नई स्ट्रैटेजी के तहत दिल्ली से कोलकाता तक नरेंद्र मोदी
[अजय मोहन] चुनाव का नाम आते ही किसी के भी जहन में सबसे पहले वो रैलियां आती हैं, जहां एक नेता बोलता है और लाखों लोग बैठकर सुनते हैं। वो जनसभाएं जहन में आती हैं, जिनमें नेता एक-एक कर गली मोहल्लों को संबोधित करते हैं। सच पूछिए तो इन जनसभाओं का असर महज थोड़े समय के लिये ही रहता है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव 2014 के लिये नरेंद्र मोदी ने लोगों तक पहुंचने की नई स्ट्रैटेजी बनायी है। और उसी के तहत वो दिल्ली से कोलकाता तक पहुंचे और आगे कई शहरों का भ्रमण करेंगे।
अभी तक हम देखते आये हैं कि जब चुनाव आने वाला होता है, तो अलग-अलग शहरों में ताबड़तोड़ रैलियों का आयोजन किया जाता है। इन रैलियों में हजारों लाखों लोग अपने नेता को सुनने के लिये पहुंचते हैं। रैलियों में भारी भरकम खर्च भी वोट बैंक को बहुत ज्यादा मजबूत नहीं कर पाता। इसका मुख्य कारण यह है कि रैली में आने वाले अधिकांश लोग ग्रामीण इलाकों से आते हैं। पिछले कई दशकों पर नजर डालें तो शहरी जनता और अपर क्लास के लोगों से नेता कम ही मुखातिब हो पाते थे।
हाल ही में कहां-कहां गये मोदी
इसी ट्रेंड को तोड़ते हुए मोदी अब सबसे पहले अपर क्लास और मीडियम क्लास के लोगों को टार्गेट कर रहे हैं। उन्हें जहां भी बोलने का न्योता मिल रहा है, वो खुशी के साथ स्वीकार कर रहे हैं। अगर आप पिछले एक महीने की गतिवधियों पर नजर डालें, तो नरेंद्र मोदी ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अपना अंतिम राजनीतिक संबोधन पेश किया था। उसके बाद अमेरिका में भारतीयों को संबोधित किया, फिर इंडिया टुडे कॉनक्लेव, गूगल द्वारा आयोजित बिग टेंट एक्टिवेट सम्मिट 2013, दिल्ली के एसआरसी कॉलेज का व्याख्यान, गांधीनगर में पुस्तक विमोचन कार्यक्रम, फिक्की के सम्मेलन में, नेटवर्क 18 द्वारा आयोजित थिंक इंडिया कार्यक्रम और फिर कोलकाता में भारत कंफेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रीज़ का सम्मेलन।
कहां बिगड़ सकते हैं समीकरण
इनमें से कोई ऐसी जगह नहीं थी, जहां मोदी ने गुजरात का मॉडल पेश नहीं किया हो। और कोई ऐसा मंच नहीं था, जहां केंद्र सरकार को खरी-खोटी नहीं सुनायी हो। गुजरात का मॉडल पेश करना अच्छी बात है, क्योंकि इसमें कोई शक नहीं कि मोदी ने गुजरात को जमीन से उठाकर आसमान पर बिठा दिया है, लेकिन अपने भाषणों में प्रवचन देना, यह कहीं न कहीं मोदी के राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकता है।
भाषणों में कांग्रेस व यूपीए के खिलाफ निगेटिव कैमपेन करना भी मोदी के लिये बाधा बन सकते हैं, क्योंकि आम जनता को निगेटिव कैमपेन कतई पसंद नहीं। और हां 2009 के चुनाव में भाजपा की हार का कारण भी निगेटिव कैमपेन था।













Click it and Unblock the Notifications