अंधविश्वास पर 'विश्वास' की मुहर आखिर कब तक?

रायपुर। अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता फैलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के एक दिन बाद महाराष्ट्र सरकार ने बुधवार को काला जादू, अंध श्रद्धा और अंध विश्वास को खत्म करने संबंधी लंबे समय से लंबित विधेयक को अध्यादेश के जरिए लागू करने का फैसला किया। देश में यह अपनी तरह का पहला कानून होगा।

याद रहे कि हाल ही में अंधविश्वास जैसे मसलों पर तीन दशक से जन जागरूकता अभियान चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता दाभोलकर की हत्या के बाद उठे जन आक्रोश को देखते हुए स्वाभाविक था कि इस दिशा में कोई अहम कदम उठाया जाएगा। बहरहाल कानून तो अमल के बाद ही समाजोपयोगी बन पाता है। फिर भी उम्मीद है कि 21वीं सदी के दूसरे दशक में पहुंच चुके हमारे समाज को इस ऐतिहासिक कानून की आंच में विश्वास और अंधविश्वास के बीच अंतर समझने में कुछ तो मदद मिलेगी।


विश्वास और अंधविश्वास, श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क है। श्रद्धा हमें खुद पर विश्वास करना सिखाती है, हमें विवेकवान बनाती है, संशय का परिहार करती है, तर्कबुद्धि को धार देती है, जबकि अंधश्रद्धा विवेक को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है, संदेह को बल देती है, तर्क का तिरस्कार करती है।

श्रद्धा कब अंधश्रद्धा का रूप ले लेती है, मालूम नहीं चल पाता। यही कारण है कि लोग जागरूकता के अभाव में अंधश्रद्धा को ही धर्म और यहां तक जीवन का कर्तव्य मान बैठते हैं। आज से करीब छह शताब्दी पहले संत कबीरदास ने अंधश्रद्धा पर जमकर प्रहार किया था ताकि लोग जागें और सत्य के सही स्वरूप को पहचान सकें। संत कबीर ने ईश्वर के विधान के नाम पर समाज में व्याप्त अंधविश्वासों की जमकर आलोचना की।

इन अंधविश्वासों के नाम पर होने वाले आडंबरों, सामाजिक भेदभाव एवं अस्पृश्यता के खिलाफ कबीर ने खुलकर आवाज बुलंद की और उसमें छिपे शोषण को उजागर किया। याद रहे कि अपने दौर में उन्हें भी काफी विरोधों का सामना करना पड़ा।

दुर्भाग्य है कि आज सूचना क्रांति और तमाम तरक्की के इस दौर में भी यह संघर्ष जारी है। खैर, संघर्ष तक बात होती तो कोई बात नहीं, दु:ख तो इस बात का है कि अब प्राणों का ही संकट झेलकर लड़ाई लड़ने की नौबत आ पहुंची है।

अंधविश्वासों के खिलाफ जागृति फैलाने वाले नरेंद्र दाभोलकर की प्राणाहुति इस संघर्ष के खतरों से मानव समाज को आगाह कर रही है। महाराष्ट्र में अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना करने वाले दाभोलकर का पूरा जीवन लोगों में जागरूकता पैदा करने को समर्पित था।

पेशे से चिकित्सक दाभोलकर तंत्र-मंत्र, जादू-टोना व दूसरे अंधविश्वासों को दूर करने के अभियान में इस कदर लगे हुए थे कि तथाकथित स्वयंभू लोगों को शायद उनका जागरूकता फैलाना रास नहीं आया। वास्तव में दाभोलकर की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि यह लंबे संघर्ष के बाद मानव सभ्यता द्वारा अर्जित किए गए आधुनिक विचारों और खुली सोच का गला घोंटने की कोशिश है।

दाभोलकर की जंग न व्यक्तिगत थी, न किसी व्यक्ति या समूह के खिलाफ थी। वे उन तर्कसम्मत विचारों का प्रतिनिधित्व और प्रचार कर रहे थे, जो रूढ़ियों का विरोध करते हैं। वह विचार, जो कबीर के 'आंखन देखी' की तरह तर्क को अहमियत देता है, और जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पक्षधर है।

यह सही है कि समाज ने अंधविश्वासों के खिलाफ एक लंबी जंग लड़ी है, लेकिन दाभोलकर की हत्या हमें सचेत कर रही है कि यह लड़ाई अभी अधूरी है। अंध विश्वास के विरुद्ध पारदर्शी और अडिग विचारों को पोषण देने की लड़ाई अगर थम गई तो कोई आश्चर्य नहीं कि हमें भविष्य में आधुनिक युग का आदिम कहा जाएगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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