तो क्या नीतीश-आडवाणी ने खुद को इतिहास बना दिया?

नयी दिल्ली। जून की तपिश के बीच भारतीय राजनीति में आई सियासी उठापटक ने इसके तापमान को और बढ़ा दिया है। राजनीति गलियारा नए समीकरणों का अड्डा बन रहा है। कहीं पुराने साथी छूट रहे है तो कहीं नए राजगणितों का आंकलन किया जा रहा है। बीजेपी में उठा सियासी बंवडन दो पुराने साथियों के रवैये का नतीजा रहा। नीतीश ने एनडीए का साथ छोड़ा तो वरिष्ठ नेता लाल क़ष्ण आडवाणी ने भी खूब नखरे दिखाए। वो भी उस वक्त जब 10 महीनों के बाद आर-पार की लड़ाई है।

भाजपा के दो अनुभवी खिलाड़ियों ने ऐन मौके पर उसे धोखा दिया। जिस नरेन्द्र मोदी के नाम पर इतना बड़ा सियासी ड्रामा खेला गया कुछ दिनों पहले उसी मोदी के नाम पर ये नमो-नमो करते नजर आ रहे थे। नरेन्द्र मोदी के हिन्दुत्ववादी छवि को हथियार बनाकर उनके खिलाफ इस्तेमाल करने वाले इन्हीं नेताओं ने कभी उसकी तारिफों के पुल बांधे थे। फिर क्या वजह है कि आडवाणी और नीतीश ने मोदी के नाम पर बीजेपी में बवाल मचा दिया।

nitish nad advani

मोदी के हिन्दुत्व से परहेज करने वाले नीतीश कुमार इसे आधार बनाकर एनडीए से अलग हो गए है, वहीं नीतीश 2002 में हुए गुजरात दंगों के वक्त रेलमंत्री रहे थे। सेक्यूलर छवि का राग आलापने वाले नीतीश उस वक्त खामोश क्यों रहे थे। 2014 की कमान मोदी के हाथों में दिए जाने पर जिस आडवाणी ने बीजेपी में उथल-पुथल मचा दी थी, वो 2002 के दंगों के वक्त क्यों चुप्पी साधे हुए थे, जबकि वो उस वक्त गृहमंत्री के अलावा देश के उप-प्रधानमंत्री थे। जब उस वक्त उन्हें मोदी के हिन्दुत्ववादी छवि से परहेज नहीं था तो आखिर इन दस सालों में ऐसा क्यों हो गया कि मोदी के नाम पर नीतीश-आडवाणी ने नयी सियासी बिसात बिछा दी।

वजह है मोदी की दमदार शख्सियत। मोदी ने गुजरात में लगातार तीन विधानसभा चुनावों में बीजेपी को जीत दिलाकर पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी दावेदारी को मजबूती प्रदान की। मोदी ने अपने राजनीतिक कौशल से पार्टी में अपने आपको सबसे बड़े और लोकप्रिय नेता के तौर पर स्थापित कर लिया था। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का भी एक बड़ा धड़ा मोदी में हिंदुत्व का नायक देखने लगा था। यह बात गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और बाद में आडवाणी के इस्तीफे और उसे वापस लेने के ड्रामे के बाद और साफ हो गई थी। मोदी की इसी छवि से कई नेता जरे हुए है। नीतीश कुमार ने रसातल में जा चुके बिहार को विकास की पटरी पर लाकर पूरे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचा था। बिहार की विकास दर गुजरात से ज्यादा पहुंचा दी।

नतीजा यह हुआ नीतीश की महात्वाकांक्षा सातवें आसमान पर पहुंचने लगी, लेकिन मोदी और कुमार में मजबूत शख्सियत का फर्क मोदी को आगे ले आया। राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के बढ़ते कद से नीतीश कुमार को लगने लगा कि उनके आगे आने से बिहार में अकलियत का वोट उनसे अलग हो सकता है। बिहार में 17 फीसदी मुसलमान वोट है। अपना दोस्त और दुश्मन दोनों बहुत सोच समझकर चुनने वाले नीतीश का आकलन था कि अगर मोदी का दामन नहीं छोड़ा तो बिहार के 17 फीसदी वोटर उनसे छिटककर लालू यादव के पाले में जा सकते हैं।

नीतीश ने माना कि मोदी और मुसलमान दोनों एक साथ आ नहीं सकते। लिहाजा नीतीश के सामने अपने आप को सेक्यूलरिज्म का चैंपियन घोषित करने के अलावा और कोई चारा नहीं था और इसके लिए मोदी का विरोध जरूरी था, लेकिन से सेक्यूलरिज्म तब कहां थी जब 2003 में गुजरात दंगों के बाद गुजरात के कच्छ जिले के आदीपुर में बतौर रेल मंत्री बोलते हुए नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी की तारीफों के पुल बांधे थे।

उस वक्त नीतीश ने कहा था-मुझे पूरी उम्मीद है कि बहुत दिन गुजरात के दायरे में सिमटकर नरेन्द्र भाई नहीं रहेंगे और देश को उनकी सेवा मिलेगी। अपने उस बयान के करीब दस साल बाद जब नीतीश को अपनी उम्मीद सही साबित होती दिखने लगी,यानी कि नरेन्द्र मोदी गुजरात के दायरे से बाहर निकलकर देश की ओर बढ़े तो वो मोदी के नाम पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग हो गए।ये वोट की राजनीति है। नीतीश जानते है कि वो पीएम की उम्मीदवारी तो नहीं कर सकते, लेकिन मोदी के कारण वो अपनी सीएम पद को खरता नहीं पहुंचाना चाहते।

बीजेपी के वऱिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी 85 साल की उम्र में मार्गदर्शन देने के बजाए प्रधानमंत्री पद की लालसा से मुक्त नहीं हो पा रहे है। मोदी को चुनाव की कमान सौंपे जाने के बाद आडवाणी को अपना सपना टूटता नजर आया। 2002 में गुजरात दंगों के बाद गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी अभियुक्त की तरह शामिल हुए थे। उनपर अपने पद से इस्तीफे का भयानक दबाव था।

अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि मोदी राजधर्म का पालन करे और अपने पद से इस्तीफा दे, लेकिन तब आडवाणी ने ही उन्हें बचाया था। ग्यारह साल बाद उसी गोवा से ही मोदी विजेता के तौर पर उभरे तो आडवाणी के ये बर्दाश्त नहीं हुआ, और उन्होंने अपने पद से इस्तीफे का पत्ता फेंका। हलांकि उनका तमाशा अब खत्म हो चुका है। लेकिन मोदी के नाम पर नीतीश और आडवाणी के ड्रामे ने उसकी शख्सियत को सामने लाकर रख दिया है।

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