिकॉर्ड पेश करने के लिए समय दिया जाए। कोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई 10 सितंबर 2025 को निर्धारित की। इस दिन मैनिट की जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाएगी, जो इस मामले में निर्णायक साबित हो सकती है।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

ऐशबाग का यह ब्रिज 2018 में पहली बार डिजाइन किया गया था, जिसमें 45 डिग्री का कोण प्रस्तावित था। लेकिन 2020 में मेट्रो रेल परियोजना और जमीन की कमी के कारण डिजाइन में बदलाव किया गया। रेलवे ने 4 अप्रैल 2024 को PWD को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि ब्रिज का डिजाइन "90 डिग्री के कोण पर मिल रहा है, जो न तो कार्यात्मक है और न ही सुरक्षित।" इसके बावजूद, निर्माण कार्य पूरा हुआ और ब्रिज जून 2025 में वायरल हो गया।

PWD अधिकारियों ने तर्क दिया कि जमीन की कमी और मेट्रो स्टेशन की स्थिति के कारण 90 डिग्री का मोड़ बनाना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर अतिरिक्त जमीन मिले, तो इस मोड़ को वक्र (curve) में बदला जा सकता है। लेकिन जनता और सोशल मीडिया पर इस डिजाइन की भारी आलोचना हुई।

आगे की राह

हाईकोर्ट का यह फैसला इस मामले में एक महत्वपूर्ण कदम है। मैनिट की जांच रिपोर्ट न केवल यह तय करेगी कि डिजाइन में खामी थी या निर्माण में लापरवाही, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगी कि भविष्य में ऐसी गलतियां न हों। कोर्ट ने साफ किया है कि जांच निष्पक्ष होनी चाहिए, और इसमें PWD, भोपाल नगर निगम, और भोपाल विकास प्राधिकरण को सहयोग करना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला इंजीनियरिंग और प्रशासनिक जवाबदेही का एक बड़ा उदाहरण बनेगा। इंजीनियरिंग विशेषज्ञ प्रो. रमेश गुप्ता ने कहा, "90 डिग्री का मोड़ सड़क सुरक्षा के लिए खतरनाक है। मैनिट की जांच से यह स्पष्ट होगा कि गलती डिजाइन की थी या कार्यान्वयन की।"

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