कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 : जब एक पावरफुल CM ने दी थी PM को चुनौती
1978 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवराज अर्स कांग्रेस पार्टी के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में जाने गए। लेकिन, कुछ कांग्रेसी नेताओं को देवराज अर्स की उभरती लोकप्रियता इंदिरा गांंधी के लिए खतरा बनती हुई दिखाई देने लगी।

कर्नाटक में एक ऐसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री हुए जिन्होंने भारत के प्रधानमंत्री तक को चुनौती दे डाली थी। हालांकि वे प्रधानमंत्री के परम हितैषी थे। लेकिन सियासी हालात कुछ ऐसे बने कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के बीच ठन गयी थी। टकराव की ये कहानी बयां करती है कि राजनीति में दोस्ती कैसे दुश्मनी में बदल जाती है। इस राजनीतिक लड़ाई ने कर्नाटक के साथ-साथ देश की राजनीति पर भी गहरा असर डाला था।
1969 में इंदिरा गांधी का साथ दिया देवराज अर्स ने
ये कहानी जुड़ी है भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवराज अर्स से। 1969 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं कामराज और मोरारजी देसाई से अलग हो कर कांग्रेस (R) बनायी थी। यहां R का मतलब रिक्विजशनिस्ट (मांगकर्ता) था। बुजुर्ग नेताओं का धड़ा कांग्रेस (O) कहलाया। यहां ओ का मतलब ऑर्गेनाइजेशन यानी संगठन था। उस समय कर्नाटक को मैसूर राज्य के नाम से जाना जाता था। 1969 में यहां कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन कांग्रेस में विभाजन के बाद कर्नाटक (मैसूर) के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेन्द्र पाटिल, कामराज और मोरारजी देसाई वाले संगठन कांग्रेस के साथ चले गये। उस समय कर्नाटक के प्रभावशाली नेता देवराज अर्स ने इंदिरा गांधी के साथ रहने का फैसला किया। यहीं से इंदिरा गांधी और देवराज अर्स की दोस्ती की नींव पड़ी।

मैसूर (कर्नाटक)- 1972 के चुनाव में इंदिरा गुट की जीत
1972 में मैसूर विधानसभा का चुनाव हुआ। तब तक इंदिरा गांधी की नेतृत्व वाली कांग्रेस R, मूल कांग्रेस बन चुकी थी। 1971 के लोकसभा चुनाव में जनता ने इंदिरा गांधी को अपार जनसमर्थन दिया था। संगठन कांग्रेस उनके सामने टिक नहीं पायी। 1972 के मैसूर विधानसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को 165 सीटें मिलीं। इंदिरा गांधी के करीबी नेता देवराज अर्स मुख्यमंत्री बने। संगठन कांग्रेस को सिर्फ 24 सीटें मिलीं। उस समय मैसूर विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 216 थी। 1969 के राजनीतिक संकट के समय देवराज अर्स के सहयोग ने इंदिरा गांधी को उनका मुरीद बना दिया था। 1971 मे प्रचंड बहुमत के बाद जब इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनी तो देवराज अर्स के लिए उनके मन में इज्जत और बढ़ गयी।
जब इंदिरा गांधी ने देवराज अर्स को दी थी मर्सिडिज कार 1972 में देवराज अर्स मैसूर के मुख्यमंत्री बने तो उनका इंदिरा गांधी से
आत्मीय संबंध और गहरा हो गया। इस बीच 1973 में मैसूर राज्य का नाम कर्नाटक हो गया। 1973 में जब इंदिरा गांधी एक बार बैंगलोर आयीं तो उन्होंने देखा कि मुख्यमंत्री देवराज अर्स सरकारी कामकाज के लिए एम्बेसेडर कार का इस्तेमाल कर रहे हैं। तब उन्होंने अचानक मुख्यमंत्री को मर्सिडिज बेंज कार गिफ्ट कर दी थी। उपहार में ये कार देने के बाद इंदिरा गांधी ने देवराज अर्स से कहा था, एक मुख्यमंत्री के रूप में आप एम्बेसेडर कार की बजाय किसी अच्छी कार के लिए डिजर्व करते हैं। आज से आप अपने सरकारी कामकाज के लिए इसी मर्सिडिज कार को उपयोग में लाएंगे। देवराज अर्स जब तक मुख्यमंत्री रहे मर्सिडिज बेंज से ही दफ्तर आते-जाते रहे।

आज भी यह कार याद दिलाती है पुराने दिनों की
1980 में जब इंदिरा गांधी से विवाद के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा तो उन्हें ये कार सरकारी संपदा विभाग को सुपूर्द कर दी। बाद में कर्नाटक सरकार ने इस विशेष कर को 2007 में नीलाम कर दिया। जब नीलामी की जानकारी मिली तो देवराज अर्स के एक करीबी जीएम बाबू ने ये कार खरीद ली। देवराज अर्स और इंदिरा गांधी की स्मृति में आज भी ये कार जीएम बाबू के पास सुरक्षित है। देवराज अर्स के जन्मदिन के मौके पर ये कार सजधज कर बाहर निकलती है। 2015 में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धरमैया इस विंटेज कार को लेकर सड़क पर निकले थे। ये कार कर्नाटक के राजनीति इतिहास को बयां करती है।

इंदिरा गांधी की हार के बाद भी कर्नाटक में जीती कांग्रेस
इमरजेंसी के बाद 1977 में इंदिरा गांधी लोकसभा का चुनाव हार गयीं। जनता पार्टी की नयी सरकार बनी। उस समय जनता सरकार के कठोर फैसलों से लगने लगा था कि अब इंदिरा गांधी का राजनीति भविष्य खत्म होने वाला है। जब केन्द्र में मोरारजी
देसाई के नेतृत्व में जनता सरकार बनी तो उसने राजनीतिक अदावत में राज्य की कांग्रेस सरकारों को भंग कर दिया। कर्नाटक में देवराज अर्स सरकार के कुछ ही दिन बचे थे लेकिन फिर भी जनता सरकार ने उसे बर्खास्त कर दिया। देवराज अर्स 20 मार्च 1972 को मैसूर के मुख्यमंत्री बने थे। फिर वे 1 नवम्बर 1973 से कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। जनता सरकार ने 31 दिसम्बर 1977 को देवराज सरकार को बर्खास्त कर दिया था। 1978 के फरवरी में कर्नाटक में फिर विधानसभा के चुनाव हुए। उस समय देश में कांग्रेस के खिलाफ जबर्दस्त माहौल था। इसके बावजूद कांग्रेस ने 1978 का कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीत लिया। उसने 224 में से 149 सीटें जीत कर फिर सरकार बनायी। इस जीत ने इंदिरा गांधी की मरणासन्न राजनीति में नयी जान फूंक दी।

1978 में भी देवराज अर्स इंदिरा गांधी के साथ
28 फरवरी 1978 को देवराज अर्स ने दोबारा कर्नाटक की सत्ता संभाल ली थी। लेकिन उस समय कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी राजनीति के अंधकूप में फंसी हुई थीं जहां से बाहर निकलने का रास्ता दिखायी नहीं दे रहा था। वे सांसद भी नहीं थीं। जनता सरकार उन्हें जेल भेज भेज चुकी थी। हर तरफ यही सवाल था, अब क्या होगा इंदिरा गांधी का ? इंदिरा गांधी इतनी कमजोर हो चुकी थीं कि कांग्रेस के ही कुछ बड़े नेता उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने की कोशिश करने लगे। तब इंदिरा गांधी ने एक बार फिर पार्टी में विभाजन कर कांग्रेस आई, मतलह कांग्रेस इंदिरा बना ली। देवराज अर्स ने फिर इंदिरा गांधी का साथ दिया। वे कांग्रेस आई में रहे।
इंदिरा गांधी के संकटमोचक देवराज अर्स जब इंदिरा गांधी मुश्किलों के भंवर में फंसी हुई थीं तब देवराज अर्स संकटमोचक के रूप में सामने आये। कर्नाटक में कांग्रेस आई की सरकार थी जहां से इंदिरा गांधी को संजीवनी मिल सकती थी। फरवरी 1978 में मुख्यमंत्री बनते ही देवराज अर्स ने इंदिरा गांधी की पुनर्वापसी की कोशिश शुरू कर दी जो छह महीने बाद पूरी हो गयी। उनके लोकसभा में पहुंचने के लिए कर्नाटक से एक जिताऊ सीट की खोज शुरू हुई। देवराज अर्स और इंदिरा गांधी के विश्वस्त सहयोगियों ने चिकमंगलूर को एक सेफ सीट माना। फिर चिकमंगलूर से जीते कांग्रेस सांसद डीबी चंद्र गौड़ा को इस्तीफा देने के लिए राजी किया गया। उनके इस्तीफे बाद चिकमंगलूर लोकसभा सीट खाली हो गयी। अक्टूबर 1978 में उपचुनाव का एलान हुआ तो इंदिरा गांधी ने यहां से चुनाव लड़ने की घोषणा की। इस उपचुनाव में इंदिरा गांधी ने जनता पार्टी के वीरेन्द्र पाटिल को करीब 77 हजार वोटों से हराया। इस तरह नवम्बर 1978 में इंदिरा गांधी फिर लोकसभा में पहुंच गयीं।

जब CM की ताकत से डर गयी थीं PM
1978 में इंदिरा गांधी की जीत के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवराज अर्स की राजनीति ताकत बहुत ज्यादा बढ़ गयी। वे कांग्रेस के शक्तिशाली नेता के रूप में स्थापित हो गये। कर्नाटक की जनता में भी उनकी अपार लोकप्रियता थी। लेकिन देवराज अर्स की यह लोकप्रियता कांग्रेस के कुछ नेताओं को खटकने लगी। वे देवराज अर्स के खिलाफ इंदिरा गांधी का कान भरने लगे। उनका तर्क था, देवराज अर्स की बढ़ती ताकत एक दिन इंदिरा गांधी के लिए खतरा बन जाएगी। इंदिरा गांधी पर देवराज अर्स के कई एहसान थे। इसलिए उन्होंने शुरू में इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन एक दिन इंदिरा गांधी चापलूस नेताओं की बातों में गयी। उस समय देवराज अर्स मुख्यमंत्री होने के साथ साथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी थे।

PM को CM की चुनौती
शिकायती नेताओं ने सवाल उठाया था कि देवराज एक साथ दो पद पर क्यों है ? उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना चाहिए। इंदिरा गांधी ने इन नेताओं की बातों में आ कर देवराज अर्स को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। लेकिन कहा जाता है कि
संजय गांधी ने इस पत्र को पहले ही मीडिया में लीक कर दिया था। इसकी वजह से देवराज अर्स का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। फिर तो उन्होंने इंदिरा गांधी को इतनी कठोर भाषा में चिट्ठी लिखी कि कांग्रेस में खलबली मच गयी थी। कहा जाता है कि इस चिट्ठी में लिखे कुछ शब्द मर्यादा की सीमा से बाहर थे। इसकी एक अलग कहानी है। इसी विवाद के बाद देवराज अर्स और इंदिरा गांधी के बीच तलवार खिंच गयी थी। जनवरी 1980 में जब इंदिरा गांधी दोबारा प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने तत्काल देवराज अर्स को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था। इंदिरा गांधी के फिर सत्ता में आने के बाद भी देवराज अर्स उनके सामने झुके नहीं थे।
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