ऑस्ट्रेलिया को भारी पड़े तोहफे में मिले खरगोश

नई दिल्ली, 25 अगस्त। ये किस्सा है, करीब डेढ़ सदी पहले तोहफे में मिले 24 खरगोशों का, जिन्होंने आगे चलकर एक आपदा की शक्ल ले ली.

1859 का बरस था. उस साल 25 दिसंबर, यानी क्रिसमस को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न बंदरगाह पर इंग्लैंड से एक जहाज आया. इस जहाज में थॉमस ऑस्टिन नाम के एक शख्स के लिए क्रिसमस के तोहफे में 24 खरगोश आये थे. ऑस्टिन इंग्लैंड के रहने वाले थे और मेलबर्न आकर बस गए थे. वो अपने मेलबर्न के कंपाउंड में खूब सारे खरगोश पालना चाहते थे. इसीलिए उनके भाई ने इंग्लैंड से उनके लिए यूरोपीय खरगोश भेजे थे.

a christmas gift of rabbits in 1859 may be to blame for australias devastating biological invasion

ऑस्टिन की चाहत पूरी हुई. उन 24 खरगोशों से तीन साल के भीतर हजारों खरगोश पैदा हो गए. आज ऑस्ट्रेलिया में जंगली खरगोशों की तादाद करीब 20 करोड़ बताई जाती है. ये फसलों और स्थानीय पेड़-पौधों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं. अनुमान है कि इनके कारण ऑस्ट्रेलिया को सालाना करीब 1,600 करोड़ रुपये का कृषि-संबंधी नुकसान होता है.

ऐसा नहीं कि ऑस्टिन के पास आये यूरोपीय खरगोश ऑस्ट्रेलिया में इन जीवों की पहली आमद हों. 1788 में सिडनी आये ब्रिटिश जहाजों की खेप भी अपने साथ पांच खरगोश लाई थी. अगले 70 साल में ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी किनारे के पास बसे इलाकों में भी करीब 90 खरगोश लाए गए. वंशानुक्रम के आधार पर इनमें से ज्यादातर का ताल्लुक 1859 में ऑस्टिन को भेजे गए उन 24 खरगोशों से पाया गया है.

रिसर्च में सामने आई जानकारी

ये जानकारी 'प्रोसिडिंग्स ऑफ दी नैशनल अकेडमी ऑफ साइंसेज' के एक हालिया शोध में सामने आई है. पता चला है कि ऑस्टिन को भेजे गए 24 खरगोशों में जंगली और पालतू दोनों तरह के खरगोश थे. मेलबर्न पहुंचने में जहाज को 80 दिन लगे. इन दौरान दोनों तरह के खरगोशों में इंटरब्रीडिंग हुई. इसके बाद ऑस्टिन के कंपाउंड में उनकी संख्या बेतहाशा बढ़ी. वो बाहर निकलने लगे. शोध के मुताबिक, वो 100 किलोमीटर प्रति वर्ष की दर से आगे फैलते गए. 50 साल के भीतर वो अपने कुदरती यूरोपीय रेंज से 13 गुना बड़े इलाके में फैल गए.

ये जंगली खरगोश ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय जीव नहीं हैं. इन्हें वहां 'इनवेसिव स्पीशिज' माना जाता है. इनवेसिव स्पीशिज पौधों या जीवों की ऐसी बाहरी प्रजातियां हैं, जो किसी खास देश या इलाके में कुदरती तौर पर नहीं पाई जाती हैं. वहां का ईको सिस्टम उनकी संख्या को काबू में रखने की स्वाभाविक प्रक्रिया या मशीनरी के प्रति अभ्यस्त नहीं होता. इसके कारण ये जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है.

कई बार तो इन बाहरी प्रजातियों के चलते स्थानीय पौधों या जीवों का अस्तित्व खतरे में आ जाता है. इस तरह के बायोलॉजिकल इनवेजन पर्यावरण और आर्थिक तौर पर बेहद विनाशकारी साबित हो सकते हैं. जानकारों के मुताबिक, यूरोपीय खरगोशों की ऑस्ट्रेलिया में बेहिसाब जनसंख्या बायोलॉजिकल इनवेजन की सबसे विनाशकारी मिसालों में से एक है. इसे बाहर से लाए गए स्तनधारी जीवों का सबसे तेज रफ्तार से हुआ 'कोलोनाइजेशन' माना जाता है.

Source: DW

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